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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 442 में से

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पृष्ठ 324

श्री फलवर्द्धि पार्श्वनाथ-कल्प [२४१]

गाये थी । उनमे धवल की एक प्रतिदिन दूध देनेवाली गाय भी
दूध नही देती थी तो धवल ने ग्वाले को पूछा—क्या इस गाय को
तुम या अन्य कोई वाहर मे दूह लेता है ? जिससे यह दूध नहीं
देती । ग्वाले ने शपथादि करके अपने को निरपराधी किया ।
ग्वाले द्वारा कुछ दिन सम्यक् निरीक्षण करते एक दिन ऊँचे
रडे पर बोरडो वृक्ष के पास चारो थणो से दूध झरती गाय को
देखा । और प्रतिदिन पूछने वाले धवल को दिखाया । उसने
सोचा—अवश्य ही भूमि के अन्दर यहाँ कोई यक्षादि देवताविशेष
होगा । घर आने पर उसे रात्रि मे सुखपूर्वक सोये हुए एक स्वप्न
आया—एक पुरुष ने कहा इस रडे मे भगवान पार्श्वनाथ गर्भगृह-
देवकुलिका मे है, जिन्हें वाहर निकाल कर पूजा करो !
धवल ने प्रभात के समय शिवकर को स्वप्न का वृत्तान्त
कहा । तब दोनो कौतूहलपूर्ण चित्त से बलि पूजा विधान पूर्वक
ओड लोगो से रडय भूमि को खुदवा कर गर्भगृह देवकुलिका सहित
पार्श्वनाथ प्रभु की सप्तफणामण्डित प्रतिमा निकली । दोनो श्रावक
प्रतिदिन महान् ऋद्धि से पूजा करने लगे । इस प्रकार त्रिभुवननाथ
की पूजा होते फिर एक दिन अधिष्ठायक ने स्वप्न मे उन्हे आदेश
दिया कि इसी प्रदेश मे चैत्य कराओ । तब उन दोनो ने प्रसन्न
चित्त से अपने वैभव के अनुसार चैत्य कराना प्रारम्भ किया ।
सुथार लोग कमठाणे मे प्रवृत्त हुए । जब अग्रमण्डप निष्पन्न हुआ,
धन की कमी से द्रव्य-व्यय मे असमर्थ होकर कमठाणा बन्द कर
दिया और दोनो परम श्रावको का धैर्य टूट गया । इसके पश्चात्
रात्रि मे फिर अधिष्ठायक देव ने स्वप्न मे कहा—‘‘उषाकाल मे
अन्धेरे-अन्धेरे देव के आगे द्रम्म मुद्राओ का स्वस्तिक किया
देखोगे । उन द्रम्मो को मन्दिर के कार्य मे व्यय करना । उन्होने
उसी प्रकार देख कर द्रम्म ग्रहण कर अवशिष्ट कमठाणा कराना
प्रारम्भ किया । इस प्रकार तीनो भुवनो के चित्त को चमत्कृति
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