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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

रैवतगिरि कल्प-संक्षेप १३
मे रजत-स्वर्णमय चौबीस एवं लखाराम में चौबीस जिनेश्वरो की
बहत्तर गुफाएँ कही हैं।
कालमेघ के आगे स्वर्णवालुका नदी से तीन सौ आठ कदम
उत्तर दिगा मे जाकर गिरि-कन्दरा मे प्रविष्ट होकर जल से
स्नान करके उपवासपूर्वक रहने से द्वार खुलता है। प्रथम द्वार मे
स्वर्ण-खान, दूसरे द्वार मे रत्न-खान है जो सघ के लिए अम्बा देवी
द्वारा विकुर्वित है। वहाँ कृष्ण के पाँच भण्डार हैं, अन्य दामोदर
के समीप हैं। अंजनशिला के अधोभाग में बीस पुरुप नीचे रजत-
स्वर्ण-धूलि बतलाई है।
उसके पश्चिम मे मगलक देवदाली है जिससे रस-सिद्धि होती
है। संघ के समुद्धार कार्य के लिए श्री वज्रस्वामी ने बतलाई है।
शस्य कड़ाह मे लेकर कोटिविन्दु का सयोग करने पर घण्ट-
गिला चूर्ण के योग से अजन-सिद्धि होती है।
विद्यापाहुड उद्देशक से रैवत कल्प समाप्त हुआ। (ग्रथाग्र ० ३८)
●
३. श्री उज्जयन्तस्तवः
श्री रैवतक, उज्जयन्त आदि नामो से प्रसिद्ध, श्री नेमिनाथ
भगवान द्वारा पवित्रित श्री गिरनार गिरीश्वर की स्तवना
करता हूँ।
भुवन मे यह स्थान सौराष्ट्र देग नाम से विख्यात है जिसकी
भूमि रूपी कामिनी के ललाट पर यह गिरिराज तिलक के
समान है।

९४ विविध तीर्थ-कल्प
इसकी उपत्यका मे ऋषभदेवादि (जिनालयो से) अलंकृत
खंगार दुर्ग है और भगवान पार्श्वनाथ भूषित तेजलपुर है।
इसके दो योजन ऊँचे श्रृंग पर जिनालयो की श्रेणी शरच्चन्द्र
की किरणो जैसी निर्मल पुण्यराशि की भाँति सुशोभित है।
यहाँ श्री नेमिनाथ का सुन्दर चैत्य है और उसपर स्वर्णमय
दण्ड-कलश और आमलसार सुशोभित है।
यहाँ शिवादेवीनन्दन श्री नेमिनाथ भगवान् की चरणपादुका
के दर्शन, स्पर्शन और पूजन से शिष्ट लोगो के पाप-व्यूह नष्ट
होते हैं।
विशाल राज्य को पुराने तृण की भाँति छोडकर व स्नेहपूर्ण
बन्धुओ को त्याग कर प्रभु ने यहाँ महाव्रत स्वीकार किये।
उन प्रभु ने यही केवलज्ञान पाया और वे जगज्जनो का हित-
साधन कर यही से मोक्ष प्राप्त हुए। अतएव यहाँ मत्रीश्वर
श्री वस्तुपाल ने भव्य जनो के चित्त मे चमत्कृति करनेवाले तीन
कल्याणक मन्दिरो का निर्माण कराया।
यहाँ जिनेश्वर की प्रतिमाओ से पूर्ण इन्द्र-मण्डप मे श्री
नेमिनाथ भगवान का स्नान कराते हुए लोग इन्द्र की तरह
लगते हैं।
इस गिरिराज पर अमृतमय जल से पूर्ण गजेन्द्रपद नामक
कुण्ड है, जहाँ के जल से अर्हन्त भगवान का स्नात्र-न्हवण कराया
जाता है।
यहाँ वस्तुपाल के बनवाये हुए शत्रुञ्जयावतार चैत्य मे ऋषभ-
देव, पुण्डरीक, अष्टापद और नन्दीश्वर (स्थापित) हैं। स्वर्ण वर्ण
वाली सिंहवाहिनी अम्बिका सिद्ध¹ बुद्ध² पुत्रो से युक्त है, वह आम्र-
लुम्बधारिणी संघ के विघ्न हरण करती है।
श्री नेमिनाथ प्रभु के चरण-कमलो से पवित्रित अवलोकन
नामक शिखर के दर्शन करते भव्यजन कृतार्थता प्राप्त करते हैं।

