१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
About this granth
This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.
As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.
The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.
अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र १४ २५५
क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा
क्षत्रस्य योनैर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं
य उ एनꣳ हिनस्ति स्वाꣳ स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयाꣳसꣳ हिꣳ सित्वा ॥
सबसे पहले ब्रह्म (ब्राह्मण वर्ण) ही था; किन्तु एकाकी होने के कारण वह अपनी वृद्धि करने में
समर्थ न हो सका। अस्तु, उसने क्षत्रिय वर्ण का सृजन किया। देवों में वरुण, इन्द्र, सोम, रुद्र, पर्जन्य, मृत्यु,
यम और ईशान ये सभी क्षत्रिय ही हुए, इसीलिए क्षत्रिय सर्वोत्कृष्ट हैं। इसी कारण राजसूय यज्ञों में ब्राह्मण
भी क्षत्रिय से नीचे आसीन होकर उसकी (क्षत्रिय की) उपासना (सम्मान) करता है। यह ब्रह्म (ब्राह्मण)
क्षत्रिय की ही योनि है। अतः यद्यपि (राजसूय यज्ञ के क्रम में) क्षत्रिय उत्कृष्ट है, तो भी यज्ञ के पश्चात् वह
ब्राह्मण का ही आश्रय ग्रहण करता है। जो क्षत्रिय ब्राह्मण को हिंसित करता है, वह अपनी ही योनि को
विनष्ट करता है। वह अपने श्रेष्ठ आधार की हिंसा करने वाला व्यक्ति 'पापीयान्' (बड़ा पापी या पाप कर्म
का आधार) बन जाता है ॥ ११ ॥
[ प्रारम्भ में सभी ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण जैसा जीवन जीते थे। समाज बढ़ा तो रक्षा करने वालों की आवश्यकता
पड़ी। रक्षक वर्ग ( क्षत्रिय ) का विकास उन्हीं ब्रह्मनिष्ठों के बीच से किया गया। रक्षण कार्य के सन्दर्भ में उन्हें ही
सर्वश्रेष्ठ माना गया। ]
स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो
रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ १२ ॥
वह ब्रह्म (ब्राह्मण) क्षत्रिय का सृजन करने के बाद भी अपनी वृद्धि में सक्षम नहीं हुआ, तब उसने
वैश्य वर्ण का सृजन किया। वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेवा और मरुत् ये समस्त देवगण वैश्य कहलाते हैं ॥
[ समाज का और विकास हुआ, तो पुनः उभरी आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन, वितरणपरक वैश्य
वर्ण को उसी समाज में से विकसित किया गया।]
स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेयꣳ हीदꣳ सर्वं पुष्यति यदिदं किंच ॥
इसके अनन्तर (अर्थात् क्षत्रिय और वैश्य की रचना के बाद) भी वह ब्रह्म प्रवृद्ध न हो सका, तब
उसने शूद्र वर्ण की रचना की । पूषा देवता शूद्र वर्ण के हैं। यह पृथ्वी माता भी पूषा देवता ही है, क्योंकि
यह समस्त प्राणियों का पोषण करती है ॥ १३ ॥
स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो
अबलीयान् बलीयाꣳ समाशꣳसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं
वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तꣳ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ १४ ॥
इतने (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों का सृजन करने) पर भी वह (ब्रह्म) प्रवृद्ध (सृष्टि कर्म
का विस्तार) नहीं हुआ, तब उसने श्रेय स्वरूप धर्म की उत्पत्ति की। धर्म ही क्षत्रियों (शासकों) का भी
क्षत्र (शासक-रक्षक है); अस्तु धर्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। राजा की तरह बलहीन व्यक्ति भी धर्म की
शक्ति से अधिक बल सम्पन्नों पर नियन्त्रण करने में सक्षम होता है। धर्म ही सत्य है। इसी कारण सत्य वचन
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बोलने वालों को धर्मयुक्त वचन बोलने वाला और धर्म वचन बोलने वालों को सत्यवादी कहते हैं,
अस्तु, इन दोनों में कोई भेद नहीं है ॥ १४॥
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण
क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे
मनुष्येष्वेताभ्याग्ँहि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति
स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविद्
महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव
लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। इन वर्णों का रचयिता ब्रह्म देवताओं में अग्नि रूप से
श्रेष्ठ (ब्राह्मण) हुआ। वह (ब्रह्म) मनुष्यों में ब्राह्मण रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय रूप से क्षत्रिय, वैश्य रूप से
वैश्य और शूद्र रूप से शूद्र रूप में प्रकट हुआ। इसी कारण अग्निहोत्रादि धर्मकृत्य करके मनुष्य देवों से
कर्मफल की इच्छा करता है, क्योंकि ब्रह्म इन्हीं दो रूपों से अभिव्यक्त हुआ था। स्वलोक अथवा अपने
आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, अन्यथा अपने लोक और परलोक का सुधार असम्भव है। ऐसे व्यक्ति
का पुण्य भी व्यर्थ ही हो जाता है, जिसने आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया। आत्मा के उपासक के पुण्य कृत्य
कभी क्षीण नहीं होते, वरन् उसकी समस्त आकांक्षाएँ पूर्ण होती हैं॥ १५॥
अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ
यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ
यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति
तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाग्ंस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा
ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवग्ँ हवैंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं
मीमाग्ँसितम् ॥ १६ ॥
यह आत्मा समस्त जीवों का आश्रय प्रदाता है, अर्थात् उनका लोक है। यह (आत्मा) हवन-यज्ञ
करने से देवताओं का लोक (आश्रयदाता) होता है। स्वाध्याय (वेदों का पठन-पाठन) करने से ऋषियों
का, सन्तानोत्पादन (की इच्छा) करने तथा पिण्डदान करने से पितरों का, मनुष्यों को आश्रय स्थल और
भोज्य पदार्थ देने से मनुष्यों का, पशुओं को तृण-जल आदि देने से पशुओं का तथा गृह स्थित कुत्ते, बिल्ली,
पक्षी एवं चींटी आदि जीवों का आश्रय प्रदाता होता है, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोक
में (सभी) अपने शरीर की सुरक्षा चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जानने वाले की सभी जीव सुरक्षा चाहते हैं।
इस प्रकार उस कर्म की अनिवार्यता [पंच महायज्ञ प्रकरण में] ज्ञात है और इसकी मीमांसा की गई है॥
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे
स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छग्ँश्चनातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतह्यैकाकी
कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं
न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा
चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवग्ं श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना
हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदग्ं सर्वं
यदिदं किंच तदिदग्ं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७॥
सृष्टि के प्रारम्भ में यह आत्मा बिल्कुल अकेला था, उसने स्त्री (पत्नी) की कामना की, फिर प्रजा
(सन्तति) प्राप्ति की कामना की। इसके पश्चात् इच्छा की कि मेरे पास धन हो, जिससे मैं कर्म कर सकूँ।
मानवों की प्रायः इसी स्तर की कामनाएँ होती हैं और वे इससे अधिक प्राप्त भी नहीं कर पाते। इन
कामनाओं की पूर्ति के अभाव में वे अपने को अपूर्ण ही मानते रहते हैं। यदि वे चाहें, तो इस अपूर्णता की
पूर्ति इस दृष्टिकोण द्वारा कर सकते हैं- अपने मन को आत्मा मानें, वाणी को स्त्री, प्राण को सन्तति, चक्षु
