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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

२५० विविध तीर्थ-कल्प

अतः उन्होंने इस निर्णय को मान्य किया। भगवान जीरापल्ली
नगरी मे पधारे, महाजन लोगो ने प्रवेशोत्सव किया। वहाँ के
जिनालय की महावीर प्रतिमा को स्थानान्तर कर के संघ ने सर्व-
सम्मति पार्श्वनाथ भगवान को मूलनायक रूप मे विराजमान
किया। वहाँ अनेक अभिग्रह धारण कर आने लगा। अधिष्ठायक
देव उनकी मनोकामना पूर्ण करता जिससे जीरावला पार्श्वनाथ
तीर्थ रूप मे प्रसिद्ध हो गया। धाधल सेठ देव-द्रव्यादि की सार-
सम्भाल करता था।
एक बार जावालि नगर से यवनो की सेना आई जिसे अधि-
ष्ठायक देव ने अश्वारूढ हो कर भगा दिया। फिर सेना मे से सात
सेख—गुरु लोग रुधिर का पात्र भर कर लाए और देव-स्तुति के
बहाने मन्दिर मे रहे और रात्रि मे रुधिर छिड़क कर प्रतिमा को
भग्न कर दिया। शास्त्रवाक्य है कि रक्तस्पर्श से देवो की प्रभा
लुप्त हो जाती है। शेख लोग आशातना कर के भाग गये, प्रात -
काल इस दुर्घटना को ज्ञात कर धाधल सेठ आदि सभी लोग बडे
दुखी हुए। राजा ने अपने सुभट भेज कर सातो सेखो को नष्ट
कर दिया।
उपवास कर के बैठने पर अधिष्ठाता देव ने कहा—ऐसी अप-
वित्त्रता के समय मैं भी असमर्थ हूँ। तुम चिन्ता मत करो, अब नौ
सेर चन्दन के अन्तर्लेप से ये नवो खण्ड मिला कर रख दो और
सात दिन कपाट बन्द रखो। गोष्ठिक ने उसी प्रकार किया पर
सातवे दिन एक सघ आया जिसने उत्सुकतावश द्वारोद्घाटन
कर दर्शन किये। कुछ अवयव अश्लिष्ट रह गए, आज भी भगवान
के नव अग स्पष्ट दिखाई पडते हैं। अपने नगर मे पहुँचने पर उन
आततायी लोगो के घरो मे ज्वलन, द्रव्यनाश आदि होने लगा तो
दैवी उपद्रव ज्ञात कर वहाँ के राजा ने अपना मंत्री भेजा। देव ने
उसे स्वप्न मे कहा कि जब राजा स्वयं यहाँ आ कर अपना शिर