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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 442 में से

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पृष्ठ 327

२४४ विविध तीर्थ-कल्प
वेदागमपारगामी ब्राह्मण था । उसकी अंबिणी नामकी स्त्री अपने
शरीर मे शीलरूपी मूल्यवान अलंकार को धारण करने वाली थी ।
उनके विषय-सुखानुभव करते दो पुत्र उत्पन्न हुए, पहला सिद्ध
और दूसरा बुद्ध था ।
एक वार पितर पक्ष आने पर सोम भट्ट ने श्राद्ध के दिन
ब्राह्मणो को निमन्त्रित किया । कही वे वेद पाठ करते है, कही
पिण्डदान प्रारभ करते है, कही अग्नि होम करते हैं । अविणी ने
जीमनवार के लिए खीर-खाँड, दाल, भात, व्यञ्जन, पक्वान्नादि
तैयार किए । उसकी सासू स्नान करने मे प्रवृत्त थी । उस समय
मासक्षमण के पारने के लिए एक साधु उसके घर मे भिक्षार्थ
आया । उसे देखकर हर्षपूर्ण पुलकित अग वाली अम्बिणी उठी
और भक्ति-बहुमानपूर्वक उस मुनिराज को भात-पाणी देकर प्रति-
लाभा । साधु भिक्षा लेकर चला गया और सासू भी नहा-धोकर
रसोई मे आई । खाद्य पदार्थ पर शिखा न देखकर क्रोधपूर्वक
उसने बहू से पूछा । उसके यथास्थित कहने पर सासू ने उसे
फटकारा—पापिनी ! यह तुमने क्या किया ? अभी तो कुल-देवता
की पूजा नही की और न अभी तक ब्राह्मणो को भोजन कराया,
न पिण्डदान ही हुआ है अत तुमने अग्रशिखा साधु को किस
लिए दी ?
सासू ने सोमभट्ट से सारा व्यतिकर कहा । उसने रुष्ट होकर
स्वच्छंदी कहते हुए उसे घर से निकाल दिया । पराभव से दुखी
होकर अम्बिणी बुद्ध को गोद लेकर सिद्ध की अगुली पकड़े नगर
से बाहर चल पडी । मार्ग मे प्यासे पुत्रो ने जल माँगा, अम्बिणी
अश्रुपूर्ण नेत्रो वाली हुई तो सामने रहा हुआ सूखा सरोवर उसके
अमृत्य शील के प्रभाव से तत्काल जलपूर्ण हो गया । दोनो पुत्रो
को शीतल जल पिलाया । फिर भूखे बालको ने भोजन माँगा तो