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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 330

६२. पंचपरमेष्ठी नमस्कार-कल्प
तीन जगत को पावन करने वाले पुण्यतम मत्र श्री पंच-
परमेष्ठी नमस्कार का योगी चिन्तन करे। वह इस प्रकार है—
ज्ञानीजन आठ दल वाले सफेद कमल की कर्णिका मे स्थित
प्रथम सात अक्षर का पवित्र मंत्र चिन्तन करे—णमो अरिहंताण।
चारो दिशाओ के पत्रो मे यथाक्रम से सिद्धादि चार पदो का
और विदिशा के दलो पर चार चूला पद का चिन्तन करे।
मुनि इसका त्रिशुद्धिपूर्वक एक सौ आठ बार चिन्तन करते
हुए भी चतुर्थ तप-उपवास का फल प्राप्त कर लेते हैं।
इस लोक मे योगीजन इस महामंत्र का समाराधन करके परम-
पद को प्राप्त त्रैलोक्यनिवासी जनो द्वारा पूजे जाते हैं।
हजारो पाप करके सैकडो जन्तुओ को मारने वाले तिर्यञ्च भी
इस मंत्र का आराधन करके स्वर्ग मे गए है।
गुरुपचक नाम से बनी हुई षोडशाक्षरा विद्या होती है।
उसको दो सौ बार जपता हुआ प्राणी चतुर्थ तप का फल प्राप्त
करता है।
पंचपरमेष्ठि नमस्कार-कल्प समाप्त हुआ।