श्री उज्जयन्तस्तव. १५

जाम्बवती की कुक्षी से उत्पन्न कृष्ण के पुत्र गाम्ब ने और
प्रद्युम्न एवं महाद्युम्न ने ऊँचे श्रृंग पर दुष्कर तपश्चर्या की। यहाँ
नाना प्रकार की औषधियाँ रात्रि मे जाज्वल्यमान-चमचमाहट
करती हैं। घण्टाक्षरगिला व छत्रशिला ऊँचे स्थान पर शोभित है।
सहस्राम्रवन व लक्षाराम एव दूसरे भी वनसमूह मयूर, कोयल
और भँवरो के संगीत से सुभग लगते हैं।
ऐसा वृक्ष, वल्ली, पुष्प या फल कोई नही है जिसे यहाँ इह-
लौकिक विद्वान भी न चाहते हो। जहाँ रथनेमि को उन्मार्ग से
सन्मार्ग मे लाया गया था, उस राजिमती की गृफा के अन्दर कौन
वंदन नही करते ?
यहाँ पर भव्य जनो द्वारा सम्पन्न पूजा, स्नात्र, दान और तप
मोक्ष सुख प्राप्ति के हेतु होते हैं। यहाँ जो इस पहाड़ पर दिग्भ्रम
से भी किसी भी मार्ग मे चला जाय तो वह भी चैत्य स्थित
जिनेश्वर को स्थापित और पूजित-अर्चित देखता है।
काश्मीर से आये हुए रत्नश्रावक ने यहाँ कुष्माण्डी-अम्बिका
के आदेश से लेप्यमय बिम्ब के स्थान पर पाषाणमय नेमिनाथ
प्रतिमा स्थापित की।
नदी-झरने-कुण्ड-खानो और लताओ की संख्या को कौन
गिनने वाला (गिनती कर सकता) है ? चैत्यो से अलकृत शिखरो
वाले रैवतगिरि को नमस्कार हो, जिस महातीर्थ का अभिषेक
मुक्तिदायक है।
सूरीन्द्रो से वर्णित और देवताओ के समान प्रभा वाले इस
गिरिराज की मैंने स्तुति की है ऐसा गिरनार और रजत-हेम सिद्धि
वाली भूमि आप सबको हर्षित करे। कवि ने युक्ति से अपना
जिनप्रभसूरि नाम भी इस गाथा मे दे दिया है।

४. उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प
सौराष्ट्र देश मे उज्जयन्त नामक रम्य पर्वत है जिसके शिखर
पर चढ कर भक्तिपूर्वक नेमि जिनेश्वर को नमस्कार करो ।
अम्बिका देवी को न्हवण-अर्चन-गध-धूप-दीपक से पूजन कर
प्रणाम करके धनार्थी अर्थ प्राप्त करता है ।
गिरिशिखर, कुहर, कन्दरा, झरने, कपाट, विकट कूपादि मे
खत्तवाय को देखो, जैसा कि पूर्वाचार्यों ने कहा है ।
कन्दर्प के दर्प को काटने वाले, कुगति दूर करने वाले, भगवान्
नेमिनाथ का मन्दिर निर्वाण-शिला नाम से जगत मे विख्यात है ।
उसके उत्तर की ओर दश धनुष पर अधोमुख विवर है, जिसके
द्वार पर चार धनुष नीचे अवदान लिंग है, ' वहाँ पशु मूत्र गन्ध
वाला रस है । सौ पल ताँबे के साथ मिलाने पर चन्द्रमा और कुन्द
के समान उज्ज्वल चाँदी सहसा बन जाती है ।
पूर्व दिशा से धनुष्यान्तर पर वैसा ही है जैसे आगे बताया,
वह पाषाणमय है और दक्षिण दिशा मे बारह धनुष जाने पर वहाँ
हिंगुल वर्ण वाला दिव्य प्रवर रस दिखाई पडता है जो अग्नि के
सग से सर्व प्रकार के लोहे को स्पर्श मात्र से ही वेध कर सोना
बना देता है ।
उज्जयन्त पर विहला नामक नदी है और पार्वती की प्रतिमा
है जिसे अगुली से दबाने पर पर्वतीय द्वार खुल जाता है ।
उज्जयन्त गिरिराज पर शक्रावतार है जिसके उत्तर की ओर
सोपान पक्तियाँ है और कबूतर के वर्ण वाली मिट्टी है । पच गव्य
से बाँधकर पिण्डी बनाकर धमन करने पर श्रेष्ठ चाँदी बनती है

उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १७

जो दारिद्रय व्याधि को नष्ट करती है और दुख-कान्तार से पार
लगा देती है।
शिखर के विशाल श्रुंग पर जहाँ पाद कुंट्टिमा दिखाई पडती
है उसके समीप गिखर पर कव्वड-हडा है उस पर पामह नामक
चाँदी है।
उज्जयन्त-रैवत वन मे जहाँ सुद्दार वानर है, उसका बाँया
कान कटा हुआ है, वह विवर के श्रेष्ठ द्वार को खोल देता है।
उस विवर मे प्रविष्ट होकर सौ हाथ जाने पर सुवर्ण वर्ण वाले
वृक्ष दिखाई पड़ते हैं, उनसे नीलां रस झरता है वह निश्चय से
सहस्रवेधी रस हैं। उसे लेकर निकलते हुए वानर-हनुमत को वाम
पाद से स्पर्श करना चाहिए, वह उस श्रेष्ठ द्वार को ढँक देता है
जिससे कोई भी मनुष्य जानने नही पाता।
उज्जयन्त शिखर पर कोहडि-अम्बिका गृह विख्यात है उसके
पोछे गिला है। उसके दोनो और औषधि है जिसे अलसी के तेल
से मिश्रित कर (प्रयोग करने पर) वह प्रतिवात वकित अंगो को
ठीक कर देती है। जिस पर अविका तुष्ट हो जाती है, उसकी
दुर्गति व सभी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। वहाँ पर प्रधान मन-
शिल वर्णवाली वेगवती नामक नदी है, उसकी मिट्टी को धमन
करने पर श्रेष्ठ रजत बन जाती है।
उज्जयन्त पर ज्ञानगिला है, जिसके नीचे सोने के समान वर्ण
वाली मिट्टी है, जिसका बकरे के मूत्र मे पिण्ड बनाकर खैर के
अगारो मे धमन करने पर सोना बनता है। ज्ञानशिला के नीचे
की मिट्टी पचगव्य से पिण्डी बनाकर हडे के नीचे रस हैं, उससे
सहस्र वेध करने पर सोना बनता है। गिरिराज के निकट 'तिल-
विसारण नामक औषधि है उसको लाकर गिला पर गाढी बाँधे,
उसमे दो लाख द्रम्म प्राप्त होते हैं। सुवर्ण तीर्थ पर लड्‌डुअ प्रधान
सेना नाम की नदी है, उसके पिण्ड से भी सोना बनता है, इसमें
कोई सन्देह नही।
२

