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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

परिशिष्ट २५१

मुण्डन करायगा तभी कुशल होगा । राजा के स्वय आ कर भोग-
योग कराने पर शान्ति हुई । ऐसा देख कर जनता भी अनुकरण
मे शिर मुण्डनादि कराने लगी । और यह गतानुगतिक प्रथा चल
पडी ।
इस प्रकार जीरावाला तीर्थ का प्रकर्ष और माहात्म्य बढने
लगा । देव ने अधिकारी को स्वप्न मे कहा कि खण्डित मूर्ति मुख्य
स्थान मे शोभा नही देने से इसी नाम से दूसरी प्रतिमा स्थापित
करो । फिर नव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई जिसकी इहलोक-परलोक-
कल्याणअभिलाषी जन आज भी पूजा करते है । प्राचीन प्रतिमा को
दक्षिण भाग मे स्थापित किया जिसकी पूजा, नमस्कार ध्वजा
आदि पहले किया जाता है । अब वह जीर्ण प्रतिमा दादा पार्श्वनाथ
नाम से पहिचानी जाती है और उसी के समक्ष शिर मुण्डनादि
किये जाते हैं। धाधल सेठ के सन्तान मे आसीहड गोष्टिक चौदहवाँ
हुआ ऐसा इतिहास है ।
इस जीरापल्ली तीर्थ प्रबन्ध को मैने यथाश्रुत कहा है । बहु
श्रुता को आस्थापूर्वक मध्यस्थ भाव से अतर पट पर उतारने
का प्रयत्न करना चाहिए ।

फलवर्द्धि तीर्थ

विक्रम सवत् ११७४ मे चौरासी वाद-विजेता श्री वादिदेव
सूरि हुए । एक बार आचार्य महाराज भव्यजनो को पावन करते
हुए मेडता चातुर्मास रहे । श्रावक लोगो ने धर्म कृत्यो से अपना
जीवन सफल किया । चातुर्मास पूर्णकर आचार्य महाराज मासकल्प
करने के लिए फलवर्द्धिपुर पधारे । वहाँ पारस श्रावक बडा
श्रद्धालु था, वह प्रतिदिन पवित्रता से जिनेश्वर देव की त्रिकाल
पूजा किया करता था पर वह निर्धन था । एक बार उसने जगल