विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पाल भी प्रतिमा के साथ थे। उतावलवश अम्बा देवी के सिद्ध-
बुद्ध पुत्रो मे से एक तो देवी ने लिया और एक पीछे छूट गया ।
देवी ने क्षेत्रपाल को आज्ञा दी कि लडके को तुम ले आना ।
अतिशीघ्रता से चलते हुए वह भी नही लाया तो देवी ने ठोले से
उसके मस्तक पर प्रहार किया जो आज भी उसी प्रकार क्षेत्रपाल
के मस्तक पर दिखाई देता है।
इस प्रकार अम्बा देवी और क्षेत्रपाल द्वारा ससेवित धरणेन्द्र,
पद्मावती द्वारा कृतप्रातिहार्य वह प्रतिमा भव्य लोको द्वारा पूजी
जाती है। यात्रीगण यात्रामहोत्सव करते हैं। वहाँ प्रभु के न्हवण-
जल से सींची हुई आरती नही बुझती । न्हवण-जल से अभिषिक्त
शरीर के दाद, खाज, कुष्ठ रोगादि उपशान्त होते हैं।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ का कल्प यथाश्रुत किंचित् श्री जिन-
प्रभसूरि ने परोपकार के हेतु लिखा है।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक-
सख्या ४१ और ८ अक्षर हैं।
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५९. स्तम्भन-पार्श्वनाथ-कल्प शिलोञ्छ
स्तम्भन पार्श्वनाथ कल्प मे जो बातें विस्तारभय से सगृहीत
नही की उन्हे श्री जिनप्रभसूरि इस कल्प मे अंशमात्र कहते हैं।
ढक पर्वत पर रणसिंह राजपुत्र की भोपल नामक पुत्री को
रूपलावण्यसम्पन्न देख कर अनुराग उत्पन्न होने पर वासुकि ने
सेवन किया और उसके नागार्जुन नामक पुत्र हुआ । उसे पिता ने