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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

५८. श्रीपुर-अन्तरिक्षपार्श्वनाथ-कल्प
प्रकट प्रभावशाली श्रीपुर के अलकार पार्श्वनाथ भगवान को
नमस्कार करके अतरिक्ष स्थित उनकी प्रतिमा का सक्षिप्त कल्प
कीर्त्तन करता हूँ।
पूर्वकाल मे अर्द्धचक्री प्रतिवासुदेव दगग्रीव रावण ने मालि,
सुमालि नामक अपने सेवको को कही किसी कार्य के लिए
भेजा। आकाश मार्ग से विमानारूढ़ जाते हुए उनके भोजन का
समय हो गया। पुष्प-वटुक ने सोचा—मैंने आज ऊतावल मे जिन-
प्रतिमा का करण्डिया घर पर ही भुला दिया, ये दोनो पुण्यात्मा
देव-पूजा किए बिना कही भी भोजन नही करेंगे। एवं देवपूजा के
समय करण्डिया न देखकर मुझ पर रुष्ट होगे। उसने विद्याबल
से पवित्र वालुका की नवीन भावितीर्थङ्कर पार्श्वनाथ की प्रतिमा
तैयार की। मालि-सुमालि ने पूजन करके भोजन किया। पुष्प-
वटुक ने प्रतिमा आकाश मार्ग से प्रस्थान करते समय निकटवर्ती
सरोवर के जल मे डाल दी। देवता के प्रभाव से वह प्रतिमा
सरोवर मे अखण्ड रही। कालक्रम से उस तालाब का पानी
थोडा रह गया और जल से भरे खड्डे की भाँति लगा।
कितने ही काल पश्चात् टिंगउल्ल देश के टिंगउल्ल नगर मे
श्रीपाल नामक राजा हुआ। वह सर्वाङ्ग मे कुष्ठ व्याधि से ग्रस्त
था। एक बार वह शिकार खेलने के लिए गया, वहाँ प्यास लगने
पर क्रमश. उस खड्डे पर पहुँचा। मुंह हाथ धोकर पानी पिया
तब उसका अग-अवयव कनक-कमलोज्वल नीरोग हो गया। घर
आने पर महादेवी ने राजा को देख कर साश्चर्य पूछा—स्वामिन् !
आज अपने कही स्नानादि किया ? राजा के यथास्थित कहने पर

श्रीपुर-अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प २३५
उसने सोचा—अहो ! वह दिव्य जल है। दूसरे दिन वह राजा को
वहाँ ले गई, सर्वाङ्ग-प्रक्षालन किया जिससे राजा का सारा शरीर
अभिनव हो गया। देवी ने बलि-पूजादि करके कहा—यहाँ जो
देवता हो वे अपने को प्रकट करे ।
घर आने पर रानी को देवता ने स्वप्न मे कहा—यहाँ भावी
तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा रखी हुई है, उसी के
प्रभाव से राजा को आरोग्यलाभ हुआ है। उस प्रतिमा को गाडे
मे चढाकर सात दिन के जन्मे बछडो को कच्चे सूत ततु की रस्सी
मात्र से जोत कर राजा स्वय सारथी बन कर अपने स्थान के
प्रति ले चलें। जहाँ भी राजा पीछे मुड कर देखेगे वही प्रतिमा
स्थिर हो जायगी।
राजा ने खड्डे के जल को आलोडित कर प्रतिमा प्राप्त की
और उसी प्रकार विधि करके प्रतिमा को लेकर चला । कितनी ही
दूर जाने पर राजा ने प्रतिमा आती है कि नही ? यह जानने के
लिए पीछे सिंहावलोकन किया। प्रतिमा वही आकाश मे ठहर गई,
गाडी आगे निकल गई। राजा ने अधृति से प्रतिमा को न देखकर
वही पर अपने नाम से श्रीपुरनगर वसाया, वही मन्दिर निर्माण
कराया और बडे भारी समारोह के साथ प्रतिमा प्रतिष्ठित की
गई। राजा उसकी त्रिकाल पूजा करने लगा। आज भी वह
प्रतिमा उसी प्रकार अंतरिक्ष मे ठहरी हुई है। पूर्णकाल मे बेहडे-
घडे सहित सिर पर रखे स्त्री प्रतिमा के सिंहासन के नीचे से निकल
जाती थी। कालक्रम से भूमि ऊँच हो जाने से या म्लेच्छादि दूषित
कालानुभाव से नीची-नीची होते वर्त्तमान मे केवल वस्त्र ही
प्रतिमा के नीचे से निकलता हैं। दीपकप्रभा भी सिंहासन और
भूमि के बीच दिखाई देती है।
जब वह प्रतिमा गाडी पर चढाई, तब अम्बा देवी और क्षेत्र-

२३६ विविध तीर्थ-कल्प

पाल भी प्रतिमा के साथ थे। उतावलवश अम्बा देवी के सिद्ध-
बुद्ध पुत्रो मे से एक तो देवी ने लिया और एक पीछे छूट गया ।
देवी ने क्षेत्रपाल को आज्ञा दी कि लडके को तुम ले आना ।
अतिशीघ्रता से चलते हुए वह भी नही लाया तो देवी ने ठोले से
उसके मस्तक पर प्रहार किया जो आज भी उसी प्रकार क्षेत्रपाल
के मस्तक पर दिखाई देता है।
इस प्रकार अम्बा देवी और क्षेत्रपाल द्वारा ससेवित धरणेन्द्र,
पद्मावती द्वारा कृतप्रातिहार्य वह प्रतिमा भव्य लोको द्वारा पूजी
जाती है। यात्रीगण यात्रामहोत्सव करते हैं। वहाँ प्रभु के न्हवण-
जल से सींची हुई आरती नही बुझती । न्हवण-जल से अभिषिक्त
शरीर के दाद, खाज, कुष्ठ रोगादि उपशान्त होते हैं।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ का कल्प यथाश्रुत किंचित् श्री जिन-
प्रभसूरि ने परोपकार के हेतु लिखा है।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक-
सख्या ४१ और ८ अक्षर हैं।

•

५९. स्तम्भन-पार्श्वनाथ-कल्प शिलोञ्छ
स्तम्भन पार्श्वनाथ कल्प मे जो बातें विस्तारभय से सगृहीत
नही की उन्हे श्री जिनप्रभसूरि इस कल्प मे अंशमात्र कहते हैं।
ढक पर्वत पर रणसिंह राजपुत्र की भोपल नामक पुत्री को
रूपलावण्यसम्पन्न देख कर अनुराग उत्पन्न होने पर वासुकि ने
सेवन किया और उसके नागार्जुन नामक पुत्र हुआ । उसे पिता ने

पुत्र-स्नेहमोहित मन से सभी महौषधियो के फल, मूल और पत्ते
खिलाये जिसके प्रभाव से वह महासिद्धियो से अलंकृत सिद्ध पुरुष
के रूप मे प्रसिद्ध हुआ । वह पृथ्वीमण्डल मे घूमता हुआ राजा
सालाहण का कलागुरु हुआ । वह पादलिप्तपुर मे गगनगामिनी
विद्या-अध्ययनार्थ पादलिप्ताचार्य की सेवा करने लगा । एक बार
पादलेप के वल से उड कर अष्टापदादि तीर्थों की वन्दना कर
भोजनावसर मे स्वस्थान लौटने पर पादलिप्तसूरि के चरण-प्रक्षा-
लन के जल को चख कर वर्ण, रस, गधादि द्वारा उनके नामादि
निश्चय कर गुरु के उपदेश विना ही पादलेप करके कुर्कुट की
भाँति उडता हुआ कुएँ के तट पर जा गिरा । नागार्जुन के जर्जरित
अग को देख कर गुरु महाराज ने पूछा तो उसने यथास्थित वात
कही । सूरिजी ने उसके कौशल से चमत्कृत होकर मस्तक पर
हाथ रख कर कहा—उन औषधियो को साठी चावल के पानी के
साथ बाँट कर पादलेप करने से आकाश मार्ग मे गमन होता है ।
वह सिद्धि प्राप्त कर परितुष्ट हुआ ।
फिर कभी उसने गुरु महाराज के मुख से सुना कि—श्री
पार्श्वनाथ भगवान के सामने समस्त सुस्त्रीलक्षणयुक्त महासती
द्वारा मर्दन किया हुआ रस कोटिवेधी होता है । यह सुनकर वह
पार्श्वनाथ प्रतिमा का अन्वेषण करने मे लग गया । द्वारिका मे
समुद्रविजय दशार्ह ने श्री नेमिनाथ प्रभु के मुख से महान् अतिशय
वाली ज्ञात कर रत्नमयी श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को प्रासाद मे
स्थापित कर पूजी । द्वारिका के दाह के अनन्तर वह प्रतिमा समुद्र
मे गई और वही रही । कालान्तर मे कान्तिनगरनिवासी धनपति
नामक सेठ का जहाज देवतातिशय से स्खलित हो गया । उसने
देववाणी से निश्चय किया कि यहाँ जिन-प्रतिमा विद्यमान है ।
उसने नौका प्रक्षिप्त कर सात कच्चे सूत के तन्तु से प्रतिमा को
वाहर निकाला । उसने अपने नगर मे ले जाकर वहाँ प्रासाद मे

२३८ विविध तीर्थ-कल्प

स्थापित किया। वह चिन्ता दूर कर लाभकारी रूप मे प्रतिष्ठित
होने से प्रतिदिन पूजी जाती थी। नागार्जुन ने उस प्रतिमा को
सर्वातिगयी ज्ञात कर रससिद्धि के लिए अपहरण कर सेढी नदी के
तट पर स्थापित किया। और उसके आगे रससिद्धि करने लिए
उसने शालिवाहन राजा की रानी महासती चन्द्रलेखादेवी को
सिद्ध व्यन्तरदेव के सान्निध्य से वहाँ लाकर प्रतिरात्रि रस-मर्द्दन
कराने लगा। इस प्रकार वहाँ वारम्बार जाने-आने से नागार्जुन
उसका भाई बन गया। जब उसने उसे औषधियाँ मर्द्दन कराने
का कारण पूछा तो उसने कोटिरस वेध का यथास्थित वृत्तान्त
कहा।
एक दिन चन्द्रलेखा ने अपने दोनो पुत्रो को बताया कि इससे
रससिद्धि होगी। रस के लोभ से वे अपना राज्य छोड कर नागार्जुन
के पास आए। रस ग्रहण करने की इच्छा से वे प्रच्छन्न वेश मे
रहते थे। जब नागार्जुन भोजन करने लगा तो उसे रससिद्धि का
वृत्तान्त पुछा। वह उनको ज्ञात कराने के हेतु नमक सहित रसोई
बनाती है। छ महीने बीतने पर उसने क्षार-दोषपूर्ण रसोई
बतलाई। रानी ने इगिताकार से रससिद्धि पुत्रो को सूचित कर
दिया और परम्परा से जाना कि नागार्जुन की मृत्यु वासुकि ने
दर्भाङ्कुर से बतलाई है, अत उन्होने उसी शस्त्र से उसे मार
डाला। जहाँ रस स्तम्भित हुआ वहाँ स्तम्भन नामक नगर हुआ।
कालान्तर से वह प्रतिमा केवल मुख के सिवाय सारी जमीन के
अन्दर चली गई।
अब चन्द्रकुल के श्रीवर्द्धमानसूरि शिष्य जिनेश्वरसूरि शिष्य
श्री अभयदेवसूरि गुजरात मे सम्भायण स्थान मे विचरे। उनके
महाव्याधिवश अतिसारादि रोग उत्पन्न होने पर प्रत्यासन्न नगर-
गाँवो से पाक्षिक प्रतिक्रमणार्थ आने वाले लोगो को विशेष रूप से
मिथ्या दुष्कृत देने के लिए सभी श्रावक सघो को बुलाया। तेरस

