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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 271 of 505

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Page 271

अध्याय २ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ २७१
तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्च तन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सतत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य
मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥
वायु और अन्तरिक्ष से भिन्न तत्त्व (अग्नि, जल और पृथिवी) ये सभी मूर्त मरणधर्मा एवं स्थिर हैं। इन
तीनों का सारतत्त्व तप्यमान (आदित्य या यज्ञपुरुष) है ॥ २ ॥
अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत
एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥
वायु और अन्तरिक्ष अव्यक्त हैं, ये अमर्त्य और गतिशील हैं। इस (आदित्य या ब्रह्माण्ड) मण्डल में
जो विशिष्ट तेजस् सम्पन्न पुरुष है, वही इन अमर्त्य एवं अव्यक्त भूतों का साररूप है। यह अधिदैव दर्शन है ॥
अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थित-
मेतत्सतत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥
अब अध्यात्म विषय प्रतिपादित किया जाता है। देहान्तर्गत आकाश और प्राण से भिन्न जो अग्नि, जल
एवं पृथिवी का अंश इस शरीर में विद्यमान है, वह मूर्त और मरणधर्मा है। नेत्र इस सत् का सार रूप है ॥ ४ ॥
अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत्यं तस्यैतस्यामूर्त-
स्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥
अब अमूर्त का वर्णन किया जाता है। प्राण और इस देह में स्थित जो आकाश है, ये दोनों ही अमूर्त
हैं, अविनाशी हैं और गतिशील हैं। इस अविनाशी अमूर्त प्राण और आकाश तत्त्व का सार ही दक्षिण नेत्र
के अन्तर्गत स्थित पुरुष अथवा विशिष्ट शक्ति है ॥ ५ ॥
तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो
यथायग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तः सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं
वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयः सत्यस्य सत्यमिति
प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥
(दाहिने नेत्र में निवास करने वाले) उस पुरुष (आत्मा) का रूप इस प्रकार का है, जैसे महारजन
(कुसुम्भ पुष्प का रंग या महान् रंगने वाले) से रंगा हुआ वस्त्र हो, जैसे पाण्डु (हल्का पीला) ऊन हो,
जैसे इन्द्रगोप (वीर बहूटी) हो, जैसे आग की लपट हो तथा जैसे कोई श्वेत कमल या विद्युत् की चमक
हो। जो ऐसा जानने वाला है, उसकी श्री (ऐश्वर्य) विद्युत् कान्ति के समान (सर्वत्र फैलने वाली) होती है।
अब (इस कारण) ब्रह्म सम्बन्धी उपदेश किया जाता है। उसके लिए सर्वोत्कृष्ट उपदेश 'नेति-नेति' है।
अन्य कोई उपदेश इतना उत्कृष्ट नहीं है। उसे 'सत्य का भी सत्य' इस नाम से ही जाना जाता है। प्राण ही
निश्चित रूप से सत्य है और वह (ब्रह्म) उस (प्राण) का भी सत्य है ॥ ६ ॥