१८ विविध तीर्थ-कल्प
विलक्ष नगर मे मधुक गृह नामक दिव्य शिखर है, उसके
बीच मे गणपति रस-कुण्ड हैं जिसके ऊपर उपवास करके पूजन
करने पर गणपति के चलाया हुआ प्रवर-रस "पामापेवी" (?)
है और बग को स्तम्भित कर देता है, इसमे सन्देह नहीं ।
सहस्राश्रव नामक तीर्थ करज वृक्ष से मनोहर और सुन्दर है ।
वहाँ पर तुरियाचार नाम के पाषाण है, उसके दो भाग हैं। एक
भाग पारदमूत्र से पीसकर अ धरूषा मे धमन करने पर चाँदी वन
जाती है, जिससे मनुष्य दु खरूपी कान्तार से पार उतर जाता है।
अवलोकन शिखर की शिला के पीछे वहाँ श्रेष्ठ रस झरता है
जो तोते के पख के समान वर्ण वाला है और 'सुव्व' को श्रेष्ठ
सोना बना देता है ।
प्रद्युम्नगिरि पर अम्बिकाश्रम पद नामक स्थान हैं, वहाँ भी
पीली मिट्टी है और हेमवाद से श्रेष्ठ सोना बनती है ।
उज्जयन्त पर जहाँ ज्ञानशिला है और उसके नीचे भी पीली
मिट्टी है, उसे 'साहामिय' लेप से छाया मे सुखाने पर सोना
बनता है।
उज्जयन्त के प्रथम शिखर पर चढकर दक्षिण की ओर उतरने
पर तीन सौ धनुष 'पूतिकर' नाम की गुफा है, उसे उघाड कर
निपुण व्यक्ति को देखकर वहाँ जाना चाहिए । वहाँ बारह दण्ड
के अन्तर पर जवू फल जैसा दिव्य रस है, जिसे भाड मे सहस्र
भाग चाँदी के साथ घोलने पर सहसा बाजारू सोना हो जाता है।
अम्बिका भुवन के पूर्व दिशा से उत्तर दिशा पर्यन्त तापस-
भूमि है, वहाँ वासुदेव की पाषाणमय प्रतिमा दीखती है, उससे
उत्तर दिशा मे दश हाथ जाने पर पार्वती की प्रतिमा दिखाई
पडती है। जिसे अवराह मुहर अगुष्टिका से दबाने पर रास्ता
देती है। नौ धनुष प्रवेश करने पर दक्षिणोत्तर दिशा मे कूप

उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १९
दिखाई पडता है उसमें निश्चय ही हरिताल लक्ष वर्ण वाला सहस्र-
वेधी रस है।
उज्जयन्त पर ज्ञानशिला विख्यात है, वहाँ पाषाण है, उसके
उत्तर पार्श्व मे दक्षिण अधोमुख विवर है, उसके दश धनुष दक्षिण
जाने पर हिंगुल वर्ण वाला शतवेधी रस है सो “सुव्व” को वेध
देता है इसमे कोई सन्देह नही।
वृषभ-ऋषभादि कूट पर पाषाण है, वहाँ पर सगम है। हाथी
को लीद के साथ स्पर्श करने पर वह सोना बन जाता है।
जिनालय के दक्षिण की ओर जानेपर जलुकचरी मिट्टी है, तिर्यञ्च
और मनुष्य के रक्त से विद्ध होने पर ताँबे को सोना बना देती है।
वेगवती नामक नदी है, उसमे मनशिल वर्ण वाले पाषाण हैं।
‘सुव्व’ को पत्रवेध करने पर स्रवित होता है और धमन करने पर
ताँवे को शीघ्र सोना बना देता है।
यह उज्जयन्त कल्प अविकल्प है, अम्बिका को प्रणाम कर जो
जिनभक्त करता है वह इच्छित सुख को प्राप्त करता है।
उज्जयन्त महातीर्थ का कल्प समाप्त हुआ।
५. रैवतगिरि-कल्प
पश्चिम दिशा मे सौराष्ट्र देश मे पर्वत-राज रैवत के शिखर
पर श्री नेमिनाथ भगवान का उत्तुग शिखर वाला भवन है।
पूर्वकाल मे वहाँ भगवान नेमिनाथ स्वामी की लेप्यमय प्रतिमा थी।
एक वार उत्तरदिशा-विभूषण कश्मीर देश से अजित और रतन