स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प शिलोञ्छ २३९
की अर्द्धरात्रि मे प्रभु को शासनदेवता ने कहा—भगवन् ! जगते
हैं या सो रहे हैं ? मन्द स्वर मे प्रभु ने कहा—मुझे नीद कहाँ ?
देवी ने कहा—ये नौ सूत की कुक्कडी सुलझाइये । प्रभु ने कहा—
नही सकूँगा । देवी ने कहा—क्यो नही सकेगे ? अभी तो आप
भगवान महावीर के शासन की चिरकाल प्रभावना करेगे, नौ
अगो की वृत्तियां भी करेगे । आचार्य भगवान ने कहा—इस प्रकार
के शरीर से मैं कैसे करूँगा ? देवी ने कहा—स्तम्भनपुर मे सेढी
नदी के तीर पर खाखरापलाश के बीच श्री स्वयंभू पार्श्वनाथ हैं ।
उनके आगे आप देववन्दन करिये जिससे शरीर स्वस्थ हो जायगा ।
दूर से आये हुए श्रावकसघ ने प्रभु को वन्दन किया । प्रभु
ने कहा—स्तम्भन मे पार्श्वनाथ प्रभु को हम वन्दन करेगे । सघ
ने सोचा कि निश्चय ही प्रभु को कोई उपदेश है तभी ऐसा कहते
हैं । सघ ने कहा—हम लोग भी वन्दन करेंगे । वाहन मे जाते हुए
प्रभु का शरीर कुछ स्वस्थ हो गया तो धवलका से पादविहार
करते हुए स्तम्भनपुर पहुँचे । श्रावक लोग सर्वत्र पार्श्वनाथ
भगवान को खोजने लगे तो गुरु महाराज ने कहा—खाखरापलाश मे
देखो । उन्होंने श्री पार्श्वनाथ-प्रतिमा का मुख देखा । वहाँ प्रतिदिन
एक गाय आकर प्रभु-प्रतिमा के मस्तक पर दूध झार देती थी ।
श्रावको ने जैसे देखा गुरु महाराज से निवेदन किया । श्री अभय-
देवसूरि ने वहाँ जाकर मुख दर्शन मात्र से “जयतिहुअण वर
कप्परुक्ख” आदि तत्काल निर्मित काव्य द्वारा स्तुति प्रारम्भ की ।
इसका सोलहवाँ वृत्त बोलते समय भगवान सर्वाङ्ग से प्रत्यक्ष हो
गए । तब “जय पच्चक्ख जिणेसर” सतरहवें वृत्त मे कहा ।
बत्तीस छन्द मे स्तवन पूर्ण हुआ । अन्तिम दो वृत्त देवी को अत्यन्त
आकृष्ट कर होने से देवता ने प्रार्थना की—भगवन् ! तीस गाथाओ
से ही सान्निध्य करूँगी, अन्तिम दोनो को निकाल दें । क्योकि हमे
कलियुग मे आगमन दुष्कर होगा । प्रभु ने वैसा ही किया । सघ-

२४० विविध तीर्थ-कल्प
सहित चैत्यवन्दन किया। सघ ने उत्तुंग देवगृह बनवाया। प्रभु
का रोग उपशान्त हो गया था, उन्होने पार्श्वनाथ स्वामी को
स्थापित किया। महातीर्थ स्तम्भन प्रसिद्ध हुआ। काल-क्रम से
स्थानाङ्गादि नव अंगो पर वृत्ति की। आचाराङ्ग और सूत्रकृताङ्ग
पर तो पहले ही शीलाकाचार्य द्वारा की हुई थी। प्रभु श्री
अभयदेवसूरि जी ने उसके बाद चिरकाल तक वीरगासन की
प्रभावना की।
श्री स्तम्भनक पार्श्वनाथ का सक्षिप्त-कल्प समाप्त हुआ। इसकी
ग्रन्थ-संख्या ६७ है।
६०. श्री फलवर्द्धिपार्श्वनाथ-कल्प
श्री फलवर्द्धिक चैत्य मे विराजमान पार्श्वनाथ स्वामी को
प्रमाण कर के उन्ही का कलिकाल के दर्प को चूर्ण करने वाला
कल्प यथाश्रुत कहता हूँ।
सवालक्ष देग मे मेडता नगर के समीप स्थित वीर-भवनादि
नानाविध देवालयों से सुन्दर फलवर्द्धि नामक ग्राम है। वहाँ
फलवर्द्धि नामक देवी का भवन उत्तुङ्ग गिखर वाला है। वह नगर
ऋद्धिसमृद्ध होते हुए भी कालक्रम से ऊजड हो गया। तो भी
वहाँ कितने ही वणिक लोग आ कर बस गये। उनमे एक श्री
श्रीमाल वग मे मुक्ता के सदृश, धार्मिक लोगो मे अग्रणी धघल
नामक श्रावक था। दूसरा वैसे ही गुणो वाला ओसवालकुल-
नभस्थल मे चन्द्रसदृश शिवकर नामक था। उन दोनो के प्रचुर

श्री फलवर्द्धि पार्श्वनाथ-कल्प [२४१]

