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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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Page 256

२५६ बृहदारण्यकोपनिषद्

बोलने वालों को धर्मयुक्त वचन बोलने वाला और धर्म वचन बोलने वालों को सत्यवादी कहते हैं,
अस्तु, इन दोनों में कोई भेद नहीं है ॥ १४॥
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण
क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे
मनुष्येष्वेताभ्याग्ँहि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति
स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविद्
महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव
लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। इन वर्णों का रचयिता ब्रह्म देवताओं में अग्नि रूप से
श्रेष्ठ (ब्राह्मण) हुआ। वह (ब्रह्म) मनुष्यों में ब्राह्मण रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय रूप से क्षत्रिय, वैश्य रूप से
वैश्य और शूद्र रूप से शूद्र रूप में प्रकट हुआ। इसी कारण अग्निहोत्रादि धर्मकृत्य करके मनुष्य देवों से
कर्मफल की इच्छा करता है, क्योंकि ब्रह्म इन्हीं दो रूपों से अभिव्यक्त हुआ था। स्वलोक अथवा अपने
आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, अन्यथा अपने लोक और परलोक का सुधार असम्भव है। ऐसे व्यक्ति
का पुण्य भी व्यर्थ ही हो जाता है, जिसने आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया। आत्मा के उपासक के पुण्य कृत्य
कभी क्षीण नहीं होते, वरन् उसकी समस्त आकांक्षाएँ पूर्ण होती हैं॥ १५॥
अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ
यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ
यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति
तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाग्ंस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा
ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवग्ँ हवैंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं
मीमाग्ँसितम् ॥ १६ ॥
यह आत्मा समस्त जीवों का आश्रय प्रदाता है, अर्थात् उनका लोक है। यह (आत्मा) हवन-यज्ञ
करने से देवताओं का लोक (आश्रयदाता) होता है। स्वाध्याय (वेदों का पठन-पाठन) करने से ऋषियों
का, सन्तानोत्पादन (की इच्छा) करने तथा पिण्डदान करने से पितरों का, मनुष्यों को आश्रय स्थल और
भोज्य पदार्थ देने से मनुष्यों का, पशुओं को तृण-जल आदि देने से पशुओं का तथा गृह स्थित कुत्ते, बिल्ली,
पक्षी एवं चींटी आदि जीवों का आश्रय प्रदाता होता है, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोक
में (सभी) अपने शरीर की सुरक्षा चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जानने वाले की सभी जीव सुरक्षा चाहते हैं।
इस प्रकार उस कर्म की अनिवार्यता [पंच महायज्ञ प्रकरण में] ज्ञात है और इसकी मीमांसा की गई है॥
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे
स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छग्ँश्चनातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतह्यैकाकी
कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं