अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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दो। वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से प्रस्थान किया और
मुसलमानों की मण्डली में पहुँचकर सबको बधाई दी। वे
लोग उसकी सारी बातें सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।
दूसरे दिन दरबार में पहुँचते ही बादशाह को नाई की
बात याद आई और बीरबल को बुलाकर बोले-"बीरबल !
आज कितने समयों से हमें अपने पुरुषाओं का कुछ
समाचार नहीं मिला है इसलिये इस समय मेरे मन में एक-
दम उचाट सा हो गया है, तुम जाकर उनका समाचार बूझ
आओ। बीरबल की आँखें खुल गईं; उसने समझ लिया कि
इसमें फँसाने की बातें हैं। अच्छा देखा जायगा। वह बोला-"
पृथ्वीनाथ ! यह दास जाने को नाहीं नहीं करता, परन्तु
एक बात की अड़चन पड़ेगी। वह यह कि वहाँ पहुँचने के लिये
कोई रास्ता नहीं है फिर क्या किया जाय ? यदि मार्ग का
प्रबन्ध आप करादें तो मैं सहर्ष कल की जगह आजही यात्रा
करने के लिये मुस्तैद हूँ।" बादशाह बोला-"जो सुथनी
सिलाता है वह पाखाना फिरने के लिये उसमें छेद भी बनवा
लेता है। वहाँ पहुँचने की तरकीब काने नाऊ ने पहले ही
बतला दिया है, उसकी युक्ति मुझे भी पसन्द आई है। उसने
कहा है कि जाने वाले आदमी को स्मशान पर बैठा कर उसके
ऊपर से घास की सवा लक्ष पूलियाँ रखकर उसमें आग
सुलगा देने से काम बन जायगा, वह दूत उसी धूयें के साथ
वहाँ (यानी स्वर्ग को) पहुँच जायगा। अतएव तुम दो चार
दिनों में एकदम तयारी करके आओ।"
अब बीरबल समझ गया कि यह सब करामात उसी