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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

१६२ अकबर बीरबलविनोद

१६२ अकबर बीरबलविनोद
जब उसका मिजाज कुछ ठिकाने आया तो उसने पुरोहित के
आनेका कारण पूछा। पुरोहित बीरबल का नाम लेकर बोला-
मैं तुम्हारी लड़की की शादी के लिये एक वर देख आया हूँ।
लड़का काशी में पढ़ रहा है; केवल तुम्हारी अनुमति की देर
थी। यदि कहो तो विवाह निश्चित किया जाय। रामबाई पुरो-
हित से बड़ी प्रसन्न हुई और उसका आदर सत्कार कर
बोली-"मुझे मंजूर है, आप जाकर पक्का कर आइये।"
पुरोहितजी फिर उल्टे पाँव बीरबल के पास पहुँचे और
दोनों पक्ष को राजी कर रामबाई की कन्या और बीरबल
के छोटे भाई की शादी पक्की कर दी। बीरबल पुरोहित का
आन्तरिक भाव पहले ही ताड़ गया था। इसलिये झूठ मूठ
अपना छोटा भाई होना बतला कर पुरोहित को फाँस लिया
था। इधर जब विवाह पक्का हो गया तो वह एक सजातीय
अनाथ लड़के की खोज में पड़ा। कहा भी है-
जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
हौं बौरी ढूढ़न गई, रही किनारे बैठ॥
दो तीन दिनों के प्रयास करने ही से उसे एक लड़का
२०, २५ वर्ष का मिल गया। वह अपने पेट पालन के फिराक
में दिहात से ऊबकर दिल्ली नगर में आया था, हाँ इतना अव-
श्य था कि उसने पहले कुछ विद्या भी हासिल कर ली थी।
बीरबल उस लड़के को आश्रय देने का वचन देकर अपने घर
ले गया और उसको समझा बुझा कर बोला-"देखो मैं तुम्हारा
विवाह रामबाई की कन्या से करा दूँगा और तुम्हें निर्वाह
मात्र के लिये सारा सामान भी दूँगा, परन्तु एक बात तुमको