नाम के दो भ्राता संघपति होकर गिरनार आये । उन्होने शीघ्रता-
वश बहुत से पचामृत भरे कलशो द्वारा न्हवण-स्नात्र कराया
जिससे श्री नेमिनाथ भगवान की लेप्यमय प्रतिमा गल गई । उन्होने
अपने पर (गल्ती) अत्यन्त खेद करते हुए आहार का प्रत्याख्यान
कर दिया । इक्कीस उपवास के अनन्तर स्वयं भगवती अम्बिका
देवी आई, संघपति को उठाया । उसने देवी को देखकर जय जय
कार शब्द किया । देवी ने कहा—यह विम्ब ग्रहण करो, पर पीछे
मत देखना । अजित संघपति एक तार से खीचते हुए श्री नेमिनाथ
भगवान का रत्नमय विम्ब कचनवालानक से लाये । प्रथम भवन
की देहली मे आरोपण कर संघपति ने अत्यन्त हर्षपूर्वक पृष्ठ
भाग मे देखा । प्रतिमा वही पर निश्चल हो गई । देवी ने कुसुम-
वृष्टिपूर्वक जय जयकार किया । यह प्रतिमा वैशाखी पूर्णिमा के
दिन संघपति ने नव्यकारित प्रासाद मे पश्चिमाभिमुख स्थापित
किया । स्नात्र-महोत्सव करके अजित संघपति अपने भाई के साथ
स्वदेश लौट गया । कलिकाल मे देवी ने लोगो का कलुषित चित्त
ज्ञात कर रत्नमय प्रतिमा की झलकती हुई कान्ति को आच्छादित
कर दिया ।
पहले गुजरात मे जयसिंह देव ने राजा खेंगार को मार कर
सज्जन को दण्डाधिप स्थापित किया । उसने विक्रम संवत् ११८४
मे श्री नेमिनाथ भगवान का अभिनव जिनालय बनवाया । मालव-
देशमण्डन सेठ भावड साह ने स्वर्णमय आमलसार-कलश कराया ।
चालुक्यचक्री श्री कुमारपालदेव नरेन्द्र संस्थापित श्री श्रीमाल
कुलोद्भव सौराष्ट्र दडनायक ने विक्रम संवत् १२२० मे पाज
(पद्या-सीढियाँ) करवायी । उसी भावना से धवल ने अंतराल मे
पर्व-प्रपा भराये । पाज चढते हुए लोगो को दक्षिण दिशामे लक्षा-
राम दिखाई देता है ।
अणहिल वाड पाटण मे पोरवाडकुलमण्डन आसराज-कुमार

रैवतगिरि-कल्प २१
देवी के पुत्र और गुर्जराधिपति श्री वीरधवल की राज्यधुरा को
चलाने वाले मन्त्रीश्वर वस्तुपाल तेजपाल नामक दो भ्राता हुए ।
उनमे तेजपाल मत्री ने गिरनार की तलहट्टी मे स्वनामाङ्कित
तेजलपुर नामक प्रवर गढ, मठ, प्रपा, मन्दिर और बाग-बगीचो से
सुन्दर बनवाया । वहाँ अपने पिता के नामाङ्कित 'आसराज
विहार' नामक पार्श्वनाथ जिनालय कराया । अपनी माता कुमार-
देवी के नाम से 'कुमर सरोवर' निर्माण करवाया । तेजलपुर के
पूर्व दिशा मे उग्रसेनगढ नामक दुर्ग मे युगादिनाथ-प्रमुख जिन-
मन्दिर सुशोभित है । उसके उग्रसेनगढ, खगारगढ और जूनागढ
तीन नाम प्रसिद्ध है । गढ के बाहर दक्षिण दिशा मे चँवरी-वेदी,
लड्डुओ के ओरे, पशुवाटक आदि स्थान है । उत्तर दिगा मे
विशाल स्तभ शाला गोभित दश दगार-मण्डप, गिरिद्वार मे पचम
हरि, दामोदर आदि स्थान स्वर्ण रेखा नदी के पार मे बर्त्तमान है ।
कालमेघ के समीप तेजपाल मत्री ने बहुत दिनो से नही आए
हुए सघ को बुलाकर उज्जयन्त शिखर पर एकत्र किया । वस्तु-
पाल मन्त्री ने शत्रुञ्जयावतार मन्दिर, अष्टापद-समेत शिखर मण्डप,
कपर्दियक्ष एव मरुदेवी प्रासाद कराये । तेजपाल मन्त्री ने तीन-
कल्याणक चैत्य कराया । देपाल मन्त्री ने इन्द्रमण्डप का उद्धार
कराया ।
ऐरावण गज-पद-मुद्रा अलकृत गजेन्द्रपद कुण्ड है, वहाँ अग
प्रक्षालन कर आये हुए यात्री लोग दुखो को जलाञ्जलि देते हैं ।
छत्रशिला के नीचे सहस्राम्रवनोद्यान है जहाँ यादवकुल-प्रदीप,
समुद्रविजय शिवादेवीनन्दन भगवान नेमिनाथ के दीक्षा केवल-
ज्ञान और निर्वाण कल्याणक हुए है । गिरिशिखर पर चढते ही
अम्बिका देवी का मन्दिर दिखाई देता है । वहाँ से अवलोकन
शिखर है, जहाँ पर स्थित होकर दशो दिशा से भगवान नेमिनाथ

२२ विविध तीर्थ-कल्प
स्वामी को अवलोकन किया जाता है । फिर पहले शिखर पर
गांवकुमार और दूसरे पर प्रद्युम्न (के विम्ब) हैं ।
इस पर्वत पर स्थान-स्थान पर चैत्यो मे रत्न-स्वर्णमय जिन-
विम्ब नित्य पूजा किए हुए दिखाई देते हैं । यहाँ की भूमि स्वर्ण-
मडिनी है और अनेक प्रकार के धातु रसो का भेदन करने वाली
देदीप्यमान दिखाई पडती है । रात्रि मे दीपक की भाँति प्रज्वलित
औषधियां दिखाई देती हैं । नाना प्रकार के वृक्ष-वल्ली-पत्र-पुष्प-
फलादि पद-पद पर उपलब्ध होते हैं । अनवरत खल-खलाहट
शब्द करके झरते हुए झरणो का जल और मत्त कोयल व भ्रमरो
के झकार सुनाई देते हैं ।
उज्जयन्त महातीर्थ कल्प शेप सक्षेप से यह श्री जिनप्रभसूरि
जी ने यथाश्रुत लिखा है ।
श्री रैवतगिर का कल्प समाप्त हुआ । इसके ग्रंथाग्रं० (अनुष्टुप
छंद के अक्षरो वाला) १६१ अक्षर २७ हैं ।
■
६

