अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ४८
अकबर बीरबल विनोद ४८
ही से दर्बार में भेज चुका था इसलिये उसको खुलवा
कर सबके हवाले किया। सब लोग असलो वस्त्र धारण
कर अपनी २ जगहों पर जा बिराजे और सभाका दूसरा
कार्यारम्भ हुआ।
पहले जन्म की वार्ता।
बैजर नामी ग्राम में दो आदमी बड़े मित्र भाव से बसते
थे। उनमें एक का नाम पंडित सुशर्मा था जो अति विद्वान,
सदाचारी तथा गम्भीर प्रकृति का था। दूसरे मित्र का नाम
सुदामा था। यह जाति का नाई था परन्तु विचार में बड़ा
ही न्याई था। इनका आपस में ऐसा संगठन था कि बिना
एक से पूछे दूसरा कोई नया कार्यारंभ नहीं करता था। एक
दिन अकस्मात सुशर्मा के जी में यह बात आई- "हमें कोई ऐसा
कर्म करना चाहिये जिससे भविष्य में राज्य ऐश्वर्य्य का
सुख मिले।" इस विचार से प्रेरित होकर उसने सुदामा नामी
अपने मित्र से इस की चर्चा की। सुदामा नाई ने कहा-"
मित्रवर ! मेरा धर्म भी यही कहता है कि आपको तपश्चर्या
करने की अनुमति दूँ और तपश्चर्या के समय आपका सह-
योग कर मैं भी अपना अगला जन्म सँवारू"। सुशर्मा अपने
मित्र को अपनी सम्मति से सहमत देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ
और मित्र सुदामा नाई के सहित प्रयाग को चला गया।
वहाँ पहुँचाकर त्रिवेणी के समीप ही एक छोटी सी पर्णकुटीर
बनवाकर तपश्चर्य्या में निमग्न हुआ।