विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 317, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें५८. श्रीपुर-अन्तरिक्षपार्श्वनाथ-कल्प
प्रकट प्रभावशाली श्रीपुर के अलकार पार्श्वनाथ भगवान को
नमस्कार करके अतरिक्ष स्थित उनकी प्रतिमा का सक्षिप्त कल्प
कीर्त्तन करता हूँ।
पूर्वकाल मे अर्द्धचक्री प्रतिवासुदेव दगग्रीव रावण ने मालि,
सुमालि नामक अपने सेवको को कही किसी कार्य के लिए
भेजा। आकाश मार्ग से विमानारूढ़ जाते हुए उनके भोजन का
समय हो गया। पुष्प-वटुक ने सोचा—मैंने आज ऊतावल मे जिन-
प्रतिमा का करण्डिया घर पर ही भुला दिया, ये दोनो पुण्यात्मा
देव-पूजा किए बिना कही भी भोजन नही करेंगे। एवं देवपूजा के
समय करण्डिया न देखकर मुझ पर रुष्ट होगे। उसने विद्याबल
से पवित्र वालुका की नवीन भावितीर्थङ्कर पार्श्वनाथ की प्रतिमा
तैयार की। मालि-सुमालि ने पूजन करके भोजन किया। पुष्प-
वटुक ने प्रतिमा आकाश मार्ग से प्रस्थान करते समय निकटवर्ती
सरोवर के जल मे डाल दी। देवता के प्रभाव से वह प्रतिमा
सरोवर मे अखण्ड रही। कालक्रम से उस तालाब का पानी
थोडा रह गया और जल से भरे खड्डे की भाँति लगा।
कितने ही काल पश्चात् टिंगउल्ल देश के टिंगउल्ल नगर मे
श्रीपाल नामक राजा हुआ। वह सर्वाङ्ग मे कुष्ठ व्याधि से ग्रस्त
था। एक बार वह शिकार खेलने के लिए गया, वहाँ प्यास लगने
पर क्रमश. उस खड्डे पर पहुँचा। मुंह हाथ धोकर पानी पिया
तब उसका अग-अवयव कनक-कमलोज्वल नीरोग हो गया। घर
आने पर महादेवी ने राजा को देख कर साश्चर्य पूछा—स्वामिन् !
आज अपने कही स्नानादि किया ? राजा के यथास्थित कहने पर