श्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २३
रुचि धार्मिक जनो के सन्तोषार्थ श्री पार्श्वनाथ का कल्प लेश-
मात्र कहूँगा।
भव दुख रूपी भार से परिपूर्ण अगो वाले भव्यो के भव-भ्रमण
नष्ट करने के लिए मैं इस कल्प को सक्षेप से कहता हूँ, सुनिए।
विजया, जया, कमठ, पद्मावती, पार्श्वयक्ष, वैकट्या, धरणेन्द्र
और सोलह विद्या देवियाँ जिनके अधिष्ठायक हैं। प्रतिमोत्पत्ति-
निदानकल्प मे कलित होने पर भी यहाँ उसे विस्तार भय से
संकलित नही किया क्योकि पीछे इसे कोई नही पढेगा।
जो व्यक्ति समुद्र को चुलु के समान कर ले व ताराओ के
विमानो की गिनती कर ले वह भी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा
की महिमा को कहने मे समर्थ नही हो सकता।
यह पुराणप्रतिमा अनेक स्थानो मे संस्थापित होकर उपसर्ग
शान्ति के हेतु खेचरो, देवो और उत्तम पुरुषो से पूजी गई है।
जो इन्द्रादि द्वारा कीर्त्तित और महिमा कृत पार्श्वनाथ-प्रतिमा
है उसे मैं जन-मानस मे निश्चल भाव करने के लिए कहूँगा।
भारतवर्ष रूपी सरोवर मे भव्यजन-कमल को विकसित-बोधित
करते हुए सुर-असुरो द्वारा वन्दित चरणो वाले श्री मुनिसुव्रत
भगवान दिनकर की भाँति विचरते थे तब श्री पार्श्वनाथस्वामी
की यह प्रतिमा चम्पा नामक श्रेष्ठ नगरी के रत्नाकरोपकंठ मे
ज्योतीश्वरो से वर्णित थी।
कार्त्तिक सेठ के भव मे शक्र को इन्ही के ध्यान से व्रत ग्रहणा-
नन्तर सौ की संख्या मे अभिग्रह सिद्ध हुए थे। अत प्रतिमा के
माहात्म्य से मुग्ध सौधर्मेन्द्र महान् दिव्य विभूति से वही स्थित हो
पूजा-अर्चा करने लगा।
इस प्रकार कितना काल बीतने पर जब श्री रामचन्द्र जी ने
वनवास किया तो इन्द्र के वचन से लोगो को राघव का प्रभाव

दिखाने के लिए दण्डकारण्य मे देवयुगल ने आकाशगामी घोड़ो
सहित रत्नजटित रथ और प्रतिमा रामभद्र को दी।
वहाँ रघुपुरुङ्गव श्री रामचन्द्र ने सात मास और नव दिन तक
विदेहदुहिता—सीता के उपनीत कुसुमो से भक्तिपूर्वक पूजा की।
राम के प्रबल कर्मों को अलङ्घनीय और दुख से छूटने वाले
ज्ञातकर उस पूज्य प्रतिमा को देवता उसी स्थान पर वापम ले
गये। अब फिर शकेन्द्र प्रकृष्ट भक्तिपूर्वक दिव्य भोगो से पूजा
करने लगा, इस प्रकार ग्यारह लाख वर्ष पूरे हो गए।
उस समय जब यदुवंश मे बलदेव-कृष्ण और नेमिनाथ तरुणा-
वस्था को प्राप्त हुए और केशव को राज्य मिला और जरासंध से
युद्ध मे अपनी सेना को उपसर्ग होने पर कृष्ण ने भगवान नेमिनाथ
से उस उपसर्ग के शीघ्र विनाश होने का उपाय पूछा।
प्रभु ने आदेश दिया—“पुरुषोत्तम ! मेरे सिद्ध होने के तेयासी
हजार सात सौ पचास वर्ष बाद विविध अधिष्ठायको द्वारा नत-
चरण श्री पार्श्व अर्हन्त होगे, जिनकी पूजा—स्नात्र जल सींचने
पर लोक मे अशिव की शांति होगी।” “स्वामी ! वर्त्तमान मे उन
जिनेश्वर की प्रतिमा कही भी विद्यमान है ?” इस प्रकार चक्रधर
श्रीकृष्ण के पूछने पर स्वामी ने कहा—“वह इन्द्रपूजित है”। तब
नेमि जिन और जनार्दन के मनोगत भाव को ज्ञात कर मातलि
सारथी सहित एक रथ मे वह प्रतिमा शकेन्द्र ने दी।
मुरारि ने प्रमुदित हो प्रतिमा को न्हवण कराके बहुत से
घनसार रस, चन्दन रस और उत्तम सुगन्धित पुष्पो से पूजा की।
पीछे सेना पर स्वामी के न्हवण जल को सिंचित किया जिससे
योगी के चित्त-विलय की भाँति सारे उपसर्गो का विलय हो गया।
बहुत दुखदायी प्रतिवासुदेव के निधन प्राप्त होने पर यादव सेना मे
जयजयकार हो गया। उसी विजय के स्थान पर जिनेश्वर नेमि-

