१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
About this granth
This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.
As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.
The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.
प्रश्न ४ मन्त्र १ २३५
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥
इन नाड़ियों में एक नाड़ी (सुषुम्ना नाड़ी) ऊर्ध्वगामी है, जिसके माध्यम से उदान नामक वायु मनुष्य
को पुण्य कृत्यों द्वारा पुण्यलोक को और पाप कृत्यों द्वारा अधम लोक को ले जाता है। यह उदान वायु पाप-
पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा मनुष्य को मर्त्य लोक में प्रतिष्ठित करता है ॥७॥
आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः। पृथिव्यां या देवता
सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥
आदित्य निश्चित रूप से बाहरी प्राण है। यह चाक्षुष (चक्षु सम्बन्धी) प्राण को अनुगृहीत करता हुआ
उदित होता है । पृथ्वी का देवता प्राणी के अपान वायु को आकर्षित करता है। इन दोनों (द्यु और पृथ्वी)
के बीच का रिक्त स्थान (आकाश) ही समान वायु है तथा बाह्य वायु, व्यापकता में (आन्तरिक व्यान
से) समानता होने से व्यान है ॥ ८ ॥
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः। पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानैः ॥ ९ ॥
विश्वविख्यात (आदित्यरूपी) तेज ही उदान है, जिनका तेजस् शीतल हो जाता है, उनकी इन्द्रियों का
मन में विलय हो जाता है, इस स्थिति में वे पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं ॥ ९ ॥
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः। सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं
नयति ॥ १० ॥
(मरणकाल में) इस (आत्मा) का जिस तरह का मनः संकल्प होता है, वह उसी प्रकार के संकल्प
के साथ प्राण को प्राप्त करता है। वह प्राण तेजस् सम्पन्न होकर जीव के संकल्पानुसार उसे विभिन्न लोकों
(योनियों) में ले जाता है ॥ १० ॥
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽ मृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
जो विज्ञजन प्राण तत्त्व को इस प्रकार जानते हैं, उनकी प्रजा (वंश) कभी विनाश को प्राप्त नहीं होती
और वे अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं। यह श्लोक इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है ॥ ११ ॥
उत्पत्तिम्रायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्रुत इति ॥ १२ ॥
जो मनुष्य प्राण तत्त्व की उत्पत्ति, आगमन, स्थान व्यापकत्व तथा बाहरी और आध्यात्मिक (आन्तरिक)
स्थिति के पाँचों भेदों को भली प्रकार जान लेता है, वह अमर पद प्राप्त कर लेता है-वह निश्चित ही अमरत्व
को प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
॥ चतुर्थः प्रश्नः ॥
अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति ? कान्यस्मिन्
जाग्रति ? कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति ? कस्यैतत्सुखं भवति ? कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता
भवन्तीति ॥ १ ॥
तदुपरान्त सूर्य-पौत्र गार्ग्य ने महर्षि पिप्पलाद से प्रश्न किया-हे भगवन् ! इस पुरुष देह में कौन
(इन्द्रियाँ) शयन करती हैं और कौन जाग्रत् रहती हैं ? कौन देवता स्वप्न देखता है और कौन सुख
अनुभव करता है ? ये सब किसमें सम्प्रतिष्ठित होते हैं? ॥ १ ॥
२३६ प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच। यथा गार्ग्य। मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल
एकीभवन्ति। ताः पुनःपुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन
तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते
नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने गार्ग्य ऋषि से कहा- हे गार्ग्य ! जिस प्रकार सूर्य की रश्मियाँ उसके अस्त होने पर सिमटकर
उसी के तेजोमंडल में एकीभूत हो जाती है और सूर्योदय होने पर पुनः सर्वत्र फैल जाती है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ
परमदेव मन में एकीभूत हो जाती हैं, तब यह पुरुष न देखता है, न सुनता है, न स्वाद लेता है, न सूँघता है, न स्पर्श
करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मल का त्याग करता है, न आनंद का अनुभव करता है और न ही किसी
प्रकार की चेष्टा करता है, तब उसकी इस स्थिति को शयन करना (सो जाना) कहते हैं॥ २॥
प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति गार्हपत्यो ह वा एषोऽ पानो व्यानोऽ न्वाहार्यपचनो
यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
(सोते समय) इस शरीररूप पुर (नगर) में प्राणरूप अग्नि ही जाग्रत् रहता है। यह अपान ही गार्हपत्य
अग्नि है। व्यान ही अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि है। गार्हपत्य से ले जाया गया प्राण ही 'प्रणयन प्रक्रिया' के
कारण आहवनीय अग्निरूप है॥ ३॥
[ ऋषि यहाँ काया में सतत चलने वाली जीवन रूपी यज्ञीय प्रक्रिया का स्वरूप व्यक्त कर रहे हैं।]
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमान
इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥
शरीरधारी में उच्छ्वास और निःश्वास (श्वास लेना और छोड़ना) ही यज्ञाहुतियाँ हैं। उन आहुतियों को
समानता पूर्वक विभक्त करने के कारण समान वायु (ही ऋत्विक्) है। मन निश्चित ही यजमान है और
अभीष्ट फल उदान है। यही उदान (इच्छित फल) मन को नित्य ही ब्रह्म में स्थित करता है॥ ४॥
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु-
श्रृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं
चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्य सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥
स्वप्न की स्थिति में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है। जाग्रत् अवस्था में इसने जो देखा था,
उसी को पुनः (स्वप्न में) देखता है, जो सुना था उसे ही सुनता है, विभिन्न दिशाओं में अनुभव किये हुए
को पुनः-पुनः अनुभव करता है। (इतना ही नहीं) यह देखे-अनदेखे, सुने-अनसुने, अनुभूत-अननुभूत,
सत् और असत् समस्त पदार्थों को देखता है और स्वयं भी सर्वरूप बनकर देखता है॥ ५॥
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥
जब यह जीवात्मा तेजस् से सम्पन्न होता है, तब यह स्वप्न नहीं देखता। उस समय शरीर में यह
आनन्द (सुषुप्ति सुख) अनुभव करता है॥ ६॥
स यथा सोम्य ! वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने निवास स्थान वृक्ष पर जाकर बैठ जाते हैं, उसी प्रकार ये
समस्त तत्त्व परम आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ॥ ७ ॥
प्रश्न ५ मन्त्र १ २३७
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा
चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च
रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं
चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च
बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च
प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
(गत मन्त्रों में जिन तत्त्वों का संकेत है, वे ये हैं) पृथ्वी एवं उसकी तन्मात्रा (गन्ध), जल एवं उसकी
तन्मात्रा (रस), आकाश एवं उसकी तन्मात्रा (शब्द), वायु और उसकी तन्मात्रा (स्पर्श), तेज (अग्नि) और
उसकी तन्मात्रा (रूप), नेत्र और देखने योग्य (दृश्य), कान और सुनने योग्य (शब्द), घ्राण और सूंघने
योग्य (गंध), रसना और स्वाद ग्रहण करने योग्य (रस), त्वचा और स्पर्श करने योग्य (पदार्थ), हाथ और
ग्रहण करने योग्य पदार्थ, वाक् शक्ति और वक्तव्य-विषय, उपस्थ और उससे सम्बंधित विषय, गुदा और
विसर्जन योग्य (मल), पैर और गन्तव्य स्थल, मन और मननीय विषय, बुद्धि और जानने योग्य विषय,
अहंकार और उसका विषय, चित्त और चिंतनीय विषय, तेजस् और प्रकाशित करने योग्य पदार्थ, प्राण एवं
उसके आश्रित रहने वाले पदार्थ (ये सब) परम आत्मा में विलीन हो जाते हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाकर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स
परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९॥
यही द्रष्टा (देखने वाला), स्प्रष्टा (स्पर्श करने वाला), श्रोता (सुनने वाला), घ्राता (सूँघने वाला),
रसयिता (रस लेने वाला), मन्ता (मनन करने वाला), कर्त्ता (कर्म करने वाला) और बोद्धा (जानने वाला)
विज्ञानात्मा पुरुष है; जो परम अविनाशी ब्रह्म में स्थित हो जाता है॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वो भवति॥ तदेष श्लोकः॥ १०॥
हे सोम्य! जो पुरुष, इस छायारहित, शरीररहित, अलोहित, शुभ्र अक्षर परमात्मा को भली-भाँति
जानता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप होकर उसी को प्राप्त हो जाता है-ऐसा इस श्लोक में भी वर्णित है ॥१०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११॥
हे सोम्य ! जिस अविनाशी परब्रह्म में समस्त देवगण, समस्त प्राण और समस्त भूत भली प्रकार
प्रतिष्ठित होते हैं, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता भी उसी में (परमात्मा में) प्रविष्ट हो जाता है॥ ११॥
॥ पञ्चमः प्रश्नः ॥
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्त-
मोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति॥ १॥
इसके उपरान्त शिबि पुत्र सत्यकाम ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! यह बताने का अनुग्रह
करें कि जो मनुष्य जीवन भर (मरण पर्यन्त) ॐ का ध्यान करे, वह इस (ओंकारोपासना) द्वारा
किस लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है?॥ १॥
२३८ प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच। एतद्वै सत्यकाम। परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वा-
नेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
महर्षि पिप्पलाद ने कहा- हे सत्यकाम ! यह ॐ कार ही निश्चित रूप से परब्रह्म और अपरब्रह्म है।
अतः जो विद्वान् इसे इस प्रकार जानता है, वह इनमें से किसी एक (ब्रह्म) को प्राप्त कर लेता है ॥२॥
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसंपद्यते। तमृचो
मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनुभवति॥३॥
वह साधक यदि एक मात्रा वाले ॐकार का ध्यान करता है, तो उसके माध्यम से वह अतिशीघ्र इस
जगत् को प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह ब्रह्मचर्य, तप और श्रद्धा से सम्पन्न होकर महिमावान् होता है॥ ३॥
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकं स
सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते॥ ४॥
यदि वह द्विमात्रिक ॐकार का ध्यान करे, तो उसे यजुर्वेद के मन्त्र अन्तरिक्ष में स्थित सोम लोक
में ले जाते हैं। वह वहाँ (सोम लोक में) विभूतियों का अनुभव करके पुनः (मर्त्यलोक में) वापस
लौट आता है ॥४॥
यः पुनरेतन्त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं
स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते। तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
जो पुरुष त्रिमात्रिक ॐकार के ध्यान द्वारा साधना करता है, वह तेजोमय सूर्यलोक को प्राप्त करता है।
जिस प्रकार सर्प केंचुलि से मुक्त होकर बाहर आ जाता है, उसी प्रकार वह पापों से छूट जाता है और साम-
मन्त्रों द्वारा ब्रह्मलोक पहुँचा दिया जाता है। वह विद्वान् इस जीवनघन से भी श्रेष्ठ समस्त शरीरों में प्रविष्ट
(हृदय में स्थित) परमात्मा का दर्शन करता है। ये दो श्लोक इसी तथ्य के प्रतिपादक हैं ॥ ५॥
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६॥
ॐ कार मंत्र की तीनों मात्राएँ (अलग-अलग होने पर भी) परस्पर संबद्ध हैं - मृत्यु से युक्त हैं। ये
(ध्यान प्रक्रिया में ) प्रयुक्त होती हैं एवं आपस में ऐसी हैं, जिनका प्रतिकूल रूप में प्रयोग नहीं किया गया
है । अस्तु, (इन्हें) बाहर-भीतर और बीच की क्रियाओं में भली प्रकार प्रयुक्त करने वाला विद्वान् पुरुष दृढ़
संकल्प वाला हो जाता है, जो कभी विचलित नहीं होता ॥ ६॥
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति
विद्वांन्यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७॥
(एक मात्रिक ॐकार की साधना द्वारा) साधक को ऋग्वेद की ऋचाएँ इस लोक की प्राप्ति
कराती हैं, (द्विमात्रिक ओंकार साधना से ) यजुर्वेद के मंत्र अंतरिक्ष लोक की और (त्रिमात्रिक
ॐकार साधना द्वारा) सामवेद के मंत्र उसे उस (तृतीय ब्रह्म लोक) लोक की प्राप्ति कराते हैं, ऐसा
विद्वज्जन जानते हैं। उस ॐकार मंत्र का आश्रय लेकर ही विद्वान् उस परमब्रह्म लोक को प्राप्त करता
है, जो शांतिपूर्ण, अजर-अमर भयरहित एवं सर्वोत्कृष्ट है ॥ ७॥
प्रश्न ६ मन्त्र ५ २३९
॥ षष्ठः प्रश्नः ॥
अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ। भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो
मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं भारद्वाज! पुरुषं वेत्थ? तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं
वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति। समूलो वा एष परिशुष्यति योऽ
नृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम्। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि
क्वासौ पुरुषः? इति ॥ १ ॥
इसके बाद भरद्वाज ऋषि के पुत्र सुकेशा ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! कोसल देश के
राजपुत्र हिरण्यनाभ ने मेरे निकट आकर जो प्रश्न किया था, वह मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ- हे भारद्वाज !
क्या आप सोलह कला से सम्पन्न पुरुष के विषय में जानते हैं? मैंने उस राजकुमार से कहा- मैं उसे नहीं
जानता, यदि मैं जानता होता, तो आपको क्यों नहीं बताता? जो व्यक्ति झूठ बोलता है, वह समूल सूख जाता
है, अस्तु, मैं झूठ नहीं बोल सकता। तदनन्तर वह राजकुमार चुपचाप रथारूढ़ होकर चला गया। आप हमारा
समाधान करें कि वह 'पुरुष' कहाँ रहता है (जिसके विषय में राजकुमार ने पूछा था) ? ॥ १ ॥
तस्मै स होवाच। इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥
आचार्य पिप्पलाद ने उनसे कहा- हे सोम्य! जिस पुरुष में षोडश कलाएँ उत्पन्न होती हैं, वह इस शरीर
के ही अन्दर विद्यमान है ॥ २ ॥
स ईक्षांचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते
प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥
उस (देह-स्थित) पुरुष ने चिन्तन किया कि किसके निकल जाने पर मैं निकल जाऊँगा और किसके
प्रतिष्ठित रहने पर मैं प्रतिष्ठित रहूँगा ॥ ३ ॥
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो
मंत्राः कर्मलोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥
उस पुरुष ने सर्वप्रथम प्राण का सृजन किया, तदुपरान्त प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, ज्योति,
जल, पृथ्वी, इन्द्रियाँ, मन और अन्न सृजा गया। अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक एवं नाम आदि
(सोलह कलाओं) की रचना हुई ॥ ४ ॥
स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां
नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः
पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽ कलोऽ
मृतो भवति। तदेष श्लोकः॥ ५ ॥
जिस प्रकार नदियाँ बहते-बहते समुद्र में जा मिलती हैं और उसमें ही विलीन होकर
अपना नाम-रूप विनष्ट करके 'समुद्र' ही हो जाती हैं। उसी प्रकार सर्वद्रष्टा परम पुरुष की
षोडश कलाएँ उस परम पुरुष में ही विलीन हो जाती हैं, उनके नाम-रूप भी विनष्ट हो जाते
हैं और वे पुरुष ही कहलाती हैं। इसके बाद भी वह पुरुष कलारहित और अमर है, इस तथ्य
के प्रतिपादन स्वरूप यह श्लोक है॥ ५॥
२४० प्रश्नोपनिषद्
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥
रथ की नाभि में जिस तरह अरे लगे होते हैं, उसी प्रकार जिस परम पुरुष (परमेश्वर) में
समस्त कलाएँ प्रतिष्ठित हैं, उस ज्ञातव्य पुरुष को जानो, ताकि मृत्यु तुम्हें व्यथा न पहुँचा सके ॥ ६ ॥
तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥
इसके बाद उन महर्षि पिप्पलाद ने समस्त ऋषियों से कहा इस परब्रह्म के विषय में मैं इतना ही
ज्ञान रखता हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ७ ॥
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति। नमः
परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥
तदुपरान्त ऋषियों ने उन (महर्षि पिप्पलाद) की अर्चना करते हुए कहा-आप हमारे पिता हैं,
क्योंकि आपने हमें अविद्या (अज्ञान) के उस पार कर दिया है। आप परम ऋषि हैं, हमारा आपको
नमन है-नमन है ॥ ८ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम......... ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः .....इति शान्तिः ॥
॥ इति प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में अनेक ब्राह्मण हैं।
॥ बृहदारण्यकोपनिषद् ॥
शुक्ल यजुर्वेद की काण्व-शाखा के वाजसनेयि ब्राह्मण-शतपथ ब्राह्मण के अन्तर्गत यह उपनिषद् है।
बृहत् (बड़ी) और आरण्यक (वन) में विकसित होने के कारण इसे 'बृहदारण्यक' कहा गया है। इसमें छ:
अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में अनेक ब्राह्मण हैं।
प्रथम अध्याय में छ: ब्राह्मण हैं। प्रथम ब्राह्मण (अश्वमेध परक) में सृष्टि रूप यज्ञ को एक विराट् अश्व की
उपमा से व्यक्त किया गया है और दूसरे में प्रलय के बाद सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है। तीसरे में देवों - असुरों के
प्रसंग से प्राण की महिमा और उसके भेद स्पष्ट किये गये हैं। चौथे में ब्रह्म को सर्वरूप कहकर उसके द्वारा चार
वर्णों के विकास का उल्लेख है। छठवें में विभिन्न अन्नों की उत्पत्ति तथा मन, वाणी एवं प्राण के महत्त्व का वर्णन
है। साथ ही नाम, रूप एवं कर्म की प्रतिष्ठा भी है। दूसरे अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में डींग हाँकने वाले गार्ग्य
बालाकि एवं ज्ञानी राजा अजातशत्रु के संवाद के द्वारा ब्रह्म एवं आत्म तत्त्व को स्पष्ट किया गया है। दूसरे-तीसरे
में प्राणोपासना तथा ब्रह्म के दो (मूर्त्त और अमूर्त्त) रूपों का वर्णन है। चौथे में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद है। यह
संवाद अध्याय ४ ब्राह्मण ५ में भी लगभग एक ही प्रकार से है। पाँचवें-छठें ब्रा० में मधुविद्या और उसकी परम्परा
का वर्णन है। तीसरे अध्याय के नौ ब्राह्मणों के अन्तर्गत राजा जनक के यज्ञ में याज्ञवल्क्य से विभिन्न तत्त्ववेत्ताओं
की प्रश्नोत्तरी है। गार्गी ने दो बार प्रश्न किए हैं, पहली बार अतिप्रश्न करने पर याज्ञवल्क्य ने उन्हें मस्तक गिरने की
बात कहकर रोक दिया। दुबारा वे सभा की अनुमति से पुनः दो प्रश्न करती हैं तथा समाधान पाकर लोगों से कह
देती हैं कि इनसे कोई जीत नहीं सकेगा, किन्तु शाकल्य विदग्ध नहीं माने और अतिप्रश्न करने के कारण उनका
मस्तक गिर गया। चौथे अध्याय में याज्ञवल्क्य-जनक संवाद एवं याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद है। अन्त में इस काण्ड
की परम्परा है। पाँचवें अध्याय में विविध रूपों में ब्रह्म की उपासना के साथ मनोमय पुरुष एवं वाक् की उपासना
भी कही गयी है। मरणोत्तर ऊर्ध्वगति के साथ अन्न एवं प्राण की विविध रूपों में उपासना समझायी गयी है। गायत्री
उपासना में जपनीय तीनों चरणों के साथ चौथे 'दर्शत' पद का भी उल्लेख है। छठें अध्याय में प्राण की श्रेष्ठता,
पञ्चाग्नि विद्या, मन्थ विद्या तथा सन्तानोत्पत्ति के विज्ञान का वर्णन है। अन्त में समस्त प्रकरण के आचार्य परम्परा
की श्रृंखला व्यक्त की गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं.......इति शान्तिः ॥ - (द्रष्टव्य-ईशावास्योपनिषद् )
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्य्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर
आत्माश्वस्य मेध्यस्य। द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यम्। दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः
पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो
मांसानि। ऊवध्यः सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च
वनस्पतयश्च लोमानि उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते यद्विद्योतते यद्विधूनुते
तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
प्रथम ब्राह्मण में विराट् 'मेध्य अश्व' का वर्णन किया गया है। जिसके अंग-अवयव तीनों लोकों में कण-
कण में संव्याप्त हैं। यह एक आलंकारिक व्याख्या है। 'अश्व' शब्द शक्ति एवं गति का परिचायक है। यह ब्रह्माण्ड
२४२ बृहदारण्यकोपनिषद्
गतिशील है। इसे जो शक्ति गतिशील किये है, उसे 'अश्व' कहा गया है। अशु-व्याप्रोति के अनुसार तीव्रगति से
संचरित होने वाले को 'अश्व' कहना उचित है। यह अश्व 'मेध्य' है। 'मेध' शब्द 'यज्ञ' का पर्यायवाची है। अस्तु, यह
शक्ति का संचार जो विश्व का संवाहक है, निश्चित रूप से 'मेध्य' (यजनीय) है। इसका उपयोग यज्ञीय दिव्य
अनुशासन में ही किया जाना चाहिए। मेध (मेधृ) धातु के तीन अर्थ हैं - मेधा, हनन और संगम- संयोजन। इस
विराट् यज्ञीय प्रक्रिया को हननीय-हिंसनीय तो नहीं ही कह सकते; अस्तु, यह अर्थ यहाँ अग्राह्य है। इसे मेध्य-मेधा
से प्रभावित करने योग्य या मेधा से ग्रहण करने योग्य अवश्य कह सकते हैं। यह संगम योग्य भी है ही। इसके साथ
जुड़ जाना या इस शक्ति प्रवाह को अपने साथ जोड़कर रखना आवश्यक भी है।
इस यज्ञीय अश्व या विश्वव्यापी शक्ति प्रवाह का सिर उषाकाल है। आदित्य ही नेत्र हैं, वायु ही प्राण
है, वैश्वानराग्नि व्यात्त (खुला हुआ) मुख है और संवत्सर ही आत्मा है। द्युलोक उस यज्ञाश्व का पृष्ठ (ऊपरी
या अव्यक्त) भाग, अन्तरिक्ष उसका उदर, पृथिवी पैर रखने का स्थल, दिशाएँ पार्श्व भाग, अवान्तर दिशाएँ-
पसलियाँ, ऋतुएँ अन्य अङ्ग, मास और पक्ष-सन्धिस्थल, दिन और रात्रि दोनों पैर, नक्षत्र समूह-अस्थियाँ
और आकाश उसका मांस है। अपरिपक्व (उदर स्थित) अन्न-सिकता (वस्तु या सूक्ष्मकण) है, नदियाँ-
नाड़ी समूह, पर्वत समूह-यकृत् और हृदयगत मांस है। वनस्पतियाँ-रोम (लोम समूह), ऊर्ध्वगामी सूर्य -
नाभि से ऊपर का स्थल, अधोगामी (अस्ताचल को जाता हुआ) सूर्य-कमर से नीचे का भाग है। विद्युत्
चमकना मानों इस यज्ञाश्व का जमुहाई लेना है, मेघों का गरजना उसका अँगड़ाई लेना है, जल वर्षा ही
मानों उसका मूत्र त्यागना है और शब्द घोष उसकी (अश्व) वाणी है॥ १॥
[उपमाएँ यथार्थ का बोध कराती हैं, वे स्वयं यथार्थ नहीं होतीं। अस्तु, अश्व के अङ्गों के साथ सिर आदि को
जो उपमाएँ दी गयी हैं, वे बहुत अंशों तक सटीक हैं। अश्व का उदर 'अन्तरिक्ष' को कहा गया है, अस्तु (उदर में)
अपरिपक्व अन्न 'सिकता' सामान्य बालू के कण नहीं, अन्तरिक्ष में स्थित सूक्ष्म कण (सब पार्टिकल्स) समझे जाने
चाहिए, जो अभी अपरिपक्व हैं-पदार्थ रूप में परिवर्तित नहीं हुए हैं।]
अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत
तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः संबभूवतुः। हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी
गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
विराट् विश्व अथवा यज्ञाश्व की महिमा स्वरूप सर्वप्रथम दिन का प्राकट्य हुआ, उसकी पूर्व
दिशा में समुद्र योनि विद्यमान है। इसकी द्वितीय महिमा के रूप में रात्रि का प्राकट्य हुआ, उसकी
पश्चिम दिशा में समुद्र योनि है। ये दोनों समुद्र योनियाँ इस यज्ञाश्व के आगे-पीछे की महिमा संज्ञा
वाले ग्रह हैं। इस (विराट् अश्व) ने हय (त्याग) रूप में देवों को वहन किया, वाजी (भोग)
बनकर गन्धर्वों को वहन किया, अर्वा (चंचल-आक्रामक) रूप धारण कर असुरों और अश्व
(अधिक भोजन करने वाला) रूप से मानवों को वहन किया है। इस यज्ञाश्व अथवा विराट् विश्व का
उद्गम स्थल और बन्धु (बाँधकर रखने वाला प्रेमी-सहयोगी) भी समुद्र ही है ॥ २ ॥
[हय, वाजी, अर्वा, अश्व यह सभी शब्द पर्यायवाची हैं, सभी का अर्थ गतिशील होता है; किन्तु भाव-भेद
से इनमें कुछ अन्तर है। त्याग कर बढ़ने वाला 'हय' है। वाजीकरण औषधियाँ भोग शक्ति को बढ़ाने वाली होती
हैं; अस्तु, वाजी योगपरक है। अर्वा चंचल-आक्रामक है और अश्व को महाशनो, बहुभोजी कहा गया है। अश्व का
उद्गम स्थल और बन्धु समुद्र कहा गया है। यह सामान्य समुद्र नहीं 'आपः तत्त्व' कारण प्रकृति जिसमें हिलोरें लेती
है, जिसकी लहरों से लोक - लोकान्तर बनते-बिगड़ते रहते हैं, वह विराट् सक्रिय व्योम है। वेद ने इसे ही 'समुद्रो
अर्णवः' आदि कहा है।]
अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३
अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत्। अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनो-
ऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति। सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मेकमभूदिति
तदेवार्कस्यार्कत्वम् कः ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद॥ १॥
प्रारम्भ में इस विश्व में और कुछ भी न था। सब कुछ मृत्यु से आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था।
क्षुधा ही मृत्यु है। (संसार को अपने अन्दर विलीन कर लेने के कारण ईश्वर को भी मृत्यु कहते हैं।) उसने सङ्कल्प
किया कि मैं मन (संकल्पशक्ति) से युक्त हो जाऊँ। उसने अर्चन (इसके लिए प्रयत्न) किया, जिससे आपः (कारण
रूप सक्रिय तत्त्व या प्रकृति) की उत्पत्ति हुई। यह (आपः) ही अर्क (ब्रह्माण्ड) का अर्कत्व (ऐश्वर्य) है। इस अर्क
(मूल तत्त्व) को इस प्रकार जानने वाले को 'क' (सुख) की प्राप्ति होती है॥ १॥
[ सब कुछ मृत्यु एवं क्षुधा से आवृत था, यह आलंकारिक उक्ति है। मृत्यु निष्क्रियता की स्थिति है- प्रलय
की स्थिति है। ब्रह्माण्ड को अपने में लय कर लेने की ईश्वरीय इच्छा को उसकी क्षुधा कह सकते हैं। लय करने
की इच्छा या क्षुधा के फलस्वरूप ही प्रलय-मृत्यु की स्थिति आती है। उसी ब्रह्म की इच्छा पुनः उगल देने की-सृष्टि
को प्रकट करने की हुई, तो वह चक्र पुनः चल पड़ा। अर्क शब्द 'अर्च' धातु से बना है। इसे अर्च्+क या अर्कू+क
( = अर्चक-अर्क) कह सकते हैं। इसे देव संज्ञक मानते हैं। इस देव रहस्य को जानने वाले को सुख या देवत्व की
प्राप्ति होना उचित है।]
आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य
श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २॥
आपः (मूलतत्त्व) ही अर्क है। उस आपः के ऊपर स्थूल भाग एकत्र हो जाने से पृथिवी की उत्पत्ति
हुई। तदुपरान्त उस पृथिवी पर सृजेता के श्रम और तपश्चर्या के परिणाम स्वरूप उसका (ईश्वर का) सारभूत
तेज अग्नि के रूप में प्रकट हुआ॥ २॥
स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयंᳵ स एष प्राणस्त्रेधा विहितः। तस्य
प्राची दिक़्शिरोऽसौ चासौ चेमौ। अथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ
दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्वचैति
तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३॥
उस परमेश्वर ने अपने (अग्निरूप अवतरण) के तृतीयांश को सूर्य, तृतीयांश को वायु (तथा शेष
तृतीयांश अग्नि) इस प्रकार तीन भागों में विभक्त किया । पूर्व दिशा उस विराट् का शीर्ष भाग (सिर),
ईशान दिशाएँ और आग्नेय दिशाएँ उसकी दोनों बाँहें, पश्चिम दिशा उसकी पूँछ तथा वायव्य और नैऋत्य
दिशाएँ उस विराट् की जंघाएँ हैं। उत्तर और दक्षिण दिशाओं को उसका पार्श्व भाग तथा द्युलोक को पृष्ठ
भाग कहते हैं। अन्तरिक्ष उसका उदर प्रदेश और पृथिवी वक्षस्थल (हृदय) है। यह (अग्नि रूप विराट्
तत्त्व) आपः तत्त्व में प्रतिष्ठित है। इस विराट् को जो इस प्रकार जानता है, वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३॥
सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनᳵ समभवदशनाया
मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत्। न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं
कालमबिभः। यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत। तं जातमभिव्याददात्स
भाणकरोत्सैव वागभवत्॥ ४॥
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बृहदारण्यकोपनिषद् [Header]
उस विराट् ने इच्छा की कि मेरा द्वितीय (भिन्न) रूप या प्रयास भी प्रकट हो। अस्तु, उस क्षुधारूप
मृत्यु ने मन के साथ वाणी की कामना की। दोनों के सम्बद्ध होने से जो रेतस् प्रकट हुआ, वही संवत्सर
हुआ। उससे पूर्व संवत्सर अथवा काल नहीं था। उस संवत्सर को उतने ही समय तक वे मृत्यु स्वरूप
प्रजापति गर्भ में धारण किये रहे। निर्धारित समय पूरा हो चुकने के बाद उस (संवत्सर) को प्रकट किया।
उस उत्पन्न कुमार को खाने के लिए मृत्यु ने मुँह फैलाया, तब उस (कुमार के) मुख से 'भाण्' (शब्द)
निकला, वही वाणी हो गई ॥४॥
[यह आलंकारिक वर्णन है। मन के साथ वाणी के संयोग से रेतस् अर्थात् प्रवहमान तेजस्-ज्ञान
प्रकट हुआ। वही घनीभूत होकर संवत्सर (संवित्+सर) अर्थात् मन एवं वाणी के संयोग से बना ज्ञान
सरोवर बना। वह ज्ञान काल-कवलित न हो जाये, इसलिए उसने भा=शोभायुक्त, ण=प्राण प्रयोग (शोभनीय
प्राण प्रयोग अर्थात् ज्ञानयुक्त जीवों का विस्तार) किया। यह बात आगे सिद्ध होती है।]
स ऐक्षत यदि वा इममभिमांᳵस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳ
सर्वमसृजत यदिदं किंचर्चो यजूंषि सामानि छन्दाꣳसि यज्ञान् प्रजाः पशून्। स
यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वꣳ सर्वस्यैतस्यात्ता भवति
सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥५॥
उस (मृत्यु) ने कुमार को भयभीत देखकर सोचा कि यदि मैं इसका भक्षण कर लूँ, तो यह अत्यल्प
अन्न ही ग्रहण करूँगा। अस्तु, मृत्यु ने मन और वाणी के संयोग से ऋक्, यजु, साम, छन्द और यज्ञ, पशु और
प्रजा की रचना की। इन सभी सृजित वस्तुओं को उसने भक्षण कर लेने का विचार किया। वह सबका भक्षण
करता है। ईश्वर भी सभी को अपने में लीन कर लेता है। अतः यही उस अदिति (अखण्ड रूप ईश्वर) का
अदितित्व (एकरस-एकरूप) है। जो इस प्रकार इस अदिति के अदितित्व का ज्ञान रखता है, वह इन सबका
अत्ता होता है अर्थात् वह समस्त वस्तुओं और अन्नों का खाने वाला (आत्मसात् करने वाला) होता है ॥५॥
सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳ श्वयितुमध्रियत
तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥६॥
उस (प्रजापति) ने कामना की कि मैं फिर से एक विराट् यज्ञ द्वारा यजन कार्य करूँ, सो उसने श्रम
और तप किया। तप और श्रम से यश और बल प्रकट हुए। प्राण तत्त्व ही यश और बल (वीर्य) है। प्राणों
के विस्तार के साथ ही शरीर फूलने (विस्तार पाने) लगा। तब भी उसका मन शरीर में (उस विकास
प्रक्रिया में) ही लगा रहा ॥६॥
[वर्तमान वैज्ञानिक-अनुसंधान के आधार पर भी सृष्टि का उद्भव बिगबैंग-महाविस्फोट के साथ
प्राण-प्रक्रिया का विस्तार हुआ और दृश्य जगत् फैल गया। पहले पदार्थ अत्यधिक घनीभूत था। उसके
फैलने-फूलने से ही यह मेध्य समझ जाने योग्य ब्रह्माण्ड विकसित हुआ।]
सोऽकामयत मेध्यं म इदꣳ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति ततोऽश्वः समभवद्यदश्व-
त्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वं । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद तमनवरु-
द्ध्यैवामन्यत तꣳ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् तस्मात्सर्वदेवतं
प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायम-
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५
ग्रिरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ सोपुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप
पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ७ ॥
तदुपरान्त उसने कामना की कि मेरा यह शरीर जानने योग्य अथवा यज्ञीय (मेध्य) हो जाए और मैं
इसके माध्यम से शरीरवान् हो जाऊँ। तब यह शरीर अश्वत् (फैलकर बड़ा) हो गया। अस्तु, वह अश्व
कहलाया और वह अश्व ही मेध्य (जानने योग्य या संगति बिठाने योग्य अथवा यजनीय) हुआ। यही
अश्वमेध का अश्वमेधत्व है। इसे इस प्रकार जानने वाला ही वस्तुतः अश्वमेध को जानता है। उसने
(प्रजापति ने) उस अश्वमेध को अवरोध रहित ही विचार किया (दर्शन किया)। उसने (प्रजापति ने )
संवत्सर के बाद उसका (अश्व का) अपने निमित्त आलभन किया और अन्य पशुओं को भी देवों के
निमित्त प्रस्तुत किया। अस्तु, यजनकर्त्ता मन्त्र से संस्कारित समस्त देवों से सम्बन्धित प्राजापत्य पशु को
आलभित करते हैं। यह तप्यमान (आदित्य) ही अश्वमेध है। संवत्सर उसकी देह है। अग्नि अर्क है और
समस्त लोक ही इस (अश्व) की आत्मा हैं। ये अग्नि और आदित्य दोनों ही अर्क और अश्वमेध हैं; किन्तु
वे मृत्यु स्वरूप देवता एक ही हैं। इस प्रकार से मृत्यु को जानने वाला मृत्युजित् या मृत्युंजय हो जाता है।
वह स्वयं भी मृत्यु स्वरूप होकर देवों में भी मुख्य स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
उद्गीथ विद्या की यह आख्यायिका कतिपय परिवर्तनों के साथ छान्दोग्य उपनिषद् के अध्याय-१ के
द्वितीय खण्ड में भी आई है-
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु
लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥
प्रजापति के पुत्रों के दो वर्ग थे- देवता और असुर। उनमें देवता अल्प और असुर बहु संख्यक थे।
विभिन्न लोकों में निवास करते हुए वे परस्पर प्रतिस्पर्धा करने लगे। देवताओं ने निश्चय किया कि हम
लोग यज्ञ में 'उद्गीथ' के द्वारा असुरों का अतिक्रमण करें ॥ १ ॥
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
तदुपरान्त देवों ने उद्गीथ गान हेतु वाणी के अभिमानी देवता वाक् से निवेदन किया। उनके निवेदन
को स्वीकार कर वाक् ने उद्गीथ पाठ किया। उसने अपने भोग को देवताओं के निमित्त गाया और अपने
लिए शुभ वचनों का गान किया, जिससे असुर जान गये कि देवगण उद्गाता के माध्यम से हम पर
आक्रमण करेंगे। अस्तु, उन्होंने वाक् के निकट जाकर उसे पाप से विद्ध कर दिया। वाक् का निषिद्ध
(अनुचित) वचन ही वस्तुतः पाप है ॥ २ ॥
अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तंदेवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं जिघ्रति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥
२४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तब देवों ने प्राण से कहा कि आप हमारे लिए उद्गाता बन जाएँ। प्राण ने 'तथास्तु' कहकर इसे
स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गायन सम्पन्न किया। उसने (प्राण ने) प्राण तत्त्व के भोग को देवताओं के
लिए और जिस (श्रेष्ठ) गंध को वह सूँघता है, उसे अपने लिए गाया। असुरों को विदित हो गया कि देवता
प्राण रूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। अस्तु, वे प्राण के पास गये और उसे पाप से बींध दिया।
घ्राण (प्राण शक्ति) जिस अनुपयुक्त अथवा निषिद्ध को सूँघता है, वही पाप है॥ ३॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायद् यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४॥
तब देवों ने चक्षु से उद्गीथ गान करने के लिए निवेदन किया। उसे स्वीकार कर चक्षु इन्द्रिय ने
उद्गीथ गान किया। चक्षु में स्थित भोग सामर्थ्य को उसने देवों के निमित्त गाया और उसमें जो शुभ दर्शन
का गुण है, उसे अपने लिए गाया। इस तथ्य को असुरगण जान गये कि देवता चक्षुरूप उद्गाता के द्वारा
हमारा अतिक्रमण करेंगे, तब असुरों ने चक्षु के निकट जाकर (आक्रमण करके) उसे पाप से विद्ध कर
दिया। नेत्रेन्द्रिय जिस अनुचित को देखती है, वही पाप है॥ ४॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्रायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणःशृणोति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपःशृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥
इसके बाद देवताओं ने श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) से कहा कि आप हमारे लिए उद्गान करें। श्रोत्र ने स्वीकार करके
देवों के लिए उद्गान किया। श्रोत्रेन्द्रिय के भोग को उसने देवताओं के लिए और वह जो शुभ सुनता है, उसे अपने
लिए गाया। असुर यह जान गये कि श्रोत्र रूप उद्गाता के द्वारा देवता हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उनने श्रोत्र पर
आक्रमण किया और उन्हें पाप- रूप अस्त्र से बींध दिया। अनुचित और अनुपयुक्त सुनना ही पाप है॥५॥
अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणः संकल्पयति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपः संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मेनाविध्यन् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवताओं ने मन से उद्गान करने की प्रार्थना की। मन ने उसे स्वीकार कर लिया और
उद्गान सम्पन्न किया। मन के भोगों को उसने देवताओं के लिए और उसके शुभ संकल्पों का अपने लिए
गान किया। इससे असुर यह जान गये कि देवगण मनरूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। तब
उन्होंने (असुरों ने) मन पर आक्रमण करके उसे पाप से विद्ध कर दिया। अनुपयुक्त और अशुभ संकल्प
करना ही पाप है। अतः देवगण पाप का संसर्ग पाकर (असुरों द्वारा) पाप से विद्ध हुए ॥ ६ ॥
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन
वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सयन्स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वग्ंसे
तैवग्ं हैव विध्वग्ंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य
द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
तब देवों ने अपने मुख में निवास करने वाले प्राण से निवेदन किया कि आप हमारे निमित्त उद्गीथ
पाठ करें। मुखस्थ प्राण ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गान किया, जब असुरों ने यह
जाना कि देवता (प्राणरूप) उद्गाता के द्वारा हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उन्होंने प्राण के पास जाकर
उसे भी पाप से विद्ध करने का प्रयत्न किया, परन्तु मिट्टी के ढेले के पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाने
के समान वे असुरगण (मुखस्थ प्राण से टकराकर) विभिन्न प्रकार से छिन्न-भिन्न होकर ध्वस्त हो गये। इस
प्रकार देवगण विजयी और असुर-गण पराजित हुए। जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है वह शत्रु को
पराजित करके स्वयं विजयी होता है ॥ ७॥
ते होचु क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरितिसोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां
हि रसः ॥ ८ ॥
इसके पश्चात् उन देवताओं ने परस्पर चर्चा की कि जिसने हमें असक्त (स्व स्वरूप से युक्त) किया
अर्थात् हमारी रक्षा की और हमें देवत्व भाव को प्राप्त कराया, वे कहाँ स्थित हैं? किसी ने उत्तर दिया कि
वे (मुख्य प्राण) हमारे मुख में स्थित हैं, इसीलिए उनका नाम अयास्य हुआ। अङ्गों का रस होने के कारण
उन्हें आङ्गिरस भी कहते हैं ॥ ८॥
सा वा एषा देवता दुर्नाम दूरँ ह्यस्या मृत्युर्द्दूरँ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥
यह (प्राण नाम वाले) देवता 'दूर' नाम से युक्त हैं, क्योंकि मृत्यु इससे दूर रहती है। जो इस
