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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

परिशिष्ट १
जीरापल्ली तीर्थ
( उपदेशसप्तति से )
आगे सवत् ११०९ अनेक जैन और शैव प्रासादो से रमणीक
ब्राह्मण नामक महास्थान मे धाधल सेठ नाम का महाश्रावक रहता
था । वहाँ एक क्षमाशील बुढिया रहती थी जिसकी गाय प्रतिदिन
सेहिली नदी के पार्श्व स्थित देवीत्री पर्वत की गुफा मे दूध झार
आती थी जिससे सन्ध्या समय घर आने पर वह कुछ भी दूध नही
देती । कितने ही दिन पश्चात् क्रमश वह स्थान उस बुढिया के
जानने मे आया । उसने धाधल आदि मुख्य व्यक्तियो को यह
वृत्तान्त वतलाया ।
साहूकार लोगो ने निश्चय किया वह चमत्कारिक स्थान है
और वे रात्रि मे पवित्र हो कर पंचपरमेष्ठी के स्मरणपूर्वक किसी
उपाश्रयादि पावन स्थान मे सो गये । रात्रि के समय नील वर्ण के
अश्व पर किसी दिव्य पुरुष ने उन्हे स्वप्न मे कहा कि जहाँ गाय
दूध झरती है वहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थित है, मै
उसका अधिष्ठायक देव हूँ । अत उस जिनप्रतिमा की पूजा हो
वैसा तुम लोग उपाय करो ! देव अन्तर्धान हो गया । प्रात काल
वे साहूकार वहाँ गए और भूमि का उत्खनन कर प्रतिमा को रथ
मे विराजमान करने लगे, इतने ही मे जीरापल्ली के नागरिक वहाँ
आ कर कहने लगे हमारी हद मे स्थित जिनविम्व को तुम लोग
क्यो ले जाते हो ? विवाद बढने पर किसी वृद्ध ने निर्णय किया
एक बैल हमारा और एक बैल आप लोगो का—दोनो को रथ मे
जोड दो, वे जहाँ जाएँ प्रभु इच्छा ! विवाद कर्म-वन्ध का हेतु है