विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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स्थापित किया। वह चिन्ता दूर कर लाभकारी रूप मे प्रतिष्ठित
होने से प्रतिदिन पूजी जाती थी। नागार्जुन ने उस प्रतिमा को
सर्वातिगयी ज्ञात कर रससिद्धि के लिए अपहरण कर सेढी नदी के
तट पर स्थापित किया। और उसके आगे रससिद्धि करने लिए
उसने शालिवाहन राजा की रानी महासती चन्द्रलेखादेवी को
सिद्ध व्यन्तरदेव के सान्निध्य से वहाँ लाकर प्रतिरात्रि रस-मर्द्दन
कराने लगा। इस प्रकार वहाँ वारम्बार जाने-आने से नागार्जुन
उसका भाई बन गया। जब उसने उसे औषधियाँ मर्द्दन कराने
का कारण पूछा तो उसने कोटिरस वेध का यथास्थित वृत्तान्त
कहा।
एक दिन चन्द्रलेखा ने अपने दोनो पुत्रो को बताया कि इससे
रससिद्धि होगी। रस के लोभ से वे अपना राज्य छोड कर नागार्जुन
के पास आए। रस ग्रहण करने की इच्छा से वे प्रच्छन्न वेश मे
रहते थे। जब नागार्जुन भोजन करने लगा तो उसे रससिद्धि का
वृत्तान्त पुछा। वह उनको ज्ञात कराने के हेतु नमक सहित रसोई
बनाती है। छ महीने बीतने पर उसने क्षार-दोषपूर्ण रसोई
बतलाई। रानी ने इगिताकार से रससिद्धि पुत्रो को सूचित कर
दिया और परम्परा से जाना कि नागार्जुन की मृत्यु वासुकि ने
दर्भाङ्कुर से बतलाई है, अत उन्होने उसी शस्त्र से उसे मार
डाला। जहाँ रस स्तम्भित हुआ वहाँ स्तम्भन नामक नगर हुआ।
कालान्तर से वह प्रतिमा केवल मुख के सिवाय सारी जमीन के
अन्दर चली गई।
अब चन्द्रकुल के श्रीवर्द्धमानसूरि शिष्य जिनेश्वरसूरि शिष्य
श्री अभयदेवसूरि गुजरात मे सम्भायण स्थान मे विचरे। उनके
महाव्याधिवश अतिसारादि रोग उत्पन्न होने पर प्रत्यासन्न नगर-
गाँवो से पाक्षिक प्रतिक्रमणार्थ आने वाले लोगो को विशेष रूप से
मिथ्या दुष्कृत देने के लिए सभी श्रावक सघो को बुलाया। तेरस