(मृत्यु के प्राण से दूर रहने के रहस्य) को इस तरह जानता है, वह मृत्यु से बचा रहता है ॥ ९ ॥
स वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार
तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥
उस, इस प्राण रूप देवता ने इन्द्रियरूपी देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को विनष्ट करके दिशाओं के
सीमान्त स्थल तक पहुँचा दिया और तिरस्कारपूर्वक उसने (प्राण ने) उन्हें (पापों को) वहाँ प्रतिष्ठित कर
दिया। अतः किसी को भी यह सोचकर कि मैं पापरूप मृत्यु के पाश में न फँसूँ, दिशाओं के सीमान्त प्रदेश
में नहीं जाना चाहिए (अर्थात् मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए) ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥
उस प्राण देवता ने इन्द्रियादि देवताओं के पाप रूप मृत्यु को विनष्ट कर उन्हें मृत्यु के उस पार पहुँचा
दिया अर्थात् मृत्यु रहित कर दिया (पाप का परित्याग कर मानव मोक्ष रूपी अमृतत्व को प्राप्त करता है) ॥
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः
परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
उस प्राण देवता ने सर्वप्रथम वाग्देवता को मृत्यु के पार किया। वाग्देवता मृत्यु के पार होते ही (अमृतत्व
प्राप्त करके)अग्निरूप हो गये। अग्निरूप हुई वह वाणी ही मृत्यु का अतिक्रमण करके देदीप्यमान हो रही है ॥ १२ ॥
अथ ह प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण
मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
तदुपरान्त उस प्राण देवता ने घ्राणशक्ति को मृत्यु के पार किया। तब (पापरूपी) मृत्यु से पार हुई
वह घ्राण शक्ति वायुरूप हो गई। अब वही वायु मृत्यु के पाश से मुक्त होकर प्रवाहित हो रही है ॥ १३ ॥
२४८ बृहदारण्यकापानषद
अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत् सोऽसावादित्यः परेण
मृत्युमतिक्रान्तास्तपति ॥ १४॥
तत्पश्चात् वह प्राण चक्षु को मृत्यु के पार ले गया। मृत्यु बन्धन से विमुक्त हुआ चक्षु आदित्य रूप
हो गया। अब वही चक्षु पाप (मृत्यु) बन्धन से मुक्त होकर आदित्य रूप से तपता है-प्रकाशित होता है॥
अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवंस्ता इमा दिशः परेण
मृत्युमतिक्रान्ताः॥ १५॥
इसके बाद प्राण ने श्रोत्र को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से मुक्त होकर श्रोत्र दिशारूप हो गये। इस
प्रकार दिशारूप होकर श्रोत्र मृत्यु बन्धन से छूट गये॥ १५॥
अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ परेण
मृत्युमतिक्रान्तो भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥
तब उस प्राण ने मन को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से पार होकर मन चन्द्रमा हो गया। पाप अथवा
मृत्यु से मुक्त होकर वह मन ही चन्द्रमा होकर प्रकाशित हो रहा है। इस रहस्यात्मक तथ्य को जानने वाले
(तत्त्वज्ञानी) के प्राण उसे मृत्यु से मुक्त कर देता है॥ १६॥
अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किंचान्न मद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७॥
तदुपरान्त प्राण ने अपने निमित्त अन्न का गायन (गुणगान) किया, क्योंकि जो भी अन्न ग्रहण किया
जाता है, वह प्राण द्वारा ही भक्षण किया जाता है और अन्न से ही प्राण प्रतिष्ठित होता है॥ १७॥
ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदं सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति
ते वै माभिसंविशतेति तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त तस्माद्यदनेनान्नमत्ति
तेनैतास्तृप्यन्त्येवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादो-
ऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रतिबुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य
एवैतमनुभवति यो वै तमनु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८॥
इसके पश्चात् देवों ने प्राण से कहा कि आपने सम्पूर्ण अन्न का उद्गान अपने निमित्त ही किया है,
अतः अपने उपभोग से अवशिष्ट अन्न में हमें भी भागीदार बनाएँ। प्राण ने कहा कि आप लोग अपना भाग
ग्रहण करने हेतु चारों ओर से हममें प्रवेश करें। 'ऐसा ही करेंगे'- यह कहकर वे समस्त (इन्द्रियरूप)
देवगण प्राण में प्रवेश कर गये। इस प्रकार प्राण द्वारा अन्न (भोज्य-पदार्थ) ग्रहण किये जाने पर इन्द्रियरूप
देवता भी तृप्ति अनुभव करते हैं। इस प्रकार से जानने वाले का ज्ञानीजन आश्रय ग्रहण करते हैं। वह
स्वजनों का पोषक, उनमें श्रेष्ठ और अग्रगामी होता है। ज्ञानीजनों में से भी; जो इस प्रकार के ज्ञाता के
विपरीत होना चाहते हैं, वे अपने आश्रित जनो का भरण-पोषण नहीं कर पाते और जो उनके अनुकूल होते
हैं, वे अपने स्वजनों-आश्रितों का भरण-पोषण करने में सक्षम होते हैं॥ १८॥
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां
रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अङ्गानां रसः॥
उस प्राण तत्त्व को अयास्य तथा आङ्गिरस कहा गया है, क्योंकि वह मुख में स्थित अङ्गों का
(रस) सार होता है। निश्चित ही प्राण अङ्गों का रस है, क्योंकि जब शरीर के किसी भी अङ्ग से प्राण
निकल जाता है, तो वह अङ्ग सूख जाता है॥ १९॥
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९
एष उ एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥
प्राण को ही बृहस्पति कहा गया है, क्योंकि वाणी बृहती है और उसके पति बृहस्पति हैं ॥ २० ॥
एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग् वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥
यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाणी ही ब्रह्म है और प्राण वाणी का स्वामी है, इसलिए प्राण ही ब्रह्मणस्पति है ॥
एष उ एव साम वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वं यद्वेव समः प्लुषिणा
समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते
साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥
यही (प्राण) साम है। यह वाक् ही 'सा' और यह प्राण ही 'अम' है। 'सा' और 'अम' के संयोग
से ही 'साम' बनता है। साम का सामत्व भी यही है, क्योंकि यह (प्राण) मक्खी जैसा है, मच्छर जैसा
है, हाथी जैसा है और तीनों लोकों के तुल्य है। इसी कारण वह साम है। जो इस प्रकार साम के विषय में
जानता है, वह साम के सायुज्यत्व और सालोक्यत्व को प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्चगीथा
चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
इसी प्राण को उद्गीथ कहते हैं। प्राण के द्वारा ही सब कुछ धारण किया हुआ होने से इसे 'उत्'
कहा गया है। वाक् अर्थात् वाणी ही गीथा (गीत) है, प्राण ही उत् है और गीथा भी, इसीलिए इसे
'उद्गीथ' कहते हैं ॥ २३ ॥
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयता-
द्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोद्गायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोद्गायदिति ॥ २४ ॥
(प्राण के विषय में) एक प्रसिद्ध आख्यायिका यह भी है कि चैकितानेय ब्रह्मदत्त ने सोमपान करते
समय यह कहा कि यदि मैंने मुख में निवास करने वाले अङ्गों के रस को प्राणों से अलग जानकर उद्गान
(उद्गीथगान) किया हो, तो सोमदेव मेरा सिर गिरा दें (अर्थात् मेरा अपमान कर दें अथवा मेरा सोमपान
व्यर्थ कर दें)। इससे स्पष्ट होता है कि उसने प्राण और वाक् द्वारा ही उद्गान किया था ॥ २४ ॥
[ मुख से - वाणी से जो व्यक्त है, वह यदि प्राणों के स्पन्दन से युक्त नहीं तो व्यर्थ है- ढोंग है। केवल रटकर
बोले गये शब्दों में अनुभूतिजन्य प्राणों का संचार न होने से वे निस्तेज-निष्प्रभावी होते हैं। प्राण एवं वाक् का
संयोग जीवन साधना में अनिवार्य है।]
तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं
करिष्यन्वाचि स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसंपन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त
एवाथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥
जो व्यक्ति इस साम के 'स्वर' से यथार्थ रूप से विज्ञ है, वह निश्चित ही धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न होता
है। स्वर (कण्ठ की मधुरता) ही उसका धन है। अतः ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करने वाले को स्वर में
माधुर्य का समावेश करना चाहिए। उत्कृष्ट स्वर युक्त वाणी में ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करना चाहिए;
क्योंकि यज्ञ में मधुर स्वर युक्त उद्गाता का दर्शन करने की सभी इच्छा करते हैं। जो व्यक्ति साम के धन
को जानता है, वह उस धन (मधुर स्वर) को अवश्य ही प्राप्त करता है ॥ २५ ॥
२५० बृहदारण्यकोपनिषद्
तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं
भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
जो इस साम के सुवर्ण (मधुर-स्वर या धन) को जानता है, उसे सुवर्ण (मधुर स्वररूपी धन) मिलता
है; क्योंकि मधुर स्वर ही साम का सुवर्ण है। जो साम के सुवर्ण को इस प्रकार जानता है, वह निश्चित ही
सुवर्ण प्राप्त करता है ॥ २६ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि
खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७॥
जो व्यक्ति साम की प्रतिष्ठा के विषय में जानते हैं, वे प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। व्यक्ति की वाणी ही प्रतिष्ठा
स्वरूप है (उसी से प्रतिष्ठा मिलती है)। प्राण ही निश्चित रूप से वाणी में प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है। कुछ
विद्वानों का कथन है कि वह प्राण अन्न में प्रतिष्ठित होकर (अन्न की शुद्धि के साथ) गाया जाता है ॥ २७ ॥
अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र
प्रस्तुयात्तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति स
यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति। अथ यानीतराणि स्तोत्राणि
तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं०स एष एवंविदुद्गातात्मने
वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया
आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २८ ॥
अब आगे पवमान-स्तोत्रों का पाठ करने का विधान वर्णित किया जाता है- प्रस्तोता (प्रस्तोता नामक
ऋत्विज्) यज्ञकर्म में सामगान प्रारम्भ करने से पहले इन मंत्रों का जप करे- 'असतो मा सद्गमय,'
'तमसो मा ज्योतिर्गमय', 'मृत्योर्माऽमृतं गमय' अर्थात् हमें असत् से सत् की ओर ले चलो, हमें
अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, हमें मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। प्रस्तोता जब यह कहता है,
मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो, तब उसका अभिप्राय होता है- मृत्यु ही असत् और अमृत ही सत् है
और मुझे मृत्यु से बचाकर अमर कर दो। जब वह यह कहता है कि मुझे तमस् से प्रकाशोन्मुख करो, तब
उसका अभिप्राय होता है कि मृत्यु ही अंधेरा और अमृत ही प्रकाश है और मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर
ले चलो। जब वह (प्रस्तोता) यह कहता है कि मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो, तो इस कथन में
तो कुछ छुपी बात है ही नहीं अर्थात् कथन स्पष्ट ही है। अन्य स्तोत्रों में उद्गाता को अपने लिए अन्न
(पोषक तत्त्वों) का उद्गान करना चाहिए। इन स्तोत्रों के द्वारा यजमान इच्छित भोगों की याचना करे। इस
तथ्य को जानने वाला उद्गाता अपने या यजमान के निमित्त जिस वस्तु या भोग की कामना करता है, उसी
का उद्गान करता है। यह प्राण दर्शन समस्त लोकों को प्राप्त करने का साधन है। जो ज्ञानी इस साम को इस
प्रकार से जानता है, उसे कुछ भी प्राप्त करने के लिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है ॥ २८ ॥
अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ २५१
अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ २५१
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे
व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य
भवति स यत्पूर्वो ऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं
योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १॥
पुरुष के रूप में यह आत्मा (पहले एकाकी) ही था। चतुर्दिक् दृष्टिपात करने पर उसने अपने से भिन्न
कुछ भी नहीं पाया, तब उसने कहा 'अहमस्मि' अर्थात् मैं हूँ। इसीलिए उसे अहम् संज्ञक कहा जाता है।
इसी कारण अभी भी बुलाए जाने पर कोई व्यक्ति पहले 'अयमहम्' अर्थात् 'यह मैं हूँ' कहने के बाद ही
अपना अन्य नाम बतलाता है। उस (प्रजापति) ने (समस्त पापों को) दग्ध कर दिया था, इसीलिए वह
पुरुष कहलाया। जो इस प्रकार इस पुरुष (आत्मा) को जानता है, वह उस (आत्मा) से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध
करने का प्रयास करने वाले को भस्मीभूत कर देता है ॥ १ ॥
[पुर् =प्रथमे, उष=दाहे, प्रथम-पहले ही विकारों-पापों का दाह कर देने वाला होने से 'पुरुष' कहलाता है।
पुरुष कहलाने वाले में विकारों को दग्ध कर देने का पुरुषोचित पौरुष होना चाहिए।]
सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षांचक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति
तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्धयभेष्यद्द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥
तदुपरान्त वह (पुरुष) भयभीत हो गया। इसी कारण अकेला पुरुष भयभीत होता है, तब उस पुरुष
ने चिन्तन किया कि जब मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है, तब मैं किससे और क्यों भय करूँ? यह चिन्तन
करते ही उसका भय दूर हो गया; क्योंकि भय तो दूसरों से ही होता है, अकेला होने पर तो उसके भय का
कोई कारण नहीं है ॥ २ ॥
स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ
संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव
स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत्ततो मनुष्या
अजायन्त ॥ ३ ॥
(एकाकी होने के कारण) वह रमा नहीं अर्थात् उसका मन नहीं लगा। इसी कारण एकाकी
पुरुष का मन अभी भी रमता नहीं। तब उसने किसी अन्य की आकांक्षा की। तदुपरान्त स्त्री और
पुरुष के सम्मिलित होने पर जितना आकार होता है, वह पुरुष उतने ही आकार का बन गया और
उसने अपने शरीर को स्त्री और पुरुष इन दो भागों में विभक्त कर दिया। जिससे दोनों भाग परस्पर
पति-पत्नी हुए । ऋषि याज्ञवल्क्य का कथन है कि - इसी कारण यह काया अर्द्धबृगल (द्विदल अन्न
के एक दल) की भाँति है। अस्तु, यह आकाश (पुरुष का रिक्त भाग) स्त्रीत्व से पूर्ण होता है।
पुरुष और स्त्री के सम्मिलन से ही मनुष्यों की उत्पत्ति हुई है ॥ ३ ॥
२५२ बृहदारण्यकोपनिषद्
[ शिव के अर्धनारी नटेश्वर की धारणा यहाँ स्पष्ट की गई है। प्रथम चरण में पुरुष एवं प्रकृति के प्रकटीकरण
की घटना गर्भ से शिशु जन्म की तरह घटित नहीं हुई। दाल या सीप पकने पर उसके दो दल खुल जाने की तरह
यह सृष्टि प्रक्रिया सम्पन्न हुई। ब्रह्म से पुरुष और प्रकृति, महादेव से शिव और शक्ति, प्रजापति से ब्रह्मा और सावित्री
का प्राकट्य इसी प्रकार हुआ।]
सो हेयमीक्षांचक्रे कथं नु मात्मान एव जनयित्वा संभवति हन्त तिरोऽसानीति सा
गौरभवदृ षभ इतरस्ताग्ं समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा
गर्दभ इतरस्ताग् समेवाभवत्तत एकशफमजायताजेतराभवदस्त इतरोऽविरितरा मेष
इतरस्ताग्ंसमेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किंच मिथुनमापिपीलि-
काभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४॥
उस स्त्री ने सोचा कि अपने ही शरीर से मुझे प्रकट करके यह पुरुष मुझसे सम्पर्क क्यों करता है ?