गाये थी । उनमे धवल की एक प्रतिदिन दूध देनेवाली गाय भी
दूध नही देती थी तो धवल ने ग्वाले को पूछा—क्या इस गाय को
तुम या अन्य कोई वाहर मे दूह लेता है ? जिससे यह दूध नहीं
देती । ग्वाले ने शपथादि करके अपने को निरपराधी किया ।
ग्वाले द्वारा कुछ दिन सम्यक् निरीक्षण करते एक दिन ऊँचे
रडे पर बोरडो वृक्ष के पास चारो थणो से दूध झरती गाय को
देखा । और प्रतिदिन पूछने वाले धवल को दिखाया । उसने
सोचा—अवश्य ही भूमि के अन्दर यहाँ कोई यक्षादि देवताविशेष
होगा । घर आने पर उसे रात्रि मे सुखपूर्वक सोये हुए एक स्वप्न
आया—एक पुरुष ने कहा इस रडे मे भगवान पार्श्वनाथ गर्भगृह-
देवकुलिका मे है, जिन्हें वाहर निकाल कर पूजा करो !
धवल ने प्रभात के समय शिवकर को स्वप्न का वृत्तान्त
कहा । तब दोनो कौतूहलपूर्ण चित्त से बलि पूजा विधान पूर्वक
ओड लोगो से रडय भूमि को खुदवा कर गर्भगृह देवकुलिका सहित
पार्श्वनाथ प्रभु की सप्तफणामण्डित प्रतिमा निकली । दोनो श्रावक
प्रतिदिन महान् ऋद्धि से पूजा करने लगे । इस प्रकार त्रिभुवननाथ
की पूजा होते फिर एक दिन अधिष्ठायक ने स्वप्न मे उन्हे आदेश
दिया कि इसी प्रदेश मे चैत्य कराओ । तब उन दोनो ने प्रसन्न
चित्त से अपने वैभव के अनुसार चैत्य कराना प्रारम्भ किया ।
सुथार लोग कमठाणे मे प्रवृत्त हुए । जब अग्रमण्डप निष्पन्न हुआ,
धन की कमी से द्रव्य-व्यय मे असमर्थ होकर कमठाणा बन्द कर
दिया और दोनो परम श्रावको का धैर्य टूट गया । इसके पश्चात्
रात्रि मे फिर अधिष्ठायक देव ने स्वप्न मे कहा—‘‘उषाकाल मे
अन्धेरे-अन्धेरे देव के आगे द्रम्म मुद्राओ का स्वस्तिक किया
देखोगे । उन द्रम्मो को मन्दिर के कार्य मे व्यय करना । उन्होने
उसी प्रकार देख कर द्रम्म ग्रहण कर अवशिष्ट कमठाणा कराना
प्रारम्भ किया । इस प्रकार तीनो भुवनो के चित्त को चमत्कृति
१६

२४२ विविध तीर्थ-कल्प
उत्पन्न करने वाले पाँचो मण्डप व लघु मण्डप परिपूर्ण हुए। चैत्य
के बहुत कुछ निष्पन्न होने पर उनके पुत्र ने सोचा—ये द्रव्य कहाँ
से आता है। जिससे अविच्छिन्न रूप से कमठाणा चलता है। एक
दिन अति प्रभात मे स्तम्भ के पीछे छिप कर देखना प्रारम्भ किया।
उस दिन देव ने द्रम्मो का स्वस्तिक नही पूरा।
इसके बाद देवता का आराधन करने पर भी निकट भविष्य मे
म्लेच्छ-राज्य होना ज्ञात कर अधिष्ठाता ने द्रव्य पूरा नही, चैत्य-
निर्माण कार्य अधूरा ही रहा।
विक्रमादित्य राजा के ११८१ वर्ष बीतने पर राजगच्छ-
मण्डन श्री शीलभद्रसूरिपट्टप्रतिष्ठित, महावादी दिगम्बर गुणचन्द्र
पर विजय प्राप्त कर प्रतिष्ठा पाने वाले श्री धर्मघोषसूरि ने पार्श्व-
नाथ चैत्य शिखर की चतुर्विध सघ समक्ष प्रतिष्ठा की।
कालान्तर मे कलिकाल के माहात्म्य से व्यन्तर लोग केलि-
प्रिय होते है इस लिए अधिष्ठायक देव अस्थिर चित्त व प्रमाद
परवश होने से सुलतान साहाबुद्दीन ने मूल विम्व भग्न किया,
फिर सावधान होकर अधिष्ठायक देव ने म्लेच्छ राजा और म्लेच्छो
को अन्धत्व एव रुधिर वमनादि चमत्कार दिखाया। तब सुलतान
ने फरमान दिया कि इस देव-मन्दिर का कोई भग न करे।
अधिष्ठायक देवो को अन्य प्रतिमा असह्य होने से संघ ने विम्व
दूसरा स्थापित नही किया। विकलाङ्ग प्रतिमा होने पर भी
भगवान का बडा भारी माहात्म्य है। प्रतिवर्ष पौष कृष्ण १० को
जन्मकल्याणक के दिन चारो दिशाओ से श्रावकसघ आकर
न्हवण-गीत-नाटक-वाजित्र-कुसुम-आभरणारोहण-इन्द्रध्वजादि मनो-
हर यात्रामहिमाएँ करते हुए सघ पूजादि कार्यों द्वारा शासन-
प्रभावना करके दूषम काल के प्रभाव को निर्दलित कर सुकृत
भण्डार भरते हैं। यहाँ मन्दिर मे धरणेन्द्र-पद्मावती, क्षेत्रपाल

