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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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२१७ अकबर बीरबल विनोद
कहा-“पृथ्वीनाथ ! यह एक फकीर की कन्या है, जब यह
बहुत छोटी थी तभी वह फकीर इसे मेरे हाथ बेच गया था ।”
इसकी उम्र उस समय दो तीन वर्ष की थी। भली भाँति
बातचीत भी करना नहीं जानती थी। मेरे घर रहकर कई वर्षों
के बाद अब सयानी हुई है। लालन पालन के अतिरिक्त और
बहुत सा व्ययकरके मैंने इसे शिक्षिता बनाया है।
बीरबल ने उस कन्या से पूछा-“क्यों री छोकरी ! तू अपने
माता पिता को जानती है, तेरा जन्म किस जगह हुआ
था ?” लड़की बोली-“ना सरकार ! मैं तो अपने माता पिता
की सूरत भी नहीं पहचानती, जब से होश संभाले हूँ तब से
आजतक बराबर इन्हीं का साथ है और मैं इन्हीं को अपनी
माँ जानती हूँ ।” बीरबल ने वेश्या से पूछा-“तू इस लड़की
का नाम जानती है ? वेश्या बोली-“हाँ मैं इसको काशी
के नाम से पुकारती हूँ ?” बीरबल ने कहा-“अच्छा अब
आज तुम अपने घर जावो कलह दरबार के समय फिर
उपस्थित होना ।”
दूसरे दिन बीरबल ने उससे पहले ही लड़की के पिता
को तलब किया और उससे पूछा-“क्या तुम अपने लड़की का
असली नाम बतला सकते हो ?” पिता बोला-“हाँ सरकार !
मैं उसे सुभद्रा नाम से पुकारता हूँ। यह हमारे अड़ोस
पड़ोस के सभी लोग जानते हैं, आप उनसे भी पूछ सकते हैं।
बीरबल को उनके नाम के सम्बन्ध में और पूछ ताछ करने की
आवश्यकता नहीं जान पड़ी, इसलिये उसे वहीं तक रक्खा ।
इधर वेश्या भी समय पर उपस्थित हुई। इस मामले की