को मानवी सम्पदा और श्रोत्रेन्द्रिय को दिव्य सम्पदा मानें। इस प्रकार साधन सम्पन्न पुरुष का शरीर ही कर्म
है; क्योंकि शरीर से ही कर्म किया जाता है। इसलिए यह यज्ञ पाङ्क्त (पाँच-आत्मा, वाणी, प्राण, चक्षु
एवं श्रोत्र से सम्पन्न होने वाला ) है। समस्त जीवों में ये पाँचों विद्यमान हैं। अतः पशु पाङ्क्त है, पुरुष पांक्त
है तथा अन्य भी जो कुछ है सब पाङ्क्त है, अर्थात् यह सृष्टि ही पञ्च तत्त्वात्मक यज्ञ स्वरूप है। इस ज्ञान
को इस प्रकार जानने वाले को इन सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् ।
त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत्तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न
कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स
देवानपि यच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १॥
परमपिता ने ज्ञान और तप के प्रभाव से सात प्रकार के अन्नों का सृजन किया। उन अन्नों में एक प्रकार
का अन्न सभी के लिए, दो का देवताओं के निमित्त, तीन का अपने निमित्त और एक का पशुओं के निमित्त
वितरण कर दिया। पशुओं को प्रदान किये गये उस अन्न में प्राणन क्रिया करने वाले और न करने वाले
(श्वास लेने और न लेने वाले) सभी प्रतिष्ठित हैं। इन अन्नों का सदैव भक्षण किया जाता है, फिर भी ये
क्षीण नहीं होते, इसका क्या कारण है? इस प्रकार सभी को सभी का अन्न भाग देने के अक्षय भाव को जो
जानता है, वह अन्नोपभोग करते हुए कभी क्षीण नहीं होता अर्थात् अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ १॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति मेधया हि तपसाऽजनयत्पितैकमस्य
साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते
मिश्रग्ं ह्येतद्द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो
आहुर्दर्शपूर्णमासाविति। तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात्पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः पयो
२५८ बृहदारण्यकोपनिषद्
होवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं
वानुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति। तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च
नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा
जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपज-
यत्येवंविद्वान्सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति
पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते यो वै -तामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः
स हीदमन्नं धिया धिया जनयते । कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति
मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत्स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ २ ॥
पिता-प्रजापति ने अपने तप और ज्ञान से जिन सात अन्नों को उत्पन्न किया, उनमें से एक अन्न ( धरती
से उत्पन्न खाद्य) सामान्य है। उसमें सभी की साझेदारी है, अतः सभी को समान रूप से उसका उपभोग
करना चाहिए। सबके लिए निर्धारित इस अन्न का अकेले ही उपभोग करने वाला कभी पाप से विमुक्त नहीं
होता। पूर्व वर्णित जिन दो अन्नों को देवताओं के निमित्त बताया गया, उनमें एक हुत अर्थात् (हवन द्वारा
दिया जाने वाला) और दूसरा प्रहुत (प्रत्यक्ष में अर्पित किया जाने वाला) है। कुछ विद्वान् इसे दर्श और
पूर्णमास भी कहते हैं। (क्योंकि यज्ञ देवों के लिए निर्धारित है, इसलिए) यज्ञों को काम्य (लौकिक
कामनाओं की पूर्ति के लिए) न करें। पशुओं के निमित्त दिया गया अन्न, दूध (पय-पान करने योग्य) है।
मनुष्य और पशु दोनों ही उस अन्न का सेवन करते हैं। शीघ्र उत्पन्न हुए शिशु को घृत चटाते हैं अथवा
स्तनपान कराते हैं। बछड़ा भी जन्म लेने के तुरन्त बाद घास ग्रहण नहीं करता, वरन् दुग्ध पान ही करता है।
श्वास लेने और न लेने वाले सभी जीव दूध में ही प्रतिष्ठित हैं। अस्तु, जिनका यह कथन है कि एक वर्ष तक
(दूध से) निरन्तर अग्निहोत्र करने वाला मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है (उनका यह कथन समीचीन
नहीं); वरन् यह मानना चाहिए कि जिस दिन वह यज्ञ सम्पन्न करता है, उसी दिन मृत्यु पर विजय प्राप्त
कर लेता है। ऐसा जानने वाला देवताओं को उनके सेवन योग्य अन्न प्रदान करता है। बारम्बार भक्षित होने
पर भी वह अन्न क्षीण क्यों नहीं होता ? वह इसलिए क्षीण नहीं होता; क्योंकि वह पुरुष क्षयरहित है और
पुनः-पुनः अन्नोत्पादन करने में समर्थ है। वह अविनाशी पुरुष कर्म और बुद्धि के संयोग से अन्नोत्पादन
करता है। यदि वह पुरुष कर्म और बुद्धि से हीन हो जाए, तो अन्न और अन्नोत्पादन भी समाप्तप्राय हो
जाए। उस अन्न का सेवन मुख के माध्यम से किया जाता है, इसी कारण देवताओं को भी वह प्राप्त हो जाता
है और अमृतत्व प्रदायक होता है। यह इसकी (फलश्रुति) प्रशंसा है ॥ २ ॥
['श्वास लेने वाले और न लेने वाले सभी 'पय' पर निर्भर हैं', इस कथन में 'पय' का अर्थ स्थूल दूध नहीं
लिया जा सकता, यहाँ तो 'पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः'- आदि कहकर जिस कारण
रूप पान करने योग्य पोषक प्रवाह की ओर संकेत किया जाता है, उसे ही 'पय' मानना चाहिए। इसी प्रकार प्रकृति
के पाश में बँधे हुए चेतन को ही पशु मानना चाहिए।]
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र ८ २५९
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र ८ २५९
नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो
विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो
मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायैतैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान
उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
उस (पुरुष) ने तीन अन्नों का चयन अपने लिए किया। ये तीन अन्न-मन, वाणी और प्राण हैं।
मनोयोग से ही सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। यदि मन अन्यत्र है, तो समुचित रूप से देखा-सुना भी नहीं
जाता। इसीलिए प्रायः कहा जाता है- 'मेरा मन दूसरी जगह था, इसलिए मैं नहीं देख सका' तथा 'मेरा मन
यहाँ नहीं था, इसलिए मैं नहीं सुन सका।' अतः स्पष्ट है कि व्यक्ति मन से ही देखता और सुनता है। काम,
सङ्कल्प, श्रद्धा, संशय, अश्रद्धा, धारण शक्ति (धृति), अधृति, ही अर्थात् लज्जा, बुद्धि और भय ये सभी मन
स्वरूप हैं। इसी कारण शरीर के पृष्ठभाग (पीठ) की ओर से स्पर्श किये जाने पर मनुष्य मन द्वारा इसे जान
लेता है। समस्त शब्द ही वाक् शक्ति अर्थात् वाणी हैं, जिसके द्वारा समस्त अभिप्राय अभिव्यक्त किये जा
सकते हैं। शरीर स्थित पञ्चप्राण हैं- प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान। आत्मा की निर्भरता (शरीर
में रहने की स्थिति) इन्हीं पंच प्राणों पर आधृत है॥ ३॥
[ जिस प्रकार हुत एवं प्रहुत से शरीर और प्रकृति में स्थित देवों को तृप्त और पुष्ट किया जाता है, उसी प्रकार
मन, वाणी और प्राण से ब्रह्म को शरीरस्थ और प्रकृति में व्याप्त ब्राह्मी चेतना को तृष्ट-पुष्ट किया जा सकता है।
इन तीनों का प्रयोग ब्रह्म के निमित्त ही करना चाहिए-भोगादि के लिए नहीं। जो ऐसा करता है, वही ब्रह्मनिष्ठ
ब्राह्मण या ब्रह्मचारी कहा जा सकता है।]
त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥
पूर्व वर्णित मन, वाणी और प्राण ये ही तीनों लोक हैं। वाक् पृथिवी लोक है (इसीलिए पृथिवी पर
वाणी द्वारा ही समस्त कार्य सम्पादित होते हैं)। मन अन्तरिक्ष लोक है और प्राण द्यु (स्वर्ग) लोक है॥ ४॥
