विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३. ग्रन्थ-समाप्ति का कथन
इस ग्रन्थ का आदि से अन्त तक (समस्त कल्पो) का ग्रन्था-
ग्रन्थ ( श्लोकपरिमाण ) अनुष्टुप् मान के अनुसार ३५६० हुआ
है ॥ १ ॥
मनुष्य को किस कार्य मे सज्जत (उद्यत) होना चाहिए ?
'जि' (अर्थात् जयविषय कार्य)
निषेधार्थक शब्द कौन सा है ?
'न' (अर्थात् नही)
प्रथम उपसर्ग कौन सा है ?
'प्र' (यह उपसर्ग सर्वप्रथम परिगणित है)
निशा ( रात्रि ) कैसी है ?
'भ' (अर्थात् तारो से युक्त)
प्राणियो को प्रिय कौन होता है ?
'सूरि' (अर्थात् विद्वान्)
इस ग्रन्थ का प्रणेता कौन है ?
'जिनप्रभसूरि' ॥ २ ॥
यह ग्रन्थ दिल्ली मे वि० स० १३८९ भाद्रपद कृष्णा १०,
बुधवार के दिन भूमण्डल के इन्द्र श्री हम्मीर महम्मद (मुहम्मद
तुगलक) के प्रतापी शासन-काल मे पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
तीर्थो एव तीर्थभक्तो के वर्णन से पवित्रीभूत यह 'कल्पप्रदीप'
नामक ग्रन्थ चिरकालपर्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त होता रहे ।