विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुत्र-स्नेहमोहित मन से सभी महौषधियो के फल, मूल और पत्ते
खिलाये जिसके प्रभाव से वह महासिद्धियो से अलंकृत सिद्ध पुरुष
के रूप मे प्रसिद्ध हुआ । वह पृथ्वीमण्डल मे घूमता हुआ राजा
सालाहण का कलागुरु हुआ । वह पादलिप्तपुर मे गगनगामिनी
विद्या-अध्ययनार्थ पादलिप्ताचार्य की सेवा करने लगा । एक बार
पादलेप के वल से उड कर अष्टापदादि तीर्थों की वन्दना कर
भोजनावसर मे स्वस्थान लौटने पर पादलिप्तसूरि के चरण-प्रक्षा-
लन के जल को चख कर वर्ण, रस, गधादि द्वारा उनके नामादि
निश्चय कर गुरु के उपदेश विना ही पादलेप करके कुर्कुट की
भाँति उडता हुआ कुएँ के तट पर जा गिरा । नागार्जुन के जर्जरित
अग को देख कर गुरु महाराज ने पूछा तो उसने यथास्थित वात
कही । सूरिजी ने उसके कौशल से चमत्कृत होकर मस्तक पर
हाथ रख कर कहा—उन औषधियो को साठी चावल के पानी के
साथ बाँट कर पादलेप करने से आकाश मार्ग मे गमन होता है ।
वह सिद्धि प्राप्त कर परितुष्ट हुआ ।
फिर कभी उसने गुरु महाराज के मुख से सुना कि—श्री
पार्श्वनाथ भगवान के सामने समस्त सुस्त्रीलक्षणयुक्त महासती
द्वारा मर्दन किया हुआ रस कोटिवेधी होता है । यह सुनकर वह
पार्श्वनाथ प्रतिमा का अन्वेषण करने मे लग गया । द्वारिका मे
समुद्रविजय दशार्ह ने श्री नेमिनाथ प्रभु के मुख से महान् अतिशय
वाली ज्ञात कर रत्नमयी श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को प्रासाद मे
स्थापित कर पूजी । द्वारिका के दाह के अनन्तर वह प्रतिमा समुद्र
मे गई और वही रही । कालान्तर मे कान्तिनगरनिवासी धनपति
नामक सेठ का जहाज देवतातिशय से स्खलित हो गया । उसने
देववाणी से निश्चय किया कि यहाँ जिन-प्रतिमा विद्यमान है ।
उसने नौका प्रक्षिप्त कर सात कच्चे सूत के तन्तु से प्रतिमा को
वाहर निकाला । उसने अपने नगर मे ले जाकर वहाँ प्रासाद मे