विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीपुर-अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प २३५
उसने सोचा—अहो ! वह दिव्य जल है। दूसरे दिन वह राजा को
वहाँ ले गई, सर्वाङ्ग-प्रक्षालन किया जिससे राजा का सारा शरीर
अभिनव हो गया। देवी ने बलि-पूजादि करके कहा—यहाँ जो
देवता हो वे अपने को प्रकट करे ।
घर आने पर रानी को देवता ने स्वप्न मे कहा—यहाँ भावी
तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा रखी हुई है, उसी के
प्रभाव से राजा को आरोग्यलाभ हुआ है। उस प्रतिमा को गाडे
मे चढाकर सात दिन के जन्मे बछडो को कच्चे सूत ततु की रस्सी
मात्र से जोत कर राजा स्वय सारथी बन कर अपने स्थान के
प्रति ले चलें। जहाँ भी राजा पीछे मुड कर देखेगे वही प्रतिमा
स्थिर हो जायगी।
राजा ने खड्डे के जल को आलोडित कर प्रतिमा प्राप्त की
और उसी प्रकार विधि करके प्रतिमा को लेकर चला । कितनी ही
दूर जाने पर राजा ने प्रतिमा आती है कि नही ? यह जानने के
लिए पीछे सिंहावलोकन किया। प्रतिमा वही आकाश मे ठहर गई,
गाडी आगे निकल गई। राजा ने अधृति से प्रतिमा को न देखकर
वही पर अपने नाम से श्रीपुरनगर वसाया, वही मन्दिर निर्माण
कराया और बडे भारी समारोह के साथ प्रतिमा प्रतिष्ठित की
गई। राजा उसकी त्रिकाल पूजा करने लगा। आज भी वह
प्रतिमा उसी प्रकार अंतरिक्ष मे ठहरी हुई है। पूर्णकाल मे बेहडे-
घडे सहित सिर पर रखे स्त्री प्रतिमा के सिंहासन के नीचे से निकल
जाती थी। कालक्रम से भूमि ऊँच हो जाने से या म्लेच्छादि दूषित
कालानुभाव से नीची-नीची होते वर्त्तमान मे केवल वस्त्र ही
प्रतिमा के नीचे से निकलता हैं। दीपकप्रभा भी सिंहासन और
भूमि के बीच दिखाई देती है।
जब वह प्रतिमा गाडी पर चढाई, तब अम्बा देवी और क्षेत्र-