अधिष्ठायक संघ के विघ्नो को उपशमन करते है। और प्रणत लोगो
का मनोरथ भी पूर्ण करते हैं। यहाँ हाथ मे स्थिर प्रदीप लिए हुए
घूमते पुरुष को मन्दिर मे शान्त चित्त वाले भव्य जन देखते हैं।
इस महातीर्थभूत पार्श्वनाथ के दर्शन से कलिकुण्ड-कुक्कुटेश्वर-
श्रीपर्वत-शंखेश्वर-सैरीसा-मथुरा-वाराणसी-अहिछत्ता-स्तभन-अजा-
हर-प्रवरनगर-देवपत्तन-करहेडा-नागदा-श्रीपुर-सामिणि-चारूप-
ढिपुरी-उज्जैन-शुद्धदन्ती-हरिकंखी-लिंबोडक आदि स्थानो मे विद्य-
मान पार्श्वनाथ प्रतिमाओ का यात्रा करने का फल होता है ऐसा
सम्प्रदाय-पुरुषो का उपदेश है।
फलवृद्धिपुर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर के इस छोटे से कल्प
को सुनने वाले भव्यो का कल्याण हो।
आप्त जनो के मुख से कुछ संप्रदायादि उपादानो से श्री जिन-
प्रभसूरि ने यह फलवृद्धिपार्श्वनाथ-प्रतिमा का कल्प बनाया है।
यह श्री फलवृद्धिपार्श्वनाथ-कल्प सम्पूर्ण हुआ। ग्रंथसंख्या
५५ अक्षर २ ऊपर है।


६१. अम्बिकादेवी-कल्प

श्री उज्जयन्त गिरि शिखर के मण्डन श्री नेमिनाथ भगवान
को नमस्कार करके कोहडिदेवी-कल्प वृद्धोपदेशानुसार लिखता हूँ।
सौराष्ट्र देश मे धन धान्य सम्पन्न, जनसमृद्ध कोडीनार
नामक नगर है। वहाँ सोम नामक ऋद्धि-समृद्ध षट्कर्मपरायण,

२४४ विविध तीर्थ-कल्प
वेदागमपारगामी ब्राह्मण था । उसकी अंबिणी नामकी स्त्री अपने
शरीर मे शीलरूपी मूल्यवान अलंकार को धारण करने वाली थी ।
उनके विषय-सुखानुभव करते दो पुत्र उत्पन्न हुए, पहला सिद्ध
और दूसरा बुद्ध था ।
एक वार पितर पक्ष आने पर सोम भट्ट ने श्राद्ध के दिन
ब्राह्मणो को निमन्त्रित किया । कही वे वेद पाठ करते है, कही
पिण्डदान प्रारभ करते है, कही अग्नि होम करते हैं । अविणी ने
जीमनवार के लिए खीर-खाँड, दाल, भात, व्यञ्जन, पक्वान्नादि
तैयार किए । उसकी सासू स्नान करने मे प्रवृत्त थी । उस समय
मासक्षमण के पारने के लिए एक साधु उसके घर मे भिक्षार्थ
आया । उसे देखकर हर्षपूर्ण पुलकित अग वाली अम्बिणी उठी
और भक्ति-बहुमानपूर्वक उस मुनिराज को भात-पाणी देकर प्रति-
लाभा । साधु भिक्षा लेकर चला गया और सासू भी नहा-धोकर
रसोई मे आई । खाद्य पदार्थ पर शिखा न देखकर क्रोधपूर्वक
उसने बहू से पूछा । उसके यथास्थित कहने पर सासू ने उसे
फटकारा—पापिनी ! यह तुमने क्या किया ? अभी तो कुल-देवता
की पूजा नही की और न अभी तक ब्राह्मणो को भोजन कराया,
न पिण्डदान ही हुआ है अत तुमने अग्रशिखा साधु को किस
लिए दी ?
सासू ने सोमभट्ट से सारा व्यतिकर कहा । उसने रुष्ट होकर
स्वच्छंदी कहते हुए उसे घर से निकाल दिया । पराभव से दुखी
होकर अम्बिणी बुद्ध को गोद लेकर सिद्ध की अगुली पकड़े नगर
से बाहर चल पडी । मार्ग मे प्यासे पुत्रो ने जल माँगा, अम्बिणी
अश्रुपूर्ण नेत्रो वाली हुई तो सामने रहा हुआ सूखा सरोवर उसके
अमृत्य शील के प्रभाव से तत्काल जलपूर्ण हो गया । दोनो पुत्रो
को शीतल जल पिलाया । फिर भूखे बालको ने भोजन माँगा तो

सामने रहा हुआ आम्र वृक्ष तत्काल फला। अविणी ने उन्हे आम्र-
फल दिए, वे खाकर स्वस्थ हुए।
जब वे आम्र वृक्ष की छाया मे विश्राम करने लगे तब जो
हुआ वह सुने। उसने पहले बालको को जिमाया था उन पत्तलो के
वाहिर जूठन पडी थी उसे अविणी के शील प्रभाव से शासनदेवी ने
स्वर्णथाल और कटोरे के रूप में परिणत कर दिया और वाहिर
भूमि पर गिरे जूठन के कणो को मोती आदि बना दिया। रसोई
मे उसी प्रकार अग्निशिखा युक्त वर्त्तन भरे देखे। सासू ने यह
अत्यद्भुत चमत्कार देखकर सोमभट्ट से कहा—बेटा ! यह बहू
सुलक्षणी और पतिव्रता है, उसे वापस बुलाकर घर मे लाओ।
जननी की प्रेरणा से सोमभट्ट पश्चात्तापाग्नि मे जलता हुआ
बहू को लाने के लिए गया। अविणी ने पीछे आते हुए अपने पति
ब्राह्मण को देखकर दिगावलोकन किया तो उसे सामने मार्ग मे
कूप दिखाई दिया। उसने जिनेश्वर भगवान को मन मे धारण कर
सुपात्रदान की अनुमोदना करते हुए अपने आपको कुँए मे गिरा
दिया। शुभ अध्यवसायो से मर कर वह सौधर्म कल्प स्थित
चार योजन वाले कोहण्ड विमान मे "अम्बिका देवी" नामक
महर्द्धिक देवी हुई। विमान के नाम से उसे "कोहंडी" भी कहते
हैं। सोमभट्ट ने उस महासती को कुएँ मे गिरते देखा तो वह
स्वयं भी कूद पडा। वह भी मर के वही पर देव हुआ। आभियो-
गिक कर्म से सिंह रूप धारण कर उसी अम्बिका देवी का वाहन
हो गया। अन्य लोग कहते है—अम्बिणी ने रैवत गिर शिखर से
झम्पापात किया और उसके पीछे सोमभट्ट भी उसी प्रकार मरा--
शेष बात एक सी है।
उस भगवती के चार भुजाएँ हैं, दाहिने हाथ मे आम्रलुम्ब
एव पाश धारण किया हुआ है। बाँये हाथ मे पुत्र और अंकुश