त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥
ये (वाणी, मन और प्राण) ही तीनों वेद हैं। वाक् शक्ति ऋग्वेद, मन यजुर्वेद और प्राण ही सामवेद है॥
देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥
ये तीनों ही देवता, पितरगण और मनुष्य हैं। वाक् शक्ति ही देवता, मन पितरगण और प्राण मनुष्य है॥ ६॥
पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ ७ ॥
ये तीनों माता, पिता और प्रजा (सन्तान) हैं। वाक् माता, मन पिता और प्राण प्रजा-सन्तति रूप है॥
विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत् किंच विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता
वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥
ये ही विज्ञात (जाने हुए), विजिज्ञास्य (जानने योग्य) और अविज्ञात (न जाने हुए) हैं। जाना
हुआ (ज्ञान) ही वाक् है। वाक् शक्ति ही विज्ञात है। यह वाक् ही ज्ञानस्वरूप होकर अपने जीवात्मा
(अपने ज्ञाता) की रक्षा करती है॥ ८॥
२६० बृहदारण्यकोपनिषद्
यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥
जो कुछ भी जानने योग्य है, वह मन का ही स्वरूप है। वास्तव में मन ही जानने योग्य या
विजिज्ञास्य है (क्योंकि सन्देह आदि भाव मन में ही उत्पन्न होते हैं)। वही (मन ही) विजिज्ञास्य
होकर उसका संरक्षण करता है ॥ ९॥
यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥
जो कुछ भी अनजाना (अविज्ञात) है, वह प्राणस्वरूप है; क्योंकि वह अविज्ञात (छुपा) रहकर भी
शरीर का संरक्षण करता है ॥ १० ॥
तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतिरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी
तावानयमग्निः ॥ ११ ॥
उस वाक् शक्ति का शरीर, पृथिवी और ज्योतिष्मान् रूप अग्नि है। वाक् शक्ति की मात्रा जितनी ही
पृथिवी है और उतना ही अग्नितत्त्व है ॥ ११ ॥
अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतिरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती
द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन ँ समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो
द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
द्युलोक मन की काया और आदित्य उसका (मन का) ज्योतिष्मान् स्वरूप है। जितने परिमाण का
मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही आदित्य है। उन (आदित्य और अग्नि) के परस्पर संयोग से ही
प्राण तत्त्व का उद्भव हुआ। प्राण को ही इन्द्र और शत्रुहीन कहा गया है। प्रतिपक्षी को ही सपत्न अर्थात्
शत्रु कहते हैं। इस तथ्य को इस प्रकार जानने वाले का कोई सपत्न (शत्रु) नहीं होता ॥ १२ ॥
अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतिरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य
आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्त ँ
स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तः स लोकं जयति ॥ १३ ॥
जल उस प्राण का शरीर, चन्द्रमा ज्योतिष्मान् स्वरूप है। वहाँ प्राण के परिमाण जितना ही जल और
चन्द्रमा है। ये सभी बराबर और अन्तरहित हैं। जो कोई इन्हें अन्तयुक्त समझकर उनकी उपासना करता है,
उसे अन्तयुक्त लोक पर विजय प्राप्त होती है और जो अनन्त समझकर इनकी उपासना करता है,वह अनन्त
लोक पर विजय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला ध्रुवैवास्य
षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्या ँ रात्रिमेतया षोडश्या
कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेता ँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न
विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४ ॥
वह (ऊपर वर्णित) संवत्सर ही प्रजापति है। जिसकी सोलह कलाएँ हैं। रात्रियाँ उनकी पन्द्रह
कलाएँ हैं। उसकी सोलहवीं कला नित्या (ध्रुवा) है। रात्रियों के माध्यम से ही वह (शुक्ल पक्ष में) प्रवृद्ध
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र १७ २६१
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र १७ २६१
और (कृष्ण पक्ष में) क्षीण होता है। वह प्रजापति अमावस्या की रात्रि में अपनी सोलहवीं कला के माध्यम से सबमें
प्रविष्ट होकर प्रातः काल में पुनः प्रकट होता है। अस्तु, अमावस्या की रात्रि में किसी की हिंसा नहीं करनी चाहिए और
देवता को बलि प्रदान करने के निमित्त भी किसी गिरगिट तक का वध नहीं करना चाहिए ॥ १४ ॥
यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलो ऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव
पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं
यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीर्यत आत्मना चेज्जीवति
प्रधिनागादित्येवाहुः ॥ १५ ॥
षोडश कलायुक्त यह संवत्सर निश्चित ही प्रजापति है। धन उसकी पन्द्रह कलाएँ और आत्मा (शरीर)
उसकी सोलहवीं कला है। वह धन से ही प्रवृद्ध और क्षीण होता है। आत्मा इसकी नाभि और धन-सम्पदा
प्रधि अर्थात् रथ के पहिए का बाहरी घेरा है। इसीलिए पुरुष का यदि सर्वस्व (सम्पूर्ण धन) हरण हो जाए
और आत्मा (आत्मबल) बना रहे, तो यह कहा जाता है कि केवल प्रधि बाहर से ही क्षीण हुआ है (अर्थात्
सम्पूर्ण धन के नष्ट होने पर भी व्यक्ति तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक उसका जीवन है) ॥ १५ ॥
अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः
पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां
श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥
निश्चित ही ये तीन लोक हैं- मनुष्य लोक, पितृलोक और देवलोक। मनुष्य लोक पुत्र के द्वारा जीता जा
सकता है, अन्य किसी के द्वारा नहीं। पितृलोक कर्म से और देवलोक विद्या द्वारा जीता जा सकता है। समस्त
लोकों में देवलोक ही उत्कृष्ट है, इसी कारण विद्या को भी सर्वश्रेष्ठ कहकर उसकी प्रशंसा की जाती है ॥ १६ ॥
अथातः संप्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः
प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किंचानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च
यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्वा
इदं सर्वमेतन्मा सर्वं सन्नयमतोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मा-
देनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति स यद्यनेन
किंचिदक्ष्णयाकृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स
पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥
अब 'सम्प्रति' (इस नाम से जानी जाने वाली प्रक्रिया) कहते हैं। जब पिता दुनिया से गमन करने की
स्थिति में होता है अथवा स्वयं को पुत्र का मार्गदर्शक समझता है, तो वह पुत्र से कहता है- तुम ब्रह्म हो,
यज्ञ हो, लोक हो। इसका प्रत्युत्तर देते हुए पुत्र कहता है- मैं ब्रह्म हूँ, यज्ञ हूँ, लोक हूँ। [इस संवाद का
भाव यह है कि पिता अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञानी, यज्ञ परायण और लोक में कीर्तिवान् बनने का शिक्षण देता
है और पुत्र उसे ग्रहण करता है।] इस विश्व में जो कुछ भी अनूक्त (स्वाध्याय या ज्ञान) है, वह सब 'ब्रह्म'
से एकीकृत है, जो कुछ भी 'यज्ञ' है (किए हुए अथवा बिना किये हुए) वे सब 'यज्ञ' शब्द से एकीकृत
२६२ बृहदारण्यकोपनिषद्
हैं और जो भी लोक हैं (जीते हुए अथवा बिना जीते हुए) वे 'लोक' शब्द से एकीकृत हैं। यही गृहस्थ
का कर्त्तव्य है। पिता की इच्छा होती है कि पुत्र उसकी आज्ञा का पालन अवश्य करेगा। इसीलिए शिक्षित
पुत्र अनुशासन का पालन करते हुए लोक में पुण्य कृत्य करता है, अतः उसे 'लोक्य' कहते हैं। इस प्रकार
