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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 268 of 505

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Page 268

२६८ बृहदारण्यकोपनिषद्
स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच
गार्ग्य उपत्वायानीति ॥ १४ ॥
यह स्थिति देखकर अजातशत्रु बोले कि क्या इतना ही ज्ञान है ? बालाकि गार्ग्य ने कहा कि हाँ केवल
इतना ही ज्ञान है। अजातशत्रु ने कहा कि इतने मात्र से तो ब्रह्मज्ञान असम्भव है। तब गार्ग्य बोले कि क्या
मैं आपकी सेवा के लिए तैयार होऊँ ? ॥ १४ ॥
स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति
व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषः सुप्तमाजग्मतुस्त-
मेतैर्नामभिरामन्र्तयांचक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोमराजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं
बोधयांचकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥
(यह सुनकर) अजातशत्रु बोले- यह तो विपरीत तथ्य है कि कोई ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के
लिए किसी क्षत्रिय के पास जाए। तो भी मैं आपको ब्रह्म का उपदेश करूँगा (अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्रदान
करूँगा)। तब अजातशत्रु उठे और बालाकि का हाथ पकड़कर एक सोते हुए पुरुष के पास ले गये। राजा
अजातशत्रु ने उस सोते हुए पुरुष को हे ब्रह्मन् ! हे श्वेताम्बरधारी, हे सोम !, हे राजन्,! आदि कहकर जगाने
का प्रयत्न किया, किन्तु वह जाग्रत् स्थिति में नहीं आया। इसके बाद अजातशत्रु ने उसे झकझोर कर उठाने
का प्रयत्न किया, तब वह जागकर उठ बैठा ॥ १५ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत
एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
इसके पश्चात् राजा अजातशत्रु ने बालाकि गार्ग्य से प्रश्न किया कि इस प्रसुप्त व्यक्ति का (जीवात्मा)
विज्ञानमय पुरुष उस समय कहाँ था, जब वह सो रहा था और अब कहाँ से (जागने पर) यहाँ आ गया;
किन्तु बालाकि गार्ग्य इसे नहीं जान सका अर्थात् इस प्रश्न का उत्तर न दे सका ॥ १६ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन
विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति
नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतः श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७॥
तब अजातशत्रु ने कहा- जब वह (जीवात्मा) विज्ञानमय पुरुष प्रसुप्तावस्था में था, तब अपनी विज्ञान
की शक्ति से समस्त इन्द्रियों की शक्ति को अपने में एकत्र कर लिया था। सुप्त स्थिति में जीवात्मा हृदयाकाश
में स्थित रहकर इन्द्रियों को ग्रहण करता है। उस समय इसे 'स्वपिति' कहते हैं। उस समय प्राण, नेत्र, श्रोत्र
और मन सभी गृहीत स्थिति में होते हैं ॥ १७ ॥
स यत्रैतत्स्वप्न्यायाचरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण
उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं
परिवर्तैतवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