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७४६ विविध तीर्थ-कल्प

धारण किया हुआ है । उनका शरीर तपे हुए सोने जैसा है । वह
श्री नेमिनाथ भगवान की शासनदेवी है और गिरनार शिखर पर
उसका निवास है । उसके मुकुट, कुण्डल, मुक्ताहार, रत्नकंकण,
तुपूरादि सर्वागाभरण रमणीक हैं । वह सम्यग्दृष्टियो के मनोरथ
पूर्ण करती है, विघ्नसमूह दूर करती है । उस देवी का मन्त्र
मण्डलादि रचनापूर्वक आराधन करने वाले भव्यो के अनेक
प्रकार की ऋद्धि-समृद्धि देखी जाती है एवं उनका भूत, पिशाच,
डाकिनी और दुष्टग्रह पराभव नही करते । पुत्र, कलत्र, धन-धान्य,
राज्य श्रीसम्पन्न होता है । अम्बिका मंत्र यह है—
वयवोयम कुल कुलजलहरिहय अवक्कततत्त पेआड ।
पणइणिवायावसिओ अविअदेवीइ अहमंतो ॥ १ ॥
धुवभुवण देवि संबुद्धिपास अकुस तिलोअ पंचसरा ।
णहसिहि कुलकल अत्भासिअमाया परप्पणामपय ॥ २ ॥
वागुब्भव तिलोअ पास सिणीहाओतडअवन्तस्स ।
कूड च अविआए नमुत्ति आराहणा मत्तो ॥ ३ ॥
इस प्रकार अम्बिका देवी के बहुत से मंत्र स्वपर की रक्षा
करने वाले स्मरणयोग्य मार्ग-क्षेमादि गोचर हैं । उन मन्त्रो को व
मण्डल को यहाँ विस्तार भय से नही कह रहे, जिज्ञासुओ को
गुरुमुख से जानना चाहिए ।
यह अम्बिका देवी का कल्प अविकल्पचित्तवृत्ति वाले, वाचने
सुनने वाले समीहित अर्थ से पूर्ण होते हैं ।
अम्बिका देवी का यह कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रंथ-संख्या
४७ व अक्षर अधिक है ।

६२. पंचपरमेष्ठी नमस्कार-कल्प
तीन जगत को पावन करने वाले पुण्यतम मत्र श्री पंच-
परमेष्ठी नमस्कार का योगी चिन्तन करे। वह इस प्रकार है—
ज्ञानीजन आठ दल वाले सफेद कमल की कर्णिका मे स्थित
प्रथम सात अक्षर का पवित्र मंत्र चिन्तन करे—णमो अरिहंताण।
चारो दिशाओ के पत्रो मे यथाक्रम से सिद्धादि चार पदो का
और विदिशा के दलो पर चार चूला पद का चिन्तन करे।
मुनि इसका त्रिशुद्धिपूर्वक एक सौ आठ बार चिन्तन करते
हुए भी चतुर्थ तप-उपवास का फल प्राप्त कर लेते हैं।
इस लोक मे योगीजन इस महामंत्र का समाराधन करके परम-
पद को प्राप्त त्रैलोक्यनिवासी जनो द्वारा पूजे जाते हैं।
हजारो पाप करके सैकडो जन्तुओ को मारने वाले तिर्यञ्च भी
इस मंत्र का आराधन करके स्वर्ग मे गए है।
गुरुपचक नाम से बनी हुई षोडशाक्षरा विद्या होती है।
उसको दो सौ बार जपता हुआ प्राणी चतुर्थ तप का फल प्राप्त
करता है।
पंचपरमेष्ठि नमस्कार-कल्प समाप्त हुआ।

६३. ग्रन्थ-समाप्ति का कथन
इस ग्रन्थ का आदि से अन्त तक (समस्त कल्पो) का ग्रन्था-
ग्रन्थ ( श्लोकपरिमाण ) अनुष्टुप् मान के अनुसार ३५६० हुआ
है ॥ १ ॥
मनुष्य को किस कार्य मे सज्जत (उद्यत) होना चाहिए ?
'जि' (अर्थात् जयविषय कार्य)
निषेधार्थक शब्द कौन सा है ?
'न' (अर्थात् नही)
प्रथम उपसर्ग कौन सा है ?
'प्र' (यह उपसर्ग सर्वप्रथम परिगणित है)
निशा ( रात्रि ) कैसी है ?
'भ' (अर्थात् तारो से युक्त)
प्राणियो को प्रिय कौन होता है ?
'सूरि' (अर्थात् विद्वान्)
इस ग्रन्थ का प्रणेता कौन है ?
'जिनप्रभसूरि' ॥ २ ॥
यह ग्रन्थ दिल्ली मे वि० स० १३८९ भाद्रपद कृष्णा १०,
बुधवार के दिन भूमण्डल के इन्द्र श्री हम्मीर महम्मद (मुहम्मद
तुगलक) के प्रतापी शासन-काल मे पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
तीर्थो एव तीर्थभक्तो के वर्णन से पवित्रीभूत यह 'कल्पप्रदीप'
नामक ग्रन्थ चिरकालपर्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त होता रहे ।

