विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिष्ठायक संघ के विघ्नो को उपशमन करते है। और प्रणत लोगो
का मनोरथ भी पूर्ण करते हैं। यहाँ हाथ मे स्थिर प्रदीप लिए हुए
घूमते पुरुष को मन्दिर मे शान्त चित्त वाले भव्य जन देखते हैं।
इस महातीर्थभूत पार्श्वनाथ के दर्शन से कलिकुण्ड-कुक्कुटेश्वर-
श्रीपर्वत-शंखेश्वर-सैरीसा-मथुरा-वाराणसी-अहिछत्ता-स्तभन-अजा-
हर-प्रवरनगर-देवपत्तन-करहेडा-नागदा-श्रीपुर-सामिणि-चारूप-
ढिपुरी-उज्जैन-शुद्धदन्ती-हरिकंखी-लिंबोडक आदि स्थानो मे विद्य-
मान पार्श्वनाथ प्रतिमाओ का यात्रा करने का फल होता है ऐसा
सम्प्रदाय-पुरुषो का उपदेश है।
फलवृद्धिपुर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर के इस छोटे से कल्प
को सुनने वाले भव्यो का कल्याण हो।
आप्त जनो के मुख से कुछ संप्रदायादि उपादानो से श्री जिन-
प्रभसूरि ने यह फलवृद्धिपार्श्वनाथ-प्रतिमा का कल्प बनाया है।
यह श्री फलवृद्धिपार्श्वनाथ-कल्प सम्पूर्ण हुआ। ग्रंथसंख्या
५५ अक्षर २ ऊपर है।
६१. अम्बिकादेवी-कल्प
श्री उज्जयन्त गिरि शिखर के मण्डन श्री नेमिनाथ भगवान
को नमस्कार करके कोहडिदेवी-कल्प वृद्धोपदेशानुसार लिखता हूँ।
सौराष्ट्र देश मे धन धान्य सम्पन्न, जनसमृद्ध कोडीनार
नामक नगर है। वहाँ सोम नामक ऋद्धि-समृद्ध षट्कर्मपरायण,