श्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २५
नाथ के आदेश से सखपुर नामक अभिनव नगर निर्माण कराके
श्री पार्श्वप्रभु का बिम्ब स्थापित किया । इस प्रतिमा को लेकर
कृष्ण के अपने नगर मे आने पर राजाओ ने वासुदेवत्वाभिषेक
उत्सव किया । कृष्ण नरेश्वर ने मणि-कंचन रत्नो से रचित
प्रासाद मे सस्थापित प्रतिमा की सात सौ वर्ष तक पूजा की ।
द्वारिका के दाह और यादव जाति के प्रलय होने पर भी
स्वामी के प्रभाव से देवालय मे अग्नि नही लगी । समुद्र ने अपनी
लोल लहरो के द्वारा नगरी के साथ रुचिर मनोहर मन्दिर सहित
स्वामी (की प्रतिमा) को जल के अन्दर ले लिया ।
नागकुमारियो के साथ क्रीडा के हेतु आये हुए तक्षक नागेन्द्र
ने प्रभु की पापनाशक प्रतिमा को देखा और उसने प्रमुदित चित्त
से बहुत प्रकार की नृत्य-कला से महामहोत्सवपूर्वक अस्सी हजार
वर्ष पर्यन्त पूजा की । दिग्पालश्रेष्ठ वरुण ने समुद्र की सफाई
करते हुए तक्षक द्वारा पूजी जाती हुई त्रिभुवनपति पार्श्वनाथ
की प्रतिमा को देखा और सोचा—अरे ये तो वही स्वामी
हैं जो देवेन्द्र द्वारा पहले पूजित थे, अब मुझे भी स्वामी के चरणो
की सेवा करना योग्य है । ऐसा विचार कर वह जिनेश्वर की
अनवरत पूजा, प्रार्थना, सेवा करने लगा । उस समय प्रभु वहाँ
चार हजार वर्ष पर्यन्त वही स्थित रहे ।
जब श्री वर्द्धमानस्वामी भरत क्षेत्र मे जलद तिलक-पुष्करा-
वर्त्त मेघ की भाँति अविरल धारा से भव्य शस्यो को सिंचन कर
रहे थे तब अपनी कान्ति से देवलोक की कान्ति को कलुषित करने
वाली कान्तिनगरी मे धनेश्वर नामक सार्थवाह सुखपूर्वक निवास
करता था । एक बार वह महाडभ्य (सेठ) यान मे समुद्र-यात्रा के
लिए निकला और सायात्रिक आदि के साथ सिंहल द्वीप पहुँचा ।
और माला बेचकर वहाँ से शीघ्रतापूर्वक लौटते हुए सहसा जल-
राशि के अन्दर प्रवहण स्तम्भित हो गया । जब वह दुखी होकर

२६ विविध तीर्थ-कल्प
चिन्ता करने लगा तो गासनदेवी पद्मावती ने प्रकट होकर कहा—
वत्स । डरो मत । वात सुनो । दिग्पाल वरुण विनिर्मित महिमा
वाले, पृथ्वी मे मोह का मान मर्दन करने वाले श्री पार्श्वनाथ
भगवान यहाँ पानी के नीचे रहे हुए हैं। हे भद्र । तुम उन्हे अपने
स्थान पर ले जाओ ।
धनेश्वर ने कहा—देवी । समुद्र जल के मूल से जिनेश्वर को
निकाल कर ग्रहण करने की मेरे मे गक्ति कहाँ है ? तब गासन
देवी ने कहा—मेरे पीछे-पीछे लगकर प्रविष्ट हो जाओ और कच्चे
सूत के तार से वाँधकर प्रभु को निकालो और जहाज मे चढाकर
हे श्रावक । अपने नगर ले जाओ ।
देवी के निर्देगानुसार यह सब करके वह महासत्वगाली सेठ
त्रैलोक्यपति प्रभु को ग्रहण कर हर्ष प्रकर्ष से पुलकितगात्र हो
गया । और क्षणमात्र मे स्वस्थान आये और पट-कुटी वनवा कर
लोक सम्मुख स्वागतार्थ आवे तब तक के लिए वहाँ रहे । गन्धर्वों
के गीत-वाजित्र और सधवा स्त्रियो के धवल मङ्गलपूर्वक दान
देते हुए स्वामी को बहिर्दिगि प्रदेग-स्थल मे प्रवेग कराया ।
सेठ ने कान्तिनगरी मे रजत की भाँति निर्मल, स्वच्छ प्रासाद
कराया और उसमे प्रभु को विराजमान करके भक्तिपूर्वक प्रतिदिन
पूजन करने लगा । धनेश्वर के काल-प्राप्त होनेपर प्रवर नागरिकों
द्वारा प्रभु की पूजा होते हजार वर्ष बीत गए । तब देवाधिदेव
की परिकर रहित प्रतिमा को आकाग मार्ग से रस-स्तंभन निमित्त
कान्तिनगरी से कालत्रय कला कलित श्री पादलिप्तसूरि गणधर
के उपदेग से योगीन्द्र नागार्जुन अपने स्थान पर लाया । योगिनी-
गत कार्य सिद्ध होनेपर वह स्वामी को अटवी मे छोड गया और
रस स्तम्भित होने के कारण स्तम्भनक नामक तीर्थ हो गया ।
उद्भिन्न वगजाल के अन्दर स्थित, जो दुग्धस्नपित अंग वाले

