विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प शिलोञ्छ २३९
की अर्द्धरात्रि मे प्रभु को शासनदेवता ने कहा—भगवन् ! जगते
हैं या सो रहे हैं ? मन्द स्वर मे प्रभु ने कहा—मुझे नीद कहाँ ?
देवी ने कहा—ये नौ सूत की कुक्कडी सुलझाइये । प्रभु ने कहा—
नही सकूँगा । देवी ने कहा—क्यो नही सकेगे ? अभी तो आप
भगवान महावीर के शासन की चिरकाल प्रभावना करेगे, नौ
अगो की वृत्तियां भी करेगे । आचार्य भगवान ने कहा—इस प्रकार
के शरीर से मैं कैसे करूँगा ? देवी ने कहा—स्तम्भनपुर मे सेढी
नदी के तीर पर खाखरापलाश के बीच श्री स्वयंभू पार्श्वनाथ हैं ।
उनके आगे आप देववन्दन करिये जिससे शरीर स्वस्थ हो जायगा ।
दूर से आये हुए श्रावकसघ ने प्रभु को वन्दन किया । प्रभु
ने कहा—स्तम्भन मे पार्श्वनाथ प्रभु को हम वन्दन करेगे । सघ
ने सोचा कि निश्चय ही प्रभु को कोई उपदेश है तभी ऐसा कहते
हैं । सघ ने कहा—हम लोग भी वन्दन करेंगे । वाहन मे जाते हुए
प्रभु का शरीर कुछ स्वस्थ हो गया तो धवलका से पादविहार
करते हुए स्तम्भनपुर पहुँचे । श्रावक लोग सर्वत्र पार्श्वनाथ
भगवान को खोजने लगे तो गुरु महाराज ने कहा—खाखरापलाश मे
देखो । उन्होंने श्री पार्श्वनाथ-प्रतिमा का मुख देखा । वहाँ प्रतिदिन
एक गाय आकर प्रभु-प्रतिमा के मस्तक पर दूध झार देती थी ।
श्रावको ने जैसे देखा गुरु महाराज से निवेदन किया । श्री अभय-
देवसूरि ने वहाँ जाकर मुख दर्शन मात्र से “जयतिहुअण वर
कप्परुक्ख” आदि तत्काल निर्मित काव्य द्वारा स्तुति प्रारम्भ की ।
इसका सोलहवाँ वृत्त बोलते समय भगवान सर्वाङ्ग से प्रत्यक्ष हो
गए । तब “जय पच्चक्ख जिणेसर” सतरहवें वृत्त मे कहा ।
बत्तीस छन्द मे स्तवन पूर्ण हुआ । अन्तिम दो वृत्त देवी को अत्यन्त
आकृष्ट कर होने से देवता ने प्रार्थना की—भगवन् ! तीस गाथाओ
से ही सान्निध्य करूँगी, अन्तिम दोनो को निकाल दें । क्योकि हमे
कलियुग मे आगमन दुष्कर होगा । प्रभु ने वैसा ही किया । सघ-