विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मे अम्लान पुष्पो से मण्डित एक ढेर देखा और आश्चर्यपूर्वक
गुरु महाराज से निवेदन किया। आचार्य महाराज ने देख कर
कहा—इस स्थान मे जिन-प्रतिमा होनी चाहिए। उस भूमि का
उत्खनन किया गया पुण्योदय से विकसित कमल जैसी पार्श्वनाथ
भगवान की प्रतिमा प्रगट हुई। सेठ ने उसे उत्सवपूर्वक ले जाकर
घास के झोंपडे मे विराजमान किया और पूजा करने लगा। रात्रि
के समय अधिष्ठायकदेव ने स्वप्न मे कहा—भगवान का प्रासाद
बनवाओ। सेठ ने कहा—द्रव्य के बिना कैसे जिनालय बने ?
अधिष्ठता ने कहा—भगवान के समक्ष लोगो द्वारा चढाए हुए सभी
चावल प्रात काल प्रतिदिन सोने के हो जाएँगे। इस प्रकार जिना-
लय के लिए द्रव्य की प्राप्ति हो जायगी पर यह बात किसी को
मत बतलाना। यदि कह दोगे तो स्वर्ण की प्राप्ति बद हो जायगी।
पारस ने वैसा ही किया।
शुभ मुहूर्त्त मे शिल्पियो द्वारा चैत्य निर्माण प्रारभ हुआ।
कितने ही अरसे मे गर्भगृह के उत्तुग तीन मण्डप युक्त अनेक स्तम्भो
सुशोभित विशाल प्रवेश द्वार, मत्त गजेन्द्र युक्त, मेघ मण्डलवत्
विभ्राजमान तोरण, उभय पक्ष मे शालाओ से मनोहर स्वर्ग-
विमान तुल्य चैत्यालय निष्पन्न हुआ। सेठकी भावना थी कि ऐसे
और भी तीनो दिशाओ मे चैत्य निर्माण हो। परन्तु एक पुत्र के
कदाग्रह से द्रव्य-प्राप्ति का रहस्य प्रगट हो गया जिससे धन-प्राप्ति
बद हो गई।
पारस सेठ ने बडे समारोहपूर्वक स० १२०४ मे श्री देवसूरि के
पट्टधर मुनि चन्द्रसूरि से बिम्ब व चैत्य की प्रतिष्ठा सम्पन्न
करवाई।
वह गगनस्पर्शी चैत्य अनुक्रम से फलवृद्धि तीर्थ नाम से
प्रख्यात हुआ। आज भी श्रद्धालु सघ अपने पाप-पक का प्रक्षालन
करता है।