प्रभु के आकण्ठ क्षिति निमग्न रहने से लोगो ने उनका नाम
यक्ष प्रसिद्ध कर दिया। उस अवस्था मे पाँच सौ वर्ष तक
जिनेश्वर भगवान् की पूजा होगी। फिर धरणेन्द्र के सानिध्य से
श्रुतसागर के पारगामी श्री अभयदेवसूरि जी सघ सहित हस्थित
रोग को दूर करके देदीप्यमान माहात्म्य वाला तीर्थ प्रकट करेंगे।
कान्तीपुरी से भगवान् पुन समुद्र मे जावेंगे। बहुत प्रकार
से नगर मे भारी महिमा से देदीप्यमान होगे।
यदि कोई सहस्र मुख वाला होकर लाल जिह्वा धारण कर ले
तो भी त्रिकाल मे कौन प्रतिमा स्थानो को साधन करने में
समर्थ है ?
पावापुरी, चम्पापुरी, अष्टापद, गिरनार, समेतगिखर, विमला-
चल, कागी, नागिक, मिथिला, राजगृह प्रमुख तीर्थों में यात्रा,
पूजन, दान से जीवो को जो फल होता है वह यहाँ पार्श्वनाथ प्रभु
की प्रतिमा के दर्शनमात्र से प्राप्त करता है।
पार्श्वनाथ भगवान को वन्दन करने की विचार-वृद्धि से मास-
खमण का फल और प्रतिमा को दृष्टिगोचर करने से छम्मा

विविध तीर्थ-कल्प २८
उत्तम मुकुट, कुण्डल, केयूरादि करवाता है वह त्रिभुवनमुकुट
होकर शीघ्र ही शिव-सुख प्राप्त करता है।
जिसने त्रिभुवन चूडामणि, लोगो के नयनो के लिए अञ्जन-
शलाका जैसी इस प्रतिमा को नही देखा उसका मनुष्य जन्म ही
निरर्थक है। श्री सघदास मुनि द्वारा प्रतिमा का लघु कल्प निर्मित
है। मैंने तो बडे कल्प से सम्बन्ध मात्र समुद्धृत किया है।
जो इस कल्प को पढता, सुनता व चिन्तन करता है वह
कल्पवासियो का नाथ (इन्द्र) होकर सातवे भव मे सिद्धि प्राप्त
करता है। और जो पुस्तक लिख कर इस कल्प की गृह चैत्य मे
पूजा करता है वह चिरबोधि नरक और तिर्यञ्चगति मे नियमा
से नही जाता।
दैनिक पढने से सिंह, समुद्र, अग्नि, हाथी, चोर, साँप, ग्रह,
वैरी का निवारण होकर प्रेत, वैताल, शाकिनी आदिका भय नष्ट
होता है।
कल्प वृक्ष की भाँति यह कल्प हृदय स्थान मे धारण करने
वाले भव्यो की पुण्य-शोभा विलसित और वाञ्छित प्रदान करे।
जहाँ तक नरक्षेत्र मे मेरु रूपी प्रदीप पृथ्वी तल पर समुद्र जल
रूपी तेल से उद्योतित विद्यमान है यह कल्प वहाँ तक जयवन्त
रहे।
यह पार्श्वनाथ का सक्षिप्त कल्प समाप्त हुआ।

श्री स्तम्भनक-कल्प २९
श्री स्तंभनक-कल्प
दृढ व्याधि से शरीर अशक्त हो जाने पर अनशन ग्रहण करने
के लिए ( श्री अभयदेव सूरि जी महाराज ने ) सघ को बुलाया,
रात्रि मे देवी ने सूत की नौ कोकडी सुलझाने के लिए कहा।
हाथो से अशक्ति प्रकाशित करने पर ( देवी ने ) नवाङ्ग विवरण
कथा से चमत्कृत कर स्तभन पार्श्वनाथ वन्दन करने की आरोग्य-
विधि उपदिष्ट की । सभाणा से चलकर धवलकपुर आने के वाद
पादविहारी होकर स्तम्भनपुर के सेढी नदी के तट पर स्थित
खोखरे पलाश वन मे पहुंचे। गो-दुग्ध झरने से स्थान को पहिचान
कर जयतिहुअण स्तोत्रार्द्ध से पार्श्वनाथ स्वामी को प्रत्यक्ष किया
और स्तवन पूर्ण कर प्रभावशाली वृत्त द्वय को गुप्त कर दिया।
सघ द्वारा निर्मापित जिनालय मे श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा को स्थापित किया वे गतरोग हुए नवाङ्गो वृत्तिकारक
श्री अभयदेव सूरि जी महाराज विजयवन्त हो ।
जन्म से भी चार हजार वर्ष पूर्व देवालय में पूजित हुए और
भगवान की वासव, वासुदेव और वरुण ने समुद्र मे पूजा की।
कान्तिनगरी के सेठ धनेश्वर ने पूजा की, और नागार्जुन ने भी
अर्चन किया वे स्तंभनपुर के श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर आपकी
रक्षा करे।
श्री स्तभनक कल्प समाप्त हुआ ग्र० १०० (पाठान्तर १११) हैं।

