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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 257 of 505

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Page 257

न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा
चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवग्ं श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना
हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदग्ं सर्वं
यदिदं किंच तदिदग्ं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७॥
सृष्टि के प्रारम्भ में यह आत्मा बिल्कुल अकेला था, उसने स्त्री (पत्नी) की कामना की, फिर प्रजा
(सन्तति) प्राप्ति की कामना की। इसके पश्चात् इच्छा की कि मेरे पास धन हो, जिससे मैं कर्म कर सकूँ।
मानवों की प्रायः इसी स्तर की कामनाएँ होती हैं और वे इससे अधिक प्राप्त भी नहीं कर पाते। इन
कामनाओं की पूर्ति के अभाव में वे अपने को अपूर्ण ही मानते रहते हैं। यदि वे चाहें, तो इस अपूर्णता की
पूर्ति इस दृष्टिकोण द्वारा कर सकते हैं- अपने मन को आत्मा मानें, वाणी को स्त्री, प्राण को सन्तति, चक्षु
को मानवी सम्पदा और श्रोत्रेन्द्रिय को दिव्य सम्पदा मानें। इस प्रकार साधन सम्पन्न पुरुष का शरीर ही कर्म
है; क्योंकि शरीर से ही कर्म किया जाता है। इसलिए यह यज्ञ पाङ्क्त (पाँच-आत्मा, वाणी, प्राण, चक्षु
एवं श्रोत्र से सम्पन्न होने वाला ) है। समस्त जीवों में ये पाँचों विद्यमान हैं। अतः पशु पाङ्क्त है, पुरुष पांक्त
है तथा अन्य भी जो कुछ है सब पाङ्क्त है, अर्थात् यह सृष्टि ही पञ्च तत्त्वात्मक यज्ञ स्वरूप है। इस ज्ञान
को इस प्रकार जानने वाले को इन सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७॥

॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् ।
त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत्तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न
कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स
देवानपि यच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १॥
परमपिता ने ज्ञान और तप के प्रभाव से सात प्रकार के अन्नों का सृजन किया। उन अन्नों में एक प्रकार
का अन्न सभी के लिए, दो का देवताओं के निमित्त, तीन का अपने निमित्त और एक का पशुओं के निमित्त
वितरण कर दिया। पशुओं को प्रदान किये गये उस अन्न में प्राणन क्रिया करने वाले और न करने वाले
(श्वास लेने और न लेने वाले) सभी प्रतिष्ठित हैं। इन अन्नों का सदैव भक्षण किया जाता है, फिर भी ये
क्षीण नहीं होते, इसका क्या कारण है? इस प्रकार सभी को सभी का अन्न भाग देने के अक्षय भाव को जो
जानता है, वह अन्नोपभोग करते हुए कभी क्षीण नहीं होता अर्थात् अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ १॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति मेधया हि तपसाऽजनयत्पितैकमस्य
साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते
मिश्रग्ं ह्येतद्द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो
आहुर्दर्शपूर्णमासाविति। तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात्पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः पयो