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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 442 में से

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पृष्ठ 336

परिशिष्ट २५३
आरासण तीर्थ
पासिल नामक श्रद्धालु श्रावक द्वारा आरासण गाँव मे निर्मा-
पित और श्री देवसूरि जी के प्रतिष्ठित चैत्य अनुक्रम से तीर्थ रूप
मे प्रसिद्ध हुआ।
एक वार श्री मुनि चन्द्र गुरु के शिष्य आचार्य देवसूरि भृगुपुर
चातुर्मास स्थित थे। उस समय कान्हड नामक एक योगी क्रूर
साँपो के ८४ अरडिए ले कर वहाँ आया और कहने लगा—हे
सूरीन्द्र। मेरे साथ विवाद कीजिए नही तो इस सिंहासन का
त्याग कर दे। आचार्यश्री ने कहा—अरे मूर्ख, तुम्हारे साथ वाद
कैसा ? क्या श्वान के साथ सिंह कभी युद्ध होता है ? योगी ने
कहा—मै सर्प-क्रीडा जानता हूँ जिससे राजमहल आदि स्थानो मे
जा कर दूसरो से अधिक आभरणादि पुरस्कार प्राप्त करता हूँ।
आचार्य महाराज ने कहा— हे योगी ! हमे किसी प्रकार के वाद
करने की इच्छा नही है, क्योकि मुनि तत्त्वज्ञ होते हैं और जैन
मुनि तो विगेप कर तत्त्व-प्राज्ञ होते हैं। फिर भी तुम्हे यह कौतुक
हो तो राजा के समक्ष विवाद करे, क्योकि विजयेच्छुको को चतु-
रग वाद करना चाहिए।
योगी और आचार्य महाराज श्रीसंघ के साथ राजसभा मे
आये। राजा ने उन्हे सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया। आचार्य
महाराज उदयाचल पर आरूढ सूर्य विम्ब की भाँति सुगोभित थे।
योगी ने कहा—राजेन्द्र ! और तो सुखावह वाद होते हैं, यह
प्राणान्तिक वाद है अत. मेरी गक्ति को देखिए। आचार्य महाराज
ने उसे शेखी बघारते देख कर कहा—अरे वराक, तुम्हे पता नही
हम लोग सर्वज्ञ-पुत्र हैं। फिर आचार्य महाराज ने अपने चारो
ओर सात रेखाएँ बनाई। योगी द्वारा बहुत से साँप छोडे गये पर