परिशिष्ट १
जीरापल्ली तीर्थ
( उपदेशसप्तति से )
आगे सवत् ११०९ अनेक जैन और शैव प्रासादो से रमणीक
ब्राह्मण नामक महास्थान मे धाधल सेठ नाम का महाश्रावक रहता
था । वहाँ एक क्षमाशील बुढिया रहती थी जिसकी गाय प्रतिदिन
सेहिली नदी के पार्श्व स्थित देवीत्री पर्वत की गुफा मे दूध झार
आती थी जिससे सन्ध्या समय घर आने पर वह कुछ भी दूध नही
देती । कितने ही दिन पश्चात् क्रमश वह स्थान उस बुढिया के
जानने मे आया । उसने धाधल आदि मुख्य व्यक्तियो को यह
वृत्तान्त वतलाया ।
साहूकार लोगो ने निश्चय किया वह चमत्कारिक स्थान है
और वे रात्रि मे पवित्र हो कर पंचपरमेष्ठी के स्मरणपूर्वक किसी
उपाश्रयादि पावन स्थान मे सो गये । रात्रि के समय नील वर्ण के
अश्व पर किसी दिव्य पुरुष ने उन्हे स्वप्न मे कहा कि जहाँ गाय
दूध झरती है वहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थित है, मै
उसका अधिष्ठायक देव हूँ । अत उस जिनप्रतिमा की पूजा हो
वैसा तुम लोग उपाय करो ! देव अन्तर्धान हो गया । प्रात काल
वे साहूकार वहाँ गए और भूमि का उत्खनन कर प्रतिमा को रथ
मे विराजमान करने लगे, इतने ही मे जीरापल्ली के नागरिक वहाँ
आ कर कहने लगे हमारी हद मे स्थित जिनविम्व को तुम लोग
क्यो ले जाते हो ? विवाद बढने पर किसी वृद्ध ने निर्णय किया
एक बैल हमारा और एक बैल आप लोगो का—दोनो को रथ मे
जोड दो, वे जहाँ जाएँ प्रभु इच्छा ! विवाद कर्म-वन्ध का हेतु है

२५० विविध तीर्थ-कल्प

अतः उन्होंने इस निर्णय को मान्य किया। भगवान जीरापल्ली
नगरी मे पधारे, महाजन लोगो ने प्रवेशोत्सव किया। वहाँ के
जिनालय की महावीर प्रतिमा को स्थानान्तर कर के संघ ने सर्व-
सम्मति पार्श्वनाथ भगवान को मूलनायक रूप मे विराजमान
किया। वहाँ अनेक अभिग्रह धारण कर आने लगा। अधिष्ठायक
देव उनकी मनोकामना पूर्ण करता जिससे जीरावला पार्श्वनाथ
तीर्थ रूप मे प्रसिद्ध हो गया। धाधल सेठ देव-द्रव्यादि की सार-
सम्भाल करता था।
एक बार जावालि नगर से यवनो की सेना आई जिसे अधि-
ष्ठायक देव ने अश्वारूढ हो कर भगा दिया। फिर सेना मे से सात
सेख—गुरु लोग रुधिर का पात्र भर कर लाए और देव-स्तुति के
बहाने मन्दिर मे रहे और रात्रि मे रुधिर छिड़क कर प्रतिमा को
भग्न कर दिया। शास्त्रवाक्य है कि रक्तस्पर्श से देवो की प्रभा
लुप्त हो जाती है। शेख लोग आशातना कर के भाग गये, प्रात -
काल इस दुर्घटना को ज्ञात कर धाधल सेठ आदि सभी लोग बडे
दुखी हुए। राजा ने अपने सुभट भेज कर सातो सेखो को नष्ट
कर दिया।
उपवास कर के बैठने पर अधिष्ठाता देव ने कहा—ऐसी अप-
वित्त्रता के समय मैं भी असमर्थ हूँ। तुम चिन्ता मत करो, अब नौ
सेर चन्दन के अन्तर्लेप से ये नवो खण्ड मिला कर रख दो और
सात दिन कपाट बन्द रखो। गोष्ठिक ने उसी प्रकार किया पर
सातवे दिन एक सघ आया जिसने उत्सुकतावश द्वारोद्घाटन
कर दर्शन किये। कुछ अवयव अश्लिष्ट रह गए, आज भी भगवान
के नव अग स्पष्ट दिखाई पडते हैं। अपने नगर मे पहुँचने पर उन
आततायी लोगो के घरो मे ज्वलन, द्रव्यनाश आदि होने लगा तो
दैवी उपद्रव ज्ञात कर वहाँ के राजा ने अपना मंत्री भेजा। देव ने
उसे स्वप्न मे कहा कि जब राजा स्वयं यहाँ आ कर अपना शिर

परिशिष्ट २५१

मुण्डन करायगा तभी कुशल होगा । राजा के स्वय आ कर भोग-
योग कराने पर शान्ति हुई । ऐसा देख कर जनता भी अनुकरण
मे शिर मुण्डनादि कराने लगी । और यह गतानुगतिक प्रथा चल
पडी ।
इस प्रकार जीरावाला तीर्थ का प्रकर्ष और माहात्म्य बढने
लगा । देव ने अधिकारी को स्वप्न मे कहा कि खण्डित मूर्ति मुख्य
स्थान मे शोभा नही देने से इसी नाम से दूसरी प्रतिमा स्थापित
करो । फिर नव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई जिसकी इहलोक-परलोक-
कल्याणअभिलाषी जन आज भी पूजा करते है । प्राचीन प्रतिमा को
दक्षिण भाग मे स्थापित किया जिसकी पूजा, नमस्कार ध्वजा
आदि पहले किया जाता है । अब वह जीर्ण प्रतिमा दादा पार्श्वनाथ
नाम से पहिचानी जाती है और उसी के समक्ष शिर मुण्डनादि
किये जाते हैं। धाधल सेठ के सन्तान मे आसीहड गोष्टिक चौदहवाँ
हुआ ऐसा इतिहास है ।
इस जीरापल्ली तीर्थ प्रबन्ध को मैने यथाश्रुत कहा है । बहु
श्रुता को आस्थापूर्वक मध्यस्थ भाव से अतर पट पर उतारने
का प्रयत्न करना चाहिए ।

