विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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सहित चैत्यवन्दन किया। सघ ने उत्तुंग देवगृह बनवाया। प्रभु
का रोग उपशान्त हो गया था, उन्होने पार्श्वनाथ स्वामी को
स्थापित किया। महातीर्थ स्तम्भन प्रसिद्ध हुआ। काल-क्रम से
स्थानाङ्गादि नव अंगो पर वृत्ति की। आचाराङ्ग और सूत्रकृताङ्ग
पर तो पहले ही शीलाकाचार्य द्वारा की हुई थी। प्रभु श्री
अभयदेवसूरि जी ने उसके बाद चिरकाल तक वीरगासन की
प्रभावना की।
श्री स्तम्भनक पार्श्वनाथ का सक्षिप्त-कल्प समाप्त हुआ। इसकी
ग्रन्थ-संख्या ६७ है।
६०. श्री फलवर्द्धिपार्श्वनाथ-कल्प
श्री फलवर्द्धिक चैत्य मे विराजमान पार्श्वनाथ स्वामी को
प्रमाण कर के उन्ही का कलिकाल के दर्प को चूर्ण करने वाला
कल्प यथाश्रुत कहता हूँ।
सवालक्ष देग मे मेडता नगर के समीप स्थित वीर-भवनादि
नानाविध देवालयों से सुन्दर फलवर्द्धि नामक ग्राम है। वहाँ
फलवर्द्धि नामक देवी का भवन उत्तुङ्ग गिखर वाला है। वह नगर
ऋद्धिसमृद्ध होते हुए भी कालक्रम से ऊजड हो गया। तो भी
वहाँ कितने ही वणिक लोग आ कर बस गये। उनमे एक श्री
श्रीमाल वग मे मुक्ता के सदृश, धार्मिक लोगो मे अग्रणी धघल
नामक श्रावक था। दूसरा वैसे ही गुणो वाला ओसवालकुल-
नभस्थल मे चन्द्रसदृश शिवकर नामक था। उन दोनो के प्रचुर