ज्ञान रखने वाला पिता जब इस मर्त्य लोक से गमन करता है, तो प्राणों (अंश) के माध्यम से पुत्र में प्रतिष्ठित
होता है (अर्थात् अपनी सम्पूर्ण जिम्मेदारी पुत्र को सौंपता है)। यदि किसी कारण (या प्रमादवश) पिता के
द्वारा कोई करणीय कार्य शेष रह जाता है, तो पुत्र उसे पूर्ण कर देता है। इस प्रकार इह लोक में पिता को
अपने पुत्र के माध्यम से ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। पिता के साथ उसके अमृत प्राण ही गमन करते हैं ॥ १७॥
पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥
मनुष्य की वाक् शक्ति पृथिवी और अग्नि से युक्त होती है। वह दिव्य वाणी कहलाती है; क्योंकि उस
वाक् (वाणी) के माध्यम से वह (पिता) जो भी कहता है, वह पूर्ण होता जाता है ॥ १८ ॥
दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥
द्युलोक और आदित्य के द्वारा इसमें दिव्य मन आवेशित हो जाता है। दिव्य मन से युक्त होने के कारण
यह सदैव आनन्दमग्न रहता है, कभी भी शोकग्रस्त नहीं होता ॥ १९ ॥
अद्द्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः संचरँश्चासंचरँश्च
न व्यथतेऽथो न रिष्यति स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां
देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविद सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किंचेमाः प्रजाः
शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २० ॥
जल और चन्द्रमा के माध्यम से यह प्राण तत्त्व इस तत्त्वद्रष्टा में आवेशित होता है। यह दिव्य प्राण ही
है, जो सञ्चरित होते हुए और न होते हुए भी कभी व्यथित नहीं होता और न ही कभी विनष्ट होता है। इस
तत्त्व को इस प्रकार जानने वाला सब प्राणियों में स्थित आत्मा प्राण देवता के समतुल्य हो जाता है। समस्त
प्राणी जैसे प्राण देवता को पोषित करते हैं, ठीक उसी तरह तत्त्वदर्शी को पोषित करते हैं। लौकिक दुःखों
में लिप्त रहकर ये सांसारिक प्राणी शोक ग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु तत्त्व को जानने वाले पुरुष (दुःखों में भी)
कभी शोक नहीं करते और देवत्व प्राप्त कर लेने के कारण पाप भी कभी उनके समीप नहीं आता ॥ २० ॥
अथातो व्रतमीमांसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त
वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दधे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि
कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्द्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध
तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः
प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिर अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरँश्चासंचरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति
हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा
इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा
स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१॥
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र २३ २६३
अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र २३ २६३
अब व्रत (कर्तव्य) के विषय में वर्णन किया जाता है। प्रजापति ने कर्मों (कर्म की साधनभूत
इन्द्रियों) की रचना की। सृजित होने के बाद वे इन्द्रियाँ परस्पर स्पर्धा करने लगीं। वाक् शक्ति ने कहा (व्रत
लिया) कि मैं बोलती ही रहूँगी, चक्षु ने कहा मैं देखता ही रहूँगा और श्रोत्र ने कहा मैं सुनता ही रहूँगा। इसी
प्रकार अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार समस्त इन्द्रियों ने व्रत धारण किया, तब मृत्यु देवता ने श्रम करके
उनमें व्याप्त होकर समस्त इन्द्रियों की कार्यप्रणाली में अपराध उत्पन्न कर दिया, उनकी कार्य क्षमता समाप्त
कर दी। इसीलिए मृत्यु के समय वाणी, नेत्र और श्रोत्र सभी निष्क्रिय हो जाते हैं; परन्तु प्राण मृत्यु को प्राप्त
नहीं होता है। सभी इन्द्रियों ने यह जानकर प्राणतत्त्व की श्रेष्ठता को अंगीकार कर लिया, क्योंकि वह
संचरित होता और न होता हुआ न कभी व्यथित होता है और न ही कभी समाप्त होता है। अस्तु, समस्त
इन्द्रियाँ भी प्राणमय हो गईं। इसी कारण वे प्राण कहकर ही पुकारी जाती हैं। इस तत्त्व को जो जानता है,
उसका वंश भी उसी के नाम से चलने लगता है। उस विद्वान् के प्रतिस्पर्धी शुष्कता को प्राप्त करते हुए विनष्ट
हो जाते हैं, इसे अध्यात्म प्राण दर्शन कहते हैं ॥ २१ ॥
अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति
चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतं स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां
वायुर्म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥
अब अधिदैव दर्शन विवेचित किया जाता है- अग्नि ने व्रत लिया कि मैं निरन्तर जलता ही रहूँगा। सूर्य
ने निश्चय किया कि मैं तपता ही रहूँगा और चन्द्रमा ने निश्चय किया कि मैं प्रकाशित ही होऊँगा। इसी प्रकार
अन्य समस्त देवों ने भी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार निश्चय किये। जिस प्रकार इन्द्रियों के बीच में
प्राण स्थित है, ठीक उसी प्रकार (अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि) देवताओं में भी वायु तत्त्व प्रतिष्ठित है; क्योंकि
अन्य देवता तो अस्त को प्राप्त हो जाते हैं, किन्तु वायुदेव कभी अस्त नहीं होते ॥ २२ ॥
अथैष श्लोको भवति यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति
प्राणेऽस्तमेति तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति यद्वा एतेऽमुर्ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य
कुर्वन्ति। तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युरान्रुवदिति यद्यु
चरेत्समापिपयिषेत्तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ॥ २३ ॥
इसी विषय को प्रतिपादित करने वाला यह श्लोक है- यह आदित्य जहाँ से उदित होता है, वहीं
अस्त हो जाता है अर्थात् यह सूर्य निश्चित ही प्राण से उदित होता है और प्राण में ही अस्त हो जाता
है। इस धर्म को देवों ने भी धारण किया। वह व्रत (धर्म) आज विद्यमान है और कल (भविष्य
में भी) रहेगा। देवों ने जिस व्रत को उस समय धारण किया था, उसे अब भी करते हैं- अस्तु, सभी
को एक ही व्रत का आचरण करना चाहिए। रेचक और पूरक क्रिया करके प्राणायाम करे, ताकि
कहीं पापरूपी मृत्यु हमारा स्पर्श न कर ले (हमें जीत न ले)। यदि किसी व्रत को धारण करे, तो
उसके समापन की भी इच्छा करे अर्थात् उसका विधिवत् समापन भी करे- पूर्ण भी करे। ऐसा करने
से वह इस (प्राण और वायु) देवता के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त करता है ॥ २३ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
२६४ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
त्रयं वा इदं नामरूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि
नामान्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा१ सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि
नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥
इस संसार में जो कुछ भी है, वह नाम, रूप और कर्म इन तीनों का ही समुदाय है। इन नामों का
उक्थ (उपादान) 'वाणी' है; क्योंकि समस्त नामों की उत्पत्ति इस वाणी से ही होती है। यह वाणी ही
इन नामों का साम है, क्योंकि यही समस्त नामों के समतुल्य है। नामों का ब्रह्म भी यह (वाणी) है; क्योंकि
समस्त नामों को वाणी ही धारण करती है ॥ १ ॥
अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा१ सामैतद्धि
सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥
समस्त रूपों का उक्थ (उपादान) चक्षु है, क्योंकि समस्त सूर्य इस चक्षु से ही उत्पन्न होते हैं। समस्त
रूपों के साथ यह समान भाव रखता है, इसलिए यह चक्षु समस्त रूपों का साम है। समस्त रूपों को धारण
करने से यह (चक्षु) ही इन रूपों का ब्रह्म है ॥ २ ॥
अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा१ सामैतद्धि
सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रय१
सदेकमयमात्मात्मो एकः सन्नेतत्रयं तदेतदमृत१ सत्येन छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे
सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥
समस्त कर्मों का उक्थ (उपादान कारण) यह आत्मा (शरीरस्थ जीवात्मा) है, क्योंकि समस्त कर्म
शरीर से ही उत्पन्न होते हैं, यह समस्त कर्मों का साम है, क्योंकि यह सब कर्मों का धारणकर्ता होने से यह
(आत्मा या शरीर) सब कर्मों का ब्रह्म है। आत्मा के द्वारा ही नाम, रूप और कर्म ये तीनों उत्पन्न हुए हैं।
अतः ये तीन (पृथक्) होते हुए भी एक आत्मा ही है और यह आत्मा एक होते हुए भी तीन (में विभक्त)
है। यह आत्मा सत्य से आच्छादित और अमृत है। प्राण ही अमृत स्वरूप है। नाम और रूप ही सत्य है।
इन दोनों (अमृत और सत्य) से ही यह प्राण आच्छन्न है ॥ ३ ॥
अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र ४ २६५
अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र ४ २६५
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स
होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥
(कभी) गर्ग गोत्रीय बालाकि नामक वेद प्रवक्ता ने काशी नरेश अजातशत्रु से अहंकार पूर्ण वाणी में
कहा कि मैं आपको ब्रह्मज्ञान का उपदेश करूँगा, तब काशी नरेश अजातशत्रु ने कहा- इसके निमित्त मैं
आपको एक सहस्र गौएँ प्रदान करता हूँ; क्योंकि प्रजाजन (ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु) 'जनक' 'जनक'
कहकर उन्हीं की ओर दौड़ते रहते हैं (अर्थात् सभी प्रजाजन यही कहते हैं कि जनक बहुत बड़े दाता हैं
और बहुत बड़े श्रोता भी। मुझे ब्रह्मज्ञान देने का वचन देते ही आपने मेरे लिए दोनों बातें सुगम कर दीं।
इसलिए मैं आपको एक हजार गौएँ प्रदान करता हूँ।) ॥ १ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास
इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥
तब गर्गवंशी उन बालाकि ने कहा कि मैं आदित्य स्थित पुरुष की ब्रह्मरूप में उपासना करता हूँ। यह
सुनकर अजातशत्रु ने कहा-आप ऐसा न बोलें, जो समस्त प्राणियों के मूर्धा स्वरूप हैं, दीप्तिमान् हैं एवं सबका
अतिक्रमण करके स्थित हैं, उन ब्रह्म की मैं उपासना करता हूँ। ऐसा जानते हुए जो उस ब्रह्म की उपासना
करता है, वह समस्त भूतों में उनकी मूर्धा (मस्तक) स्वरूप स्थित होता हुआ सबका राजा होता है॥ २ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा बृहत्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्तेऽहरहहं सुतः प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥
इसके पश्चात् उन गार्ग्य बालाकि ने कहा कि चन्द्रमा में स्थित पुरुष की मैं ब्रह्म मानकर उपासना
करता हूँ। (यह सुनकर) राजा अजातशत्रु बोले- आप ऐसा न कहें, यह चन्द्रमा शुभ्र वस्त्र धारण करने
वाला देदीप्यमान और राजा सोम है, ऐसा मानकर मैं इसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जान कर इसकी
उपासना करने वाले की सम्पन्नता सदैव बनी रहती है और उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता ॥ ३ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥
वेद प्रवक्ता बालाकि ने कहा- मैं तो विद्युत् के अन्तर्गत निहित शक्ति को ही ब्रह्म मानकर
उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु बोले-नहीं, नहीं-ऐसा न कहो, मैं तो विद्युत् को तेजःस्वरूप
मानकर उपासना करता हूँ। ऐसा मानकर जो ब्रह्म की उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और
उसकी सन्तति भी तेजस्विनी होती है ॥ ४॥
२६६ बृहदारण्यकोपनिषद
स होवाच गार्ग्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजा-
तशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥
उन गर्गवंशी बालाकि ने कहा- आकाशस्थ पुरुष को ही ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ।
इस पर अजातशत्रु ने कहा- नहीं व्यर्थ वार्ता न करो, मैं उस आकाश तत्त्व को पूर्ण मानकर उसकी
उपासना करता हूँ। इस तथ्य को इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करने वाला सदैव प्रजा (सन्तान) और
पशुओं से परिपूर्ण रहता है। उसकी प्रजा कभी विनष्ट नहीं होती ॥ ५ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६॥
इसके बाद बालाकि ने कहा- मैं वायु स्थित पुरुष को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ, तब
राजा अजातशत्रु बोले- आप ऐसा न कहें, मैं इस वायु की इन्द्र, बैकुण्ठ और अपराजिता सेना के रूप में
उपासना करता हूँ। जो इस वायु की इस प्रकार (उपर्युक्त रूप में) जानकर उपासना करता है, वह प्रसिद्ध
विजयशील, अपराजित (जिसे कोई पराजित न कर सके) और शत्रु विजेता होता है ॥ ६॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह
भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७॥
वे गर्गवंशी बोले-मैं तो अग्नि में स्थित पुरुष (अथवा आग्नेय शक्ति) को ब्रह्म मानकर उपासना करता
हूँ। तब काशी नरेश अजातशत्रु ने कहा-ब्रह्म के सम्बन्ध में व्यर्थ प्रलाप मत करो, मैं तो अग्नि की विषासहि
(सब कुछ सहन करने की या सब कुछ आत्मसात् कर लेने की सामर्थ्य) को ब्रह्म मानकर उपासना करता
हूँ। अग्नि के सम्बन्ध में इस प्रकार जानने वाला विषासहि होता है और उसकी प्रजा भी विषासहि होती है॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपग्
हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥८॥
तत्पश्चात् बालाकि गार्ग्य ने कहा-जल में स्थित पुरुष को ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ,
यह सुनकर राजा अजातशत्रु बोले- ऐसा न कहो, मैं तो जल तत्त्व को प्रतिरूप मानकर उसकी उपासना
करता हूँ। ऐसा जानकर उपासना करने वाला अपना प्रतिरूप प्राप्त करता है। उसे कभी अपना अप्रतिरूप
प्राप्त नहीं होता और उससे प्रतिरूप (पुत्र) उत्पन्न होता है ॥ ८॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते रोचिष्णुर्ह
भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वाँस्तानतिरोचते ॥९॥
अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र १३ २६७
अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र १३ २६७
इसके बाद वे गर्गवंशी बालाकि बोले-दर्पण स्थित छाया पुरुष को ही ब्रह्म मानकर मैं उसकी
उपासना करता हूँ। इसके बाद अजातशत्रु ने कहा- ऐसा न कहें, मैं तो इसे देदीप्यमान (रोचिष्णु) मानकर
इसकी उपासना करता हूँ। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह प्रकाशमान होता है।
उसकी प्रजा (संतान) और सहचर भी प्रकाश सम्पन्न अर्थात् तेजस् सम्पन्न होते हैं॥ ९॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
सर्वं् हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥ १०॥
वे गार्ग्य बालाकि बोले- गमन करने वाले के पीछे जो शब्द होता है, मैं उसी को ब्रह्मरूप मानकर
उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा कि ऐसा न कहें, मैं तो उसे प्राण के रूप में उसकी उपासना
करता हूँ। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है। उसकी
अकाल मृत्यु नहीं होती ॥ १०॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान्
ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥
वे बालाकि गार्ग्य बोले कि मैं दिशाओं में स्थित पुरुष (शक्ति) को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता
हूँ। इस पर अजातशत्रु ने कहा-नहीं-नहीं ऐसा न कहो, मैं इसे द्वितीय और वियुक्त न होने वाला मानकर उसकी
उपासना करता हूँ। उस ब्रह्म को इस प्रकार जानने वाले साथी युक्त होते हैं और वे साथी उन्हें कभी नहीं त्यागते ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
सर्वं् हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥
गार्ग्य ने कहा मैं छायामय पुरुष को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ। काशी नरेश
अजातशत्रु ने कहा कि व्यर्थ बात न करो, मैं तो छाया पुरुष को मृत्यु समझकर उसकी उपासना करता
हूँ। जो इसकी ऐसा जानकर उपासना करता है, वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है तथा समय से पूर्व मृत्यु
उसे विनष्ट नहीं करती ॥ १२ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्त
आत्मन्वीह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥
बालाकि ने कहा- मैं आत्मस्थ पुरुष को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा-
ऐसा न कहो। मैं तो उसे ब्रह्म जिज्ञासु (आत्मन्वी) मानकर उपासना करता हूँ। उसे इस प्रकार जानकर जो
उपासना करने वाला होता है, वह ब्रह्म जिज्ञासु होता है एवं उसकी प्रजा (सन्तान) भी ब्रह्म जिज्ञासु होती
है। यह सुनकर बालाकि ने मौन धारण कर लिया ॥ १३ ॥
२६८ बृहदारण्यकोपनिषद्
स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच
गार्ग्य उपत्वायानीति ॥ १४ ॥
यह स्थिति देखकर अजातशत्रु बोले कि क्या इतना ही ज्ञान है ? बालाकि गार्ग्य ने कहा कि हाँ केवल
इतना ही ज्ञान है। अजातशत्रु ने कहा कि इतने मात्र से तो ब्रह्मज्ञान असम्भव है। तब गार्ग्य बोले कि क्या
मैं आपकी सेवा के लिए तैयार होऊँ ? ॥ १४ ॥
स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति
व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषः सुप्तमाजग्मतुस्त-
मेतैर्नामभिरामन्र्तयांचक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोमराजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं
बोधयांचकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥
(यह सुनकर) अजातशत्रु बोले- यह तो विपरीत तथ्य है कि कोई ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के
लिए किसी क्षत्रिय के पास जाए। तो भी मैं आपको ब्रह्म का उपदेश करूँगा (अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्रदान
करूँगा)। तब अजातशत्रु उठे और बालाकि का हाथ पकड़कर एक सोते हुए पुरुष के पास ले गये। राजा
अजातशत्रु ने उस सोते हुए पुरुष को हे ब्रह्मन् ! हे श्वेताम्बरधारी, हे सोम !, हे राजन्,! आदि कहकर जगाने
का प्रयत्न किया, किन्तु वह जाग्रत् स्थिति में नहीं आया। इसके बाद अजातशत्रु ने उसे झकझोर कर उठाने
का प्रयत्न किया, तब वह जागकर उठ बैठा ॥ १५ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत
एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
इसके पश्चात् राजा अजातशत्रु ने बालाकि गार्ग्य से प्रश्न किया कि इस प्रसुप्त व्यक्ति का (जीवात्मा)
विज्ञानमय पुरुष उस समय कहाँ था, जब वह सो रहा था और अब कहाँ से (जागने पर) यहाँ आ गया;
किन्तु बालाकि गार्ग्य इसे नहीं जान सका अर्थात् इस प्रश्न का उत्तर न दे सका ॥ १६ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन
विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति
नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतः श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७॥
तब अजातशत्रु ने कहा- जब वह (जीवात्मा) विज्ञानमय पुरुष प्रसुप्तावस्था में था, तब अपनी विज्ञान
की शक्ति से समस्त इन्द्रियों की शक्ति को अपने में एकत्र कर लिया था। सुप्त स्थिति में जीवात्मा हृदयाकाश
में स्थित रहकर इन्द्रियों को ग्रहण करता है। उस समय इसे 'स्वपिति' कहते हैं। उस समय प्राण, नेत्र, श्रोत्र
और मन सभी गृहीत स्थिति में होते हैं ॥ १७ ॥
स यत्रैतत्स्वप्न्यायाचरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण
उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं
परिवर्तैतवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥
अध्याय २ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २६१
अध्याय २ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २६१
जब यह जीवात्मा स्वप्नवृत्ति में होता है अथवा स्वप्नावस्था में होता है, तब उसके लोक अर्थात् कृत
कर्मों के प्रतिफल उदित होते हैं। उस समय वह विभिन्न प्रकार की स्थितियों को प्राप्त करता हुआ कभी
महाराजा, कभी महाब्राह्मण, कभी उच्चावस्था और कभी निम्नावस्था को प्राप्त होता है। वह प्रजा के साथ
भ्रमण करने के समान ही प्राणेन्द्रियों को लेकर शरीर में यथेच्छ स्थलों पर भ्रमण करता रहता है॥ १८ ॥
अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्त्राणि
हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो
वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥ १९ ॥
इसके बाद जब वह जीवात्मा सुषुप्तावस्था में होता है, तब उसे बाह्य जगत् का कुछ भी भान
नहीं रहता। उस समय हिता नामक (अथवा हितकारिणी) बहत्तर हजार नाड़ियाँ जो हृदय प्रदेश से
सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त हैं, उन्हीं के माध्यम से वह (जीवात्मा) बुद्धि के साथ सम्पूर्ण शरीर में
संव्याप्त होकर सो जाता है। जिस प्रकार कोई बालक, महाब्राह्मण या महाराजा अतिशय आनन्द की
स्थिति प्राप्त करके सो जाता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी सो जाता है (अर्थात् सुप्तावस्था में
बालक, विद्वान् एवं राजा सभी एक जैसी विश्राम की स्थिति में होते हैं) ॥ १९ ॥
स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः
सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य
सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २०॥
जिस प्रकार मकड़ी (अपने द्वारा निर्मित) तन्तुओं पर चलकर ऊर्ध्वगमन करती है और जिस प्रकार
अग्नि में अनेक छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, ठीक उसी तरह इस आत्मा से सभी प्राण, सभी
लोक, सभी देवता और समस्त भूत उत्पन्न होते हैं। इसका उपनिषदीय नाम 'सत्य का सत्य' है। निश्चित रूप
से प्राण ही सत्य है और यह आत्मा उस (प्राण का) सत्य है॥ २०॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो
भ्रातृव्यानवरुणद्ध्वयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः
स्थूणान्नं दाम ॥ १॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा (खूँटे) और दाम (बाँधने की रस्सी) के साथ इस प्राण
तत्त्व रूप शिशु को जानने वाला है, वह द्वेष करने वाले सात भ्रातृव्यों (सात विरोधियों-पाँच
ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि) को अवरुद्ध करने में समर्थ होता है। मध्य स्थित या मध्यम प्राण ही
शिशु रूप है, उसी का यह शरीर (अधिष्ठान) है। उस शिशु का सिर ही प्रत्याधान (आश्रय स्थल),
प्राण तत्त्व स्थूणा (खूँटा) एवं अन्न ही इसकी रज्जु है ॥ १॥
२७० बृहदारण्यकोपनिषद्
तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षन् लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनꣳ रुद्रो-
ऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनिका तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं
तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥ २ ॥
