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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल बिनोद २०२
दिया है, परन्तु मेरे सामने तेरी दाल न गलेगी और झट म्यान
से तलवार खींचकर बीरबल पर झपटा। बीरबल अपनी
नकली पोशाक उतारकर खासा बीरबल बन गया।'' सरदार
खाँ बीरबल को पहचान कर सन्न हो गया और उसकी
जबान एकदम बन्द हो गई। डरके कारण थरथर काँपने लगा।
बीरबल बोला-''ऐ प्रजा पर अत्याचार करने वाले सर-
दार खाँ ! अब तुम मेरे कैदी हो गये हो। तुमको मेरे साथ
चलना पड़ेगा। तुम प्रजा के रक्षा के निमित्त रक्खे गये थे
धिक्कार है तुम्हारी इस करतूत पर।''
सरदार खाँ चुपचाप बीरबल के साथ हो लिया फिर बीरबल
उस कन्या से बोला-"तू भी मेरे साथ चल। कल मैं तेरे पिता
को बुलवाकर सारी बातें समझा कर तुझे उसके साथ भेज
दूँँगा। कन्या ने सहर्ष बीरबल के साथ जाना स्वीकार किया
घर पहुँच कर बीरबल ने उसे अपनी स्त्री के हवाले किया।
और सरदार खाँ को एक कोठरी में कैदी के रूप में बन्द रक्खा।
सबेरा होते ही उसे सिपाहियों के पहरे में बादशाह के
सामने उपस्थित किया।
बादशाह तथा अन्य सभासद सरदार खाँ के सम्बन्ध में
कुछ नहीं जानते थे। एकाएक उसको कैदी के रूप में देखकर
चकित हो गये। बीरबल से उसका भेद पूछा और बीरबल
अपने भ्रमण से लेकर सरदार खाँ के पकड़े जाने तक की
सारी बातें बादशाह से कह सुनाया। बादशाह जो बात
सुनने का स्वप्न में भी कयास नहीं करता था वह सुनकर
और सामने सरदार खाँ कैदी को देखकर आग बबूला हो