फलवर्द्धि तीर्थ

विक्रम सवत् ११७४ मे चौरासी वाद-विजेता श्री वादिदेव
सूरि हुए । एक बार आचार्य महाराज भव्यजनो को पावन करते
हुए मेडता चातुर्मास रहे । श्रावक लोगो ने धर्म कृत्यो से अपना
जीवन सफल किया । चातुर्मास पूर्णकर आचार्य महाराज मासकल्प
करने के लिए फलवर्द्धिपुर पधारे । वहाँ पारस श्रावक बडा
श्रद्धालु था, वह प्रतिदिन पवित्रता से जिनेश्वर देव की त्रिकाल
पूजा किया करता था पर वह निर्धन था । एक बार उसने जगल

२५२ विविध तीर्थ-कल्प
मे अम्लान पुष्पो से मण्डित एक ढेर देखा और आश्चर्यपूर्वक
गुरु महाराज से निवेदन किया। आचार्य महाराज ने देख कर
कहा—इस स्थान मे जिन-प्रतिमा होनी चाहिए। उस भूमि का
उत्खनन किया गया पुण्योदय से विकसित कमल जैसी पार्श्वनाथ
भगवान की प्रतिमा प्रगट हुई। सेठ ने उसे उत्सवपूर्वक ले जाकर
घास के झोंपडे मे विराजमान किया और पूजा करने लगा। रात्रि
के समय अधिष्ठायकदेव ने स्वप्न मे कहा—भगवान का प्रासाद
बनवाओ। सेठ ने कहा—द्रव्य के बिना कैसे जिनालय बने ?
अधिष्ठता ने कहा—भगवान के समक्ष लोगो द्वारा चढाए हुए सभी
चावल प्रात काल प्रतिदिन सोने के हो जाएँगे। इस प्रकार जिना-
लय के लिए द्रव्य की प्राप्ति हो जायगी पर यह बात किसी को
मत बतलाना। यदि कह दोगे तो स्वर्ण की प्राप्ति बद हो जायगी।
पारस ने वैसा ही किया।
शुभ मुहूर्त्त मे शिल्पियो द्वारा चैत्य निर्माण प्रारभ हुआ।
कितने ही अरसे मे गर्भगृह के उत्तुग तीन मण्डप युक्त अनेक स्तम्भो
सुशोभित विशाल प्रवेश द्वार, मत्त गजेन्द्र युक्त, मेघ मण्डलवत्
विभ्राजमान तोरण, उभय पक्ष मे शालाओ से मनोहर स्वर्ग-
विमान तुल्य चैत्यालय निष्पन्न हुआ। सेठकी भावना थी कि ऐसे
और भी तीनो दिशाओ मे चैत्य निर्माण हो। परन्तु एक पुत्र के
कदाग्रह से द्रव्य-प्राप्ति का रहस्य प्रगट हो गया जिससे धन-प्राप्ति
बद हो गई।
पारस सेठ ने बडे समारोहपूर्वक स० १२०४ मे श्री देवसूरि के
पट्टधर मुनि चन्द्रसूरि से बिम्ब व चैत्य की प्रतिष्ठा सम्पन्न
करवाई।
वह गगनस्पर्शी चैत्य अनुक्रम से फलवृद्धि तीर्थ नाम से
प्रख्यात हुआ। आज भी श्रद्धालु सघ अपने पाप-पक का प्रक्षालन
करता है।

परिशिष्ट २५३
आरासण तीर्थ
पासिल नामक श्रद्धालु श्रावक द्वारा आरासण गाँव मे निर्मा-
पित और श्री देवसूरि जी के प्रतिष्ठित चैत्य अनुक्रम से तीर्थ रूप
मे प्रसिद्ध हुआ।
एक वार श्री मुनि चन्द्र गुरु के शिष्य आचार्य देवसूरि भृगुपुर
चातुर्मास स्थित थे। उस समय कान्हड नामक एक योगी क्रूर
साँपो के ८४ अरडिए ले कर वहाँ आया और कहने लगा—हे
सूरीन्द्र। मेरे साथ विवाद कीजिए नही तो इस सिंहासन का
त्याग कर दे। आचार्यश्री ने कहा—अरे मूर्ख, तुम्हारे साथ वाद
कैसा ? क्या श्वान के साथ सिंह कभी युद्ध होता है ? योगी ने
कहा—मै सर्प-क्रीडा जानता हूँ जिससे राजमहल आदि स्थानो मे
जा कर दूसरो से अधिक आभरणादि पुरस्कार प्राप्त करता हूँ।
आचार्य महाराज ने कहा— हे योगी ! हमे किसी प्रकार के वाद
करने की इच्छा नही है, क्योकि मुनि तत्त्वज्ञ होते हैं और जैन
मुनि तो विगेप कर तत्त्व-प्राज्ञ होते हैं। फिर भी तुम्हे यह कौतुक
हो तो राजा के समक्ष विवाद करे, क्योकि विजयेच्छुको को चतु-
रग वाद करना चाहिए।
योगी और आचार्य महाराज श्रीसंघ के साथ राजसभा मे
आये। राजा ने उन्हे सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया। आचार्य
महाराज उदयाचल पर आरूढ सूर्य विम्ब की भाँति सुगोभित थे।
योगी ने कहा—राजेन्द्र ! और तो सुखावह वाद होते हैं, यह
प्राणान्तिक वाद है अत. मेरी गक्ति को देखिए। आचार्य महाराज
ने उसे शेखी बघारते देख कर कहा—अरे वराक, तुम्हे पता नही
हम लोग सर्वज्ञ-पुत्र हैं। फिर आचार्य महाराज ने अपने चारो
ओर सात रेखाएँ बनाई। योगी द्वारा बहुत से साँप छोडे गये पर