७. अहिच्छत्त्रानगरी-कल्प
तीन भुवन मे भानु के नाम से प्रकट श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर
को नमस्कार करके अहिच्छत्त्रा नगरी का कल्प किंचित् यथाश्रुत
कहूँगा ।
इसी जवूद्वीप के भारतवर्ष मे मध्य खण्ड स्थित कुरुजांगल
जनपद मे सखावती नामक ऋद्धि-समृद्धि नगरी थी । वहाँ भगवान
पार्श्वनाथ स्वामी छद्मस्थ विहार मे विचरते हुए कायोत्सर्ग स्थित
रहे । पूर्व निबद्ध वैर के कारण कमठासुर ने अविच्छिन्न धारा-
प्रवाह से वर्षता हुआ मेघ विकुर्वण किया, जिससे सारे भूमण्डल मे
जल-जलाकार होकर भगवन्त के आकण्ठ जल आ गया ।
पञ्चाग्निसाधक कमठ तापस द्वारा जलाए काठ मे दग्ध
साँप को निकाले गए प्रभु के उपकार को स्मरण कर नागराज
धरणेन्द्र ने अवधि-ज्ञान से देखा और अपनी अग्रमहिषियो के साथ
आकर मणिरत्नमय सहस्रफणालंकृत छत्र प्रभु के ऊपर करके
कुण्डलीकृत नागराज ने उन्हे ग्रहण कर उस उपसर्ग को निवारण
किया । तभी से उस नगरी

अहिच्छत्रा नगरी-कल्प ३१

वाली सिद्ध रसकूपिका भी यहाँ दृष्टिगोचर होती है। जहाँ म्लेच्छ
राजा द्वारा अग्निदाह आदि अनेक उद्घाटनोपक्रम निष्फल हो
गए।
उस नगर के भीतर और बाहर सवां लाख कुएँ और वापिकाएँ
हैं। मधुरोदक की यात्रा के लिए आये हुए लोगो और पार्श्वनाथ
चैत्य मे स्नात्र करते हुए लोगो को आज भी कमठ प्रखर तूफान
और काली मेघ घटा और गर्जन व बिजली आदि दिखाता है।
मूल चैत्य के निकट सिद्ध क्षेत्र मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का धरणेन्द्र-
पद्मावती सेवित चैत्य है। प्राकार के समीप श्री नेमिनाथ भगवान
की प्रतिमा सहित सिद्ध-वृद्ध कलित आम्रलुम्बधारिणी सिंहवाहिनी
अम्बिका देवी विद्यमान है। चन्द्र किरणो की भाँति निर्मल जल से
परिपूर्ण उत्तरा नामक वापी है जहाँ स्नान करके और वहाँ की
मिट्टी का लेपन करने से कुष्ठियो का कुष्ठ रोग शान्त हो जाता
है। धन्वन्तरि कूप की विचित्र वर्ण वाली मिट्टी से गुरु आम्नाय से
सोना बनता है। ब्रह्म कुण्ड के तट पर ऊगी हुई मण्डूक ब्राह्मी के
पत्तो का चूर्ण एक वर्ण वाली गाय के दूध के साथ पीने से प्रज्ञा-
मेधा सम्पन्न, निरोग और किन्नर की भाँति स्वर होता है। वहाँ
उपवन के समस्त वृक्षो मे औषधियाँ उपलब्ध होती हैं जो उन-उन
कार्यों को सिद्ध करती है जैसे जयन्ती, नागदमणी, सहदेवी,
अपराजिता, लक्ष्मणा, त्रिवर्णी, नकुली, सकुली, सर्पाक्षी, सुवर्ण-
शिला, मोहनी, सामली, रविभक्ता, निर्विषी, मोरशिखा, गल्या,
विशल्या प्रभृति महौषधियाँ यहाँ विद्यमान हैं। यहाँ हरिहर,
हिरण्यगर्भ, चण्डिकाभवन, ब्रह्मकुण्ड आदि लौकिक तीर्थ हैं। तथा
यह नगरी महातपस्वी सुगृहीतनामधेय कृष्णर्षि की जन्मभूमि है।
तत्पद पंकज पराग कण निपात से पवित्रीकृत एक वस्त्र वाले
पार्श्वनाथ भगवान को स्मरण करने से आधि व्याधि, सर्पविष,
सिंह, हाथी, रण, चोर, जल, अग्नि, राज्य, दुष्ट ग्रह, मारि, भूत,

३२ विविध तीर्थ-कल्प
प्रेत, शाकिनी प्रमुख क्षुद्रोपद्रव विशेष कर भव्य जीवो को पराभव
नही करते । सकल अतिशयो की निधान रूप यह नगरी है ।
यह अहिच्छत्रा नगरी का कल्प पद्मावती धरणेन्द्र और कमठ
के प्रिय श्री जिन प्रभुसूरि ने सक्षेप से वर्णन किया है ।
॥ अहिच्छत्रा-कल्प समाप्त हुआ ग्रथाग्र० ३६ ॥
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८. अर्बुदगिरि-कल्प
श्री आदिनाथ और नेमिनाथ अर्हन्तो को नमस्कार करके
अर्बुद महागिरि का कल्प लेशमात्र कहता हूँ । पहले श्रीमाता
देवी की उत्पत्ति यथाश्रुत कहूँगा, जिसके अधिष्ठान से यह पर्वत
पृथ्वी मे प्रख्यात हुआ है ।
श्री रत्नमाल नगर मे रत्नशेखर राजा हुआ, नि सन्तान होने
से दुखी हो उसने शाकुनिक लोगो को बाहर भेजा । उन्होने शिर
पर काष्ठ-भार लिए कष्टपूर्वक चलने में दुर्गत स्त्री को देख
कर राजा को बतलाया कि इसका पुत्र आपके पद पर राजा
होगा । राजा के आदेश से उन लोगो ने उस सगर्भा को मारने
के लिए गर्त मे डाल दिया । वह कार्यचिन्ता के बहाने उससे
बाहर निकली और उस भयार्त्ता ने पुत्र प्रसव कर झाडी मे रख
दिया । इस घटना से अज्ञात उन लोगो ने गर्त मे लाकर उसे
मार डाला ।