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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 262 of 505

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Page 262

२६२ बृहदारण्यकोपनिषद्
हैं और जो भी लोक हैं (जीते हुए अथवा बिना जीते हुए) वे 'लोक' शब्द से एकीकृत हैं। यही गृहस्थ
का कर्त्तव्य है। पिता की इच्छा होती है कि पुत्र उसकी आज्ञा का पालन अवश्य करेगा। इसीलिए शिक्षित
पुत्र अनुशासन का पालन करते हुए लोक में पुण्य कृत्य करता है, अतः उसे 'लोक्य' कहते हैं। इस प्रकार
ज्ञान रखने वाला पिता जब इस मर्त्य लोक से गमन करता है, तो प्राणों (अंश) के माध्यम से पुत्र में प्रतिष्ठित
होता है (अर्थात् अपनी सम्पूर्ण जिम्मेदारी पुत्र को सौंपता है)। यदि किसी कारण (या प्रमादवश) पिता के
द्वारा कोई करणीय कार्य शेष रह जाता है, तो पुत्र उसे पूर्ण कर देता है। इस प्रकार इह लोक में पिता को
अपने पुत्र के माध्यम से ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। पिता के साथ उसके अमृत प्राण ही गमन करते हैं ॥ १७॥
पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥
मनुष्य की वाक् शक्ति पृथिवी और अग्नि से युक्त होती है। वह दिव्य वाणी कहलाती है; क्योंकि उस
वाक् (वाणी) के माध्यम से वह (पिता) जो भी कहता है, वह पूर्ण होता जाता है ॥ १८ ॥
दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥
द्युलोक और आदित्य के द्वारा इसमें दिव्य मन आवेशित हो जाता है। दिव्य मन से युक्त होने के कारण
यह सदैव आनन्दमग्न रहता है, कभी भी शोकग्रस्त नहीं होता ॥ १९ ॥
अद्द्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः संचरँश्चासंचरँश्च
न व्यथतेऽथो न रिष्यति स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां
देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविद सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किंचेमाः प्रजाः
शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २० ॥
जल और चन्द्रमा के माध्यम से यह प्राण तत्त्व इस तत्त्वद्रष्टा में आवेशित होता है। यह दिव्य प्राण ही
है, जो सञ्चरित होते हुए और न होते हुए भी कभी व्यथित नहीं होता और न ही कभी विनष्ट होता है। इस
तत्त्व को इस प्रकार जानने वाला सब प्राणियों में स्थित आत्मा प्राण देवता के समतुल्य हो जाता है। समस्त
प्राणी जैसे प्राण देवता को पोषित करते हैं, ठीक उसी तरह तत्त्वदर्शी को पोषित करते हैं। लौकिक दुःखों
में लिप्त रहकर ये सांसारिक प्राणी शोक ग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु तत्त्व को जानने वाले पुरुष (दुःखों में भी)
कभी शोक नहीं करते और देवत्व प्राप्त कर लेने के कारण पाप भी कभी उनके समीप नहीं आता ॥ २० ॥
अथातो व्रतमीमांसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त
वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दधे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि
कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्द्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध
तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः
प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिर अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरँश्चासंचरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति
हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा
इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा
स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१॥