विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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उत्पन्न करने वाले पाँचो मण्डप व लघु मण्डप परिपूर्ण हुए। चैत्य
के बहुत कुछ निष्पन्न होने पर उनके पुत्र ने सोचा—ये द्रव्य कहाँ
से आता है। जिससे अविच्छिन्न रूप से कमठाणा चलता है। एक
दिन अति प्रभात मे स्तम्भ के पीछे छिप कर देखना प्रारम्भ किया।
उस दिन देव ने द्रम्मो का स्वस्तिक नही पूरा।
इसके बाद देवता का आराधन करने पर भी निकट भविष्य मे
म्लेच्छ-राज्य होना ज्ञात कर अधिष्ठाता ने द्रव्य पूरा नही, चैत्य-
निर्माण कार्य अधूरा ही रहा।
विक्रमादित्य राजा के ११८१ वर्ष बीतने पर राजगच्छ-
मण्डन श्री शीलभद्रसूरिपट्टप्रतिष्ठित, महावादी दिगम्बर गुणचन्द्र
पर विजय प्राप्त कर प्रतिष्ठा पाने वाले श्री धर्मघोषसूरि ने पार्श्व-
नाथ चैत्य शिखर की चतुर्विध सघ समक्ष प्रतिष्ठा की।
कालान्तर मे कलिकाल के माहात्म्य से व्यन्तर लोग केलि-
प्रिय होते है इस लिए अधिष्ठायक देव अस्थिर चित्त व प्रमाद
परवश होने से सुलतान साहाबुद्दीन ने मूल विम्व भग्न किया,
फिर सावधान होकर अधिष्ठायक देव ने म्लेच्छ राजा और म्लेच्छो
को अन्धत्व एव रुधिर वमनादि चमत्कार दिखाया। तब सुलतान
ने फरमान दिया कि इस देव-मन्दिर का कोई भग न करे।
अधिष्ठायक देवो को अन्य प्रतिमा असह्य होने से संघ ने विम्व
दूसरा स्थापित नही किया। विकलाङ्ग प्रतिमा होने पर भी
भगवान का बडा भारी माहात्म्य है। प्रतिवर्ष पौष कृष्ण १० को
जन्मकल्याणक के दिन चारो दिशाओ से श्रावकसघ आकर
न्हवण-गीत-नाटक-वाजित्र-कुसुम-आभरणारोहण-इन्द्रध्वजादि मनो-
हर यात्रामहिमाएँ करते हुए सघ पूजादि कार्यों द्वारा शासन-
प्रभावना करके दूषम काल के प्रभाव को निर्दलित कर सुकृत
भण्डार भरते हैं। यहाँ मन्दिर मे धरणेन्द्र-पद्मावती, क्षेत्रपाल