सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

सामने रहा हुआ आम्र वृक्ष तत्काल फला। अविणी ने उन्हे आम्र-
फल दिए, वे खाकर स्वस्थ हुए।
जब वे आम्र वृक्ष की छाया मे विश्राम करने लगे तब जो
हुआ वह सुने। उसने पहले बालको को जिमाया था उन पत्तलो के
वाहिर जूठन पडी थी उसे अविणी के शील प्रभाव से शासनदेवी ने
स्वर्णथाल और कटोरे के रूप में परिणत कर दिया और वाहिर
भूमि पर गिरे जूठन के कणो को मोती आदि बना दिया। रसोई
मे उसी प्रकार अग्निशिखा युक्त वर्त्तन भरे देखे। सासू ने यह
अत्यद्भुत चमत्कार देखकर सोमभट्ट से कहा—बेटा ! यह बहू
सुलक्षणी और पतिव्रता है, उसे वापस बुलाकर घर मे लाओ।
जननी की प्रेरणा से सोमभट्ट पश्चात्तापाग्नि मे जलता हुआ
बहू को लाने के लिए गया। अविणी ने पीछे आते हुए अपने पति
ब्राह्मण को देखकर दिगावलोकन किया तो उसे सामने मार्ग मे
कूप दिखाई दिया। उसने जिनेश्वर भगवान को मन मे धारण कर
सुपात्रदान की अनुमोदना करते हुए अपने आपको कुँए मे गिरा
दिया। शुभ अध्यवसायो से मर कर वह सौधर्म कल्प स्थित
चार योजन वाले कोहण्ड विमान मे "अम्बिका देवी" नामक
महर्द्धिक देवी हुई। विमान के नाम से उसे "कोहंडी" भी कहते
हैं। सोमभट्ट ने उस महासती को कुएँ मे गिरते देखा तो वह
स्वयं भी कूद पडा। वह भी मर के वही पर देव हुआ। आभियो-
गिक कर्म से सिंह रूप धारण कर उसी अम्बिका देवी का वाहन
हो गया। अन्य लोग कहते है—अम्बिणी ने रैवत गिर शिखर से
झम्पापात किया और उसके पीछे सोमभट्ट भी उसी प्रकार मरा--
शेष बात एक सी है।
उस भगवती के चार भुजाएँ हैं, दाहिने हाथ मे आम्रलुम्ब
एव पाश धारण किया हुआ है। बाँये हाथ मे पुत्र और अंकुश