उस (प्राण) की (सहायिका) ये सात अक्षितियाँ (क्षीण न होने वाली) उपस्थित होती हैं। उन (सप्त
अक्षितियों में दोनों नेत्रों की लाल रेखाएँ रुद्र शक्ति (विद्युत्) की प्रतीक हैं। नेत्रों में जल पर्जन्य शक्ति का
प्रतीक है, जो कनीनिका (पुतलियाँ) हैं, वह आदित्य शक्ति की, कालिमा अग्नि शक्ति की, श्वेत भाग इन्द्र
शक्ति का, नीचे के पलक पृथिवी शक्ति के एवं ऊपर के पलक द्युलोक के प्रतीक हैं। इस प्रकार जो जानता
है, उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता ॥ २॥
तदेष श्लोको भवति। अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम्।
तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं
तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो
विश्वरूपं प्राणानेतदाह तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह
वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते ॥ ३ ॥
इस श्लोक से उपरि निर्दिष्ट तथ्य की पुष्टि होती है। यह चमस ही नीचे की ओर मुख वाला और ऊपर
की ओर जड़ से युक्त है। इसमें विभिन्न प्रकार का यश सन्निहित है। चमस के किनारे पर सात ऋषिगण
निवास करते हैं तथा अष्टम वाणी निवास करती है, जो वेदों (ब्राह्मणों) द्वारा संवाद करने में समर्थ होती
है। यह चमस जो नीचे की ओर मुख और ऊपर की ओर पैर वाला है और जिसमें सम्पूर्ण विश्व का यश
निहित है, वह वस्तुतः प्राण ही है। उसके किनारे पर सप्त ऋषियों का निवास वर्णित है। ये सात ऋषि
इन्द्रियाँ हैं। आठवीं वागिन्द्रिय है, जो ब्राह्मणों द्वारा बोली जाने वाली (वेदवाणी) वर्णित है ॥ ३॥
इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव
विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा
ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥
ये दोनों कान ही गोतम और भरद्वाज ऋषि हैं। इसी प्रकार दोनों चक्षु ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं।
नासिका के दोनों छिद्र ही वसिष्ठ और कश्यप ऋषि हैं। वाणी ही अत्रि ऋषि है; क्योंकि वाणी अर्थात् रसना
ही अन्न ग्रहण करने में सक्षम है और अन्न का भोग ग्रहण करने वालों में अत्रि प्रख्यात हैं, इसलिए वाक्
ही अत्रि है। जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है, वह समस्त अन्नों का भोग करने वाला (सबका अत्ता)
और उनका स्वामी होता है ॥ ४॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च ॥ १ ॥
ब्रह्म के दो स्वरूप हैं- एक व्यक्त और दूसरा अव्यक्त। इसमें मरणधर्मा व्यक्त है और अमर्त्य ही
अव्यक्त है। जो मर्त्य है, वह जड़- स्थिर है और अमृत (अविनाशी) सतत गतिमान् है ॥ १ ॥
अध्याय २ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ २७१
अध्याय २ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ २७१
तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्च तन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सतत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य
मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥
वायु और अन्तरिक्ष से भिन्न तत्त्व (अग्नि, जल और पृथिवी) ये सभी मूर्त मरणधर्मा एवं स्थिर हैं। इन
तीनों का सारतत्त्व तप्यमान (आदित्य या यज्ञपुरुष) है ॥ २ ॥
अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत
एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥
वायु और अन्तरिक्ष अव्यक्त हैं, ये अमर्त्य और गतिशील हैं। इस (आदित्य या ब्रह्माण्ड) मण्डल में
जो विशिष्ट तेजस् सम्पन्न पुरुष है, वही इन अमर्त्य एवं अव्यक्त भूतों का साररूप है। यह अधिदैव दर्शन है ॥
अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थित-
मेतत्सतत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥
अब अध्यात्म विषय प्रतिपादित किया जाता है। देहान्तर्गत आकाश और प्राण से भिन्न जो अग्नि, जल
एवं पृथिवी का अंश इस शरीर में विद्यमान है, वह मूर्त और मरणधर्मा है। नेत्र इस सत् का सार रूप है ॥ ४ ॥
अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत्यं तस्यैतस्यामूर्त-
स्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥
अब अमूर्त का वर्णन किया जाता है। प्राण और इस देह में स्थित जो आकाश है, ये दोनों ही अमूर्त
हैं, अविनाशी हैं और गतिशील हैं। इस अविनाशी अमूर्त प्राण और आकाश तत्त्व का सार ही दक्षिण नेत्र
के अन्तर्गत स्थित पुरुष अथवा विशिष्ट शक्ति है ॥ ५ ॥
तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो
यथायग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तः सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं
वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयः सत्यस्य सत्यमिति
प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥
(दाहिने नेत्र में निवास करने वाले) उस पुरुष (आत्मा) का रूप इस प्रकार का है, जैसे महारजन
(कुसुम्भ पुष्प का रंग या महान् रंगने वाले) से रंगा हुआ वस्त्र हो, जैसे पाण्डु (हल्का पीला) ऊन हो,
जैसे इन्द्रगोप (वीर बहूटी) हो, जैसे आग की लपट हो तथा जैसे कोई श्वेत कमल या विद्युत् की चमक
हो। जो ऐसा जानने वाला है, उसकी श्री (ऐश्वर्य) विद्युत् कान्ति के समान (सर्वत्र फैलने वाली) होती है।
अब (इस कारण) ब्रह्म सम्बन्धी उपदेश किया जाता है। उसके लिए सर्वोत्कृष्ट उपदेश 'नेति-नेति' है।
अन्य कोई उपदेश इतना उत्कृष्ट नहीं है। उसे 'सत्य का भी सत्य' इस नाम से ही जाना जाता है। प्राण ही
निश्चित रूप से सत्य है और वह (ब्रह्म) उस (प्राण) का भी सत्य है ॥ ६ ॥
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
२७२ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया
कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ १ ॥
महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी धर्मपत्नी मैत्रेयी से कहा- हे मैत्रेयी ! मैं अब वर्तमान स्थान (गृहस्थाश्रम)
से ऊपर (वानप्रस्थ आश्रम में) जाना चाहता हूँ। अतः मेरी आकांक्षा है कि दूसरी धर्मपत्नी कात्यायनी और
आपके बीच (सम्पत्ति का) विच्छेद (बँटवारा) कर दूँ ॥ १ ॥
सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता
स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितः
स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥
(यह सुनकर) मैत्रेयी बोली- हे भगवन् ! धन्य-धान्य से पूरित इस सम्पूर्ण धरती की यदि मैं स्वामिनी
बन जाऊँ, तो क्या मैं अमर पद पा सकूँगी ? महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा नहीं, जैसे साधन-सम्पन्नों का जीवन
होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन हो जायेगा। धन से अमृतत्व की आशा नहीं करनी चाहिए ॥२॥
सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां ? यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥
मैत्रेयी बोली- हे स्वामी ! जिस धन-ऐश्वर्य से मैं अमृतत्व प्राप्त नहीं कर सकती, उसे ग्रहण करके मैं क्या
करूँगी ? हे भगवन् ! यदि आप कोई अमृतत्व प्राप्त करने के उपाय जानते हों, तो वह मुझे बताने का अनुग्रह करें ॥
स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते
व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा-हे मैत्रेयी ! तुम हमारी प्रिया हो और प्रिय लगने योग्य वचन भी बोल रही हो। तुम
आकर बैठो-मैं तुम्हारे लिए अमृतत्व प्राप्त कराने वाला उपदेश प्रदान करता हूँ। तुम मेरे आदेश का
निदिध्यासन (अनुपालन) करना ॥ ४ ॥
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति न वा अरे
पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति न वा अरे वित्तस्य
कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं
भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु
कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय
लोकाः प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय
देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु
कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु
कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो
मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥
अध्याय २ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २७३
अध्याय २ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २७३
ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा-हे मैत्रेयी ! निश्चित ही पति की आकांक्षा पूर्ति के लिए पति प्रिय नहीं होता
वरन् अपनी (आत्मीयता) आकांक्षा पूर्ति के लिए (पत्नी को) पति प्रिय होता है। इसी प्रकार पत्नी के
प्रयोजन के लिए नहीं बल्कि अपने प्रयोजन के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है। पुत्रों की आकांक्षा पूर्ति
के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए (पिता को) पुत्र प्रिय होते हैं। धन के प्रयोजन पूर्ति के
लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए (व्यक्ति को) धन प्रिय होता है। ज्ञान या ब्राह्मण के प्रयोजन
के लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन के लिए ज्ञान या ब्राह्मण प्रिय होता है। शक्ति अथवा क्षत्रिय की आकांक्षा
के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए शक्ति (क्षत्रिय को) प्रिय होती है। देवों के प्रयोजन के
लिए नहीं, वरन् स्व प्रयोजन की पूर्ति के लिए देवता प्रिय होते हैं। लोकों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन्
अपनी ही इच्छा पूर्ति के लिए लोक प्रिय होते हैं। प्राणियों के हित के लिए नहीं, वरन् अपने हित के लिए
प्राणी प्रिय होते हैं। सभी के हित के निमित्त नहीं, वरन् अपने हित के निमित्त सब प्रिय होते हैं। इसलिए हे
मैत्रेयी ! यह आत्मा ही दर्शन करने योग्य, श्रवण करने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन (अनुभव)
ध्यान करने योग्य है। इस आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥
ब्रह्म तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्यो ऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं
परादुर्यो ऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्यो ऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद भूतानि तं
परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे
लोका इमे देवा इमानि भूतानीदः सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥
जो ब्राह्मण या ज्ञान को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में जानने वाला होता है, उसे ब्राह्मण या ज्ञान
परित्यक्त कर देता है। क्षत्रिय या बल को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में देखने वाले को बल या क्षत्रिय
परित्यक्त कर देता है। लोकों को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को लोक त्याग देते हैं।
देवताओं को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को देवता छोड़ देते हैं और समस्त प्राणियों
को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में देखने वाले को समस्त प्राणी त्याग देते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण
(ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति), लोक, देवता और समस्त प्राणी ये सभी आत्मा ही हैं, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं ॥
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन
दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥
जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि के बाहर निकलते हुए शब्दों को ग्रहण कर सकने में कोई दूसरा समर्थ
नहीं है। उन (शब्दों) को केवल स्वयं दुन्दुभि अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता है (उसी प्रकार
आत्म चेतना से आत्मा को प्राप्त किया जाता है।) ॥ ७ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन
शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
जैसे बजाये जाते हुए शङ्ख के शब्दों को केवल वह शङ्ख या उसका वादक ही ग्रहण कर सकता है,
अन्य कोई ग्रहण करने में समर्थ नहीं है (उसी प्रकार आत्मा द्वारा ही आत्मा को ग्रहण किया जा सकता है) ॥ ८ ॥
२७४ बृहदारण्यकोपनिषद्
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्यान् शब्दान् शक्नुयात् ग्रहणाय वीणायै तु
ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
जैसे बजायी जाती हुई वीणा के शब्दों को स्वयं वह वीणा अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है,अन्य कोई नहीं (वैसे आत्मा को आत्मा अथवा उसके संचालक द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है) ॥
स यथार्द्राग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य
निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः
श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ १० ॥
जिस तरह चारों ओर से आधान किये हुए गीले ईंधन से उत्पन्न अग्नि से धूम्र निकलता है, उसी प्रकार
हे मैत्रेयी ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद्, सूत्र, श्लोक, व्याख्यान और
अनुव्याख्यान ये सभी उस महान् सत्ता के निःश्वास ही हैं ॥ १० ॥
स यथा सर्वासामपाः समुद्र एकायनमेवः सर्वेषाः स्पर्शानां त्वगेकायनमेवः सर्वेषां
गन्धानां नासिके एकायनमेवः सर्वेषाः रसानां जिह्वैकायनमेवः सर्वेषाः रूपाणां
चक्षुरेकायनमेवः सर्वेषाः शब्दानाः श्रोत्रमेकायनमेवः सर्वेषाः संकल्पानां मन
एकायनमेवः सर्वासां विद्यानाः हृदयमेकायनमेवः सर्वेषां कर्मणाः हस्तावेकायनमेवः
सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवः सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवः सर्वेषामध्वनां
पादावेकायनमेवः सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥
जिस प्रकार समस्त जल का आश्रय स्थल एकमात्र समुद्र है, समस्त स्पर्शों का अयन त्वचा है, समस्त
गन्धों का आश्रय नासिका है, समस्त रसों का आश्रय रसना (जिह्वा) है, समस्त रूपों का आश्रय चक्षु है,
समस्त शब्दों का आश्रय श्रोत्र, समस्त संकल्पों का आश्रय मन, समस्त विद्याओं का आश्रय हृदय, समस्त
कर्मों का आश्रय हस्त, समस्त आनन्दों का आश्रय उपस्थ, समस्त विसर्गों (विसर्जनों) का आश्रय पायु
(गुदा), समस्त मार्गों का आश्रय चरण और समस्त वेदों का आश्रय वाक् शक्ति (वाणी) है ॥ ११ ॥
स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्याद्यतो
यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः
समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
जिस प्रकार जल के अन्दर नमक की डली डालने पर वह उसी में विलीन हो जाती है, उसे पकड़
सकना किसी के लिए सम्भव नहीं है, ठीक उसी प्रकार यह महद्भूत, अन्तहीन, पाररहित, विज्ञानघन
आत्मा समस्त भूतों से ऊँचा उठकर इन्हीं में विलुप्त हो जाता है। मृत्योपरान्त इस तत्त्व का नाम भी शेष नहीं
रहता, क्योंकि वह देहेन्द्रिय भाव से मुक्त हो जाता है- ऐसा ऋषि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा ॥ १२ ॥
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच याज्ञवल्क्यो
न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥
मैत्रेयी ने कहा- हे भगवन् ! मृत्यु के उपरान्त नाम भी नहीं बचता, आपके इस वाक्य से तो मुझे