अच्छा हो मैं इससे बचने के लिए छिप जाऊँ, अस्तु उसने गौ का रूप धारण कर लिया, तब वह पुरुष वृषभ
बन गया, जिससे गौओं और बैलों की उत्पत्ति हुई, तदुपरान्त उसने घोड़ी का शरीर धारण कर लिया, तब
पुरुष अश्व हो गया, फिर वह गर्दभी बन गई और पुरुष गर्दभ बन गया, इससे एक खुर वाले पशुओं का
प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् वह बकरी बन गई और पुरुष बकरा बन गया, जब वह भेड़ी बन गई, तो वह भेड़ा
बन गया, इस प्रकार बकरियों और भेड़ों की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार चींटी तक सभी जोड़े सहित मिथुनों
की रचना सम्पन्न हुई ॥ ४॥
[ ऋषि यहाँ बहुत स्पष्टता से यह तथ्य प्रकट करते हैं कि विकासवाद के अनुसार अमीबा से धीरे-धीरे
विभिन्न प्रजाति के प्राणियों के विकास की कल्पना उचित नहीं है। प्रथम- चरण में आवश्यकतानुसार जिस-जिस
रूप में प्रकृति अपने संकल्प से ढलती गयी, उसी अनुरूप उसका पूरक पुरुष पक्ष भी संकल्प शक्ति से ही बना,
उसके बाद मैथुनी सृष्टि का क्रम प्रारम्भ हुआ।]
सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहग्ंहीदग्ंसर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत्सृष्ट्याग्ं हास्यैतस्यां
भवति य एवं वेद ॥ ५॥
यह रचना करने के बाद प्रजापति रूप उस पुरुष की ज्ञान हुआ कि मैंने सबकी रचना की है, इसलिए
मैं ही सृष्टि हूँ। इस प्रकार वह 'सृष्टि' नाम से युक्त हुआ। सृष्टि की इस प्रकार जानने वाला व्यक्ति उसकी
सृष्टि में प्रसिद्धि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत तस्मादेतदुभयमलो-
मकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देव-
मेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किंचेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत
तदु सोम एतावद्वा इदग्ंसर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमनिरन्नादः सैषा
ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृ-
ष्टिरतिसृष्ट्याग्ं हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥
अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २५३
अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २५३
तदुपरान्त उस पुरुष (प्रजापति) ने मन्थन किया। उसने मुखरूपी योनि (उत्पत्ति स्थल) और दोनों
हाथों से मन्थन करके अग्नि को प्रकट किया। हाथ और मुख दोनों में ही अन्दर की ओर लोम नहीं होते
और योनि में भी अन्दर लोम नहीं होते। अस्तु, जो (याज्ञिक जन) एक-एक देवता (अग्नि, इन्द्र आदि) के
लिए यजन करने को कहते हैं, वे इस तथ्य को नहीं जानते कि सब देवता एक ही परमेश्वर में समाहित
हैं और उस एक (परमेश्वर) ने ही सृष्टि की रचना की है। जो भी द्रव पदार्थ है, वह वीर्य से उत्पन्न सोम
है। निश्चित ही सोम ही अन्न, अग्नि और अन्नाद का उपभोग करने वाला है। परब्रह्म की यह महान् रचना
है। यह ब्रह्मा की महान् सृष्टि (अतिसृष्टि) ही है कि उसने अमरत्व प्राप्त देवताओं का सृजन किया - स्वयं
मर्त्य होकर अमृत्तों का निर्माण किया, इसलिए इसे अतिसृष्टि कहा जाता है। जो इस सृष्टि को इस प्रकार
जानता है, वह इस (परब्रह्म) की अतिसृष्टि में (प्रसिद्धि को प्राप्त) हो जाता है॥ ६ ॥
तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतेऽसौनामायमिदंऽरूप इति
तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतेऽसौनामायमिदंऽरूप इति स एष इह प्रविष्ट
आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाये तं न पश्यन्ति ।
अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्पश्यंऽश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो
मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदाकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन
भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन
ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ ७॥
पहले (सृष्टि के आरम्भ में) यह जगत् नाम रहित था। तत्पश्चात् वह नाम और रूप से युक्त होकर
प्रकट हुआ। इसीलिए कोई वस्तु अभी भी 'इस नाम और रूप से युक्त है' इस प्रकार जानी जाती है। वह
(आत्मा) इस शरीर में नखों के अग्रभाग तक इस प्रकार प्रविष्ट है, जिस प्रकार उस्तरे का फल काष्ठ में
प्रविष्ट रहता है और अग्नि अपने आश्रय वेदी अथवा काष्ठ में स्थित रहती है, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख सकना
किसी के लिए सम्भव नहीं है। वह आत्मा अपूर्ण है। प्राणन प्रक्रिया (श्वास-प्रश्वास) के कारण उसे प्राण,
बोलने के कारण वाणी, देखने के कारण चक्षु, सुनने के कारण श्रोत्र और मनन करने के कारण मन कहते
हैं। ये सभी संज्ञाएँ उसे उसके भिन्न-भिन्न कर्मानुसार प्रदान की गई है। अस्तु, जो व्यक्ति इनमें से पृथक्-
पृथक् की उपासना करता है, वह (इसके वास्तविक स्वरूप को) नहीं जानता, क्योंकि सभी गुण उस एक
में ही एकत्र हो जाते हैं। यह आत्मा सबके लिए प्राप्त करने योग्य है; क्योंकि इसे प्राप्त कर लेने अथवा जान
लेने से सम्पूर्ण विश्व को जाना जा सकता है। जिस प्रकार पद-चिह्नों द्वारा खोये हुए (पशु आदि) को ढूँढ़
लिया जाता है (उसी प्रकार व्यक्ति आत्मा को जानकर उसके सूत्रों द्वारा सम्पूर्ण संसार को जान लेता है)।
इस तथ्य को इस प्रकार जानने वाला कीर्ति लाभ प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः
प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियंऽ रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य
आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति ॥ ८ ॥
२५४ बृहदारण्यकोपनिषद्
इस प्रकार यह (आत्मा) पुत्र से भी अधिक प्रिय, सम्पदा से भी अधिक प्रिय और अन्य सभी से भी
अधिक प्रिय है । शरीर के अन्दर स्थित आत्मा से भिन्न वस्तु को यदि कोई अधिक प्रिय समझता है, तो वह
मानों अपने अन्तरात्मा को ही खो देता है अर्थात् आत्मा को विस्मृत कर देता है। जो साधक आत्म तत्त्व को
सर्वाधिक प्रिय मानकर उसकी उपासना करता है, वह कभी मरता नहीं- अमर हो जाता है ॥ ८ ॥
तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मा-
त्सर्वमभवदिति ॥ ९ ॥
जिज्ञासु ब्राह्मणों द्वारा कहा गया है कि ब्रह्मविद्या के माध्यम से 'हम सब कुछ हो जाएँगे' अर्थात् हमें
सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। इस तथ्य का क्या आधार है ? क्या अभी तक किसी ने उस ब्रह्मविद्या को भली-
भाँति जान लिया है, जिसके द्वारा उसे सब कुछ प्राप्त हो गया है ? ॥ ९ ॥
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत् सर्वमभवत् तद्यो
यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः
प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाऽहं ब्रह्मास्मीति स इदग्ंसर्वं
भवति तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते आत्मा ह्येषाग्ं स भवत्यथ योऽन्यां
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवग्ं स देवानां यथा ह वै
बहवः पशवो मनुष्यं भुंज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं
भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
सर्वप्रथम केवल ब्रह्म ही था। यह जानकर कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वह सर्वरूप हो गया। देवताओं में से
जिस-जिस ने उस ब्रह्म को जाना, वे सब ब्रह्मरूप हो गये। इसी तरह मानवों और ऋषियों में से भी जिस-
जिस ने उसका ज्ञान प्राप्त किया, वे सब भी ब्रह्मस्वरूप हो गये। ऋषि वामदेव ने कहा- इसे (ब्रह्म को)
जानकर मैं मनु और सूर्य हो गया। इस समय भी जो यह मानता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वह सर्वरूप हो जाता
है। उसको पराजित करने में देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका ही आत्मस्वरूप हो जाता है।
जो अपने और दूसरे में भेद देखता है, वह पशु के समान हो जाता है। जिस प्रकार विभिन्न पशु मनुष्यों को
पोषित करते हैं, उसी प्रकार (देवों के लिए पशु तुल्य) मनुष्य भी अनेक देवताओं को पोषित करते हैं।
एक पशु का ही अपहरण हो जाए, तो बुरा लगता है। यदि अनेक पशुओं का अपहरण हो, तब तो और भी
बुरा लगेगा। इसी कारण देवगण यह नहीं चाहते कि मनुष्य सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर सकें ॥ १० ॥
[ ऋषि का यह कथन बड़ा रहस्यात्मक है। देवता मनुष्य देह में विभिन्न इन्द्रियों, अंग-अवयवों के अधिष्ठाता
बनकर स्थित हैं। आत्म चेतना जब परमात्म तत्त्व की ओर उन्मुख होती है, तो इन्द्रियों की भोगेच्छाओं से उसका
लगाव हटने लगता है तथा उनमें स्थित देवता, जीवात्मा (आत्मचेतना) का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं,
यही प्रक्रिया उसके ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट होने में बाधक बनती है।]
ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकग्ं सन्न व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रं
यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति तस्मात्