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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

२१८ विविध तीर्थ-कल्प
पति और सघ ने महोत्सव किये । भाट-भोजक आदि लोगो का
वस्त्र-भोजन-ताम्बूलादि से पूजा सत्कार किया ।
गुरु महाराज ने यात्रा से लौटते ही मिती वैगाख गुक्ल १०
के दिन समस्त दुरित नागक श्री महावीर स्वामी के विम्ब की
महोत्सव पूर्वक स्थापना की । वादशाह के बनवाए हुए मन्दिर मे
सघ के द्वारा वहाँ पूजा की जाती है । सुलतान के दिगयात्रा से
आने पर मन्दिर मे विगेप उत्सव प्रवर्त्तित होते हैं । सार्वभौम
सम्राट उत्तरोत्तर अधिकाधिक मान दे कर गुरु महाराज को
सम्मानित करता है । सूरिसार्वभौम श्री जिनप्रभसूरि की धर्म-
प्रभावना का यशपटह सर्व दिगाओ मे वजता है । राजाधिराज
के दिए हुए फरमान हाथ मे होने से श्वेताम्बर-दिगम्बर सर्व देश
मे विना किसी उपसर्ग वाधा के विचरण करते हैं । यवन सैन्य
परिभूत दिग् चक्र किये होने पर भी खरतर गच्छालकार गुरु
महाराज के प्रसाद से फरमान ग्रहण करते शत्रुञ्जय-गिरनार-
फलौदी आदि तीर्थ निर्भय-निरापद हुए । इस प्रकार के धर्मकृत्यो
से श्री पादलिप्तसूरि-मल्लवादी-सिद्धसेन दिवाकर-हरिभद्रसूरि-हेम-
चन्द्रसूरि आदि पूर्वाचार्यों को उद्योतित किया । अधिक क्या कहा
जाय, सूरिचक्रवर्त्ती गुरु महाराज के गुणो से खिचे हुए नरेन्द्र भो
सकल धर्म कार्यारम्भ मे प्रवर्त्तन करता था ।
चैत्य-वसतियो मे प्रति प्रात काल शखध्वनि वजती रहती है ।
धार्मिक लोगो द्वारा वीरविहार मे मादल, मृदङ्ग, भुगल, ताल
वजते हुए प्रेक्षणीय महापूजाएँ की जाती हैं । भगवान महावीर के
आगे भव्य लोग कर्पूर, अगर, परिमल युक्त धूप दे कर उसकी
भुगन्ध दिगमंडल मे व्याप्त करते हैं । हिन्दू राज्य के समान
सचरण करते हैं । इस पचम काल और अनार्य राज्य मे भी चतुर्थ
आरे की भाँति जो जिन-गासन की प्रभावना होती है वह गुरु-
गिक्षा का ही प्रभाव है । और तो क्या ? गुरु महाराज के चरणो

कन्नाणयन महावीर कल्प-परिशिष्ट २१९
मे पाँचो दर्शनी लोग किंकर की भाँति सपरिवार लौटते हैं । गुरु
महाराज के वचनो की प्रतीक्षा मे प्रतीक्षित रहते हैं । गुरु महाराज
के दर्शनो के उत्सुक इह—परलोक कार्यार्थी परतीर्थिक लोग दर-
वाजे पर स्थित रह कर निरन्तर सेवा करते हैं । गुरु महाराज
नरेश्वर की अभ्यर्थना से नित्य राजसभा मे जाते हैं और वन्दी
वर्ग को मुक्त कराते हैं ।
सच्चारित्र वाले सूरि महाराज अपनी उच्च कोटि की चर्या
मे प्रवृत्त रह कर पद-पद पर धर्म-प्रभावना करते हुए जिनोक्त युक्ति-
युक्त वचनो से निरन्तर नरेश्वर के मन मे कुतूहल उत्पन्न करते
हैं । गगाजल की भाँति स्वच्छ चित्त वाले वे अपनी यशश्चन्द्रिका
द्वारा अन्तराल को धवलित करते हैं । उनके वचनामृत से जीव
लोक उपजीवित है । स्वदर्शनी व परदर्शनी लोग समग्र व्यापार मे
आज्ञा शिरोधार्य करते है । युगप्रधान प्रभु स्व पर सिद्धान्तो की
अनन्य असाधारण भंगिमा से व्याख्या करते हैं ।
इस प्रकार धर्म-प्रभावनाप्रकारो से परिभाव्यमान पवाडे—
कीर्त्ति जिनके नित्य ही वर्त्तमान है ऐसो अपरिमित कीर्त्ति को अल्प-
मति कैसे कह सकते हैं ?
ये सूरि महाराज करोडो वर्ष जीवे, जिन-शासन की चिरकाल
प्रभावना करे ।
कन्नाणय महावीर कल्प के परिशिष्ट रूप मे श्री जिनप्रभ
सूरिजी के प्रभावना अगो की यह गुणस्तुति लेशमात्र—सक्षेप मे
कही गई है ।

५२ श्री कुल्पाक ऋषभदेव-स्तुति
श्री कुल्पाक प्रासाद के आभरण, सत्पुरुषो के शरण्य, माणिक्य
देव नामक श्री ऋषभदेव जिनेश्वर के नमस्कार करता हूँ ।
श्री कुल्पाकपुर लक्ष्मी के शिरोभूषण प्रासाद मे पवित्र रूप से
अधिष्ठित पृथ्वी पर माणिक्य देव नाम से प्रसिद्ध जो ऋषभदेव हैं
उनके चरणकमलो को नमस्कार करता हूँ ।
प्रसन्न चित्त वाले इन्द्र चन्द्र आदि के मुकुटो के श्रेणितट से
जिनके चरण और आसन का घर्षण होता है ऐसे तीर्थंकरो का
समूह मेरे दारुण दु.ख रूपो वृक्षो की श्रेणि को पीस डालने के
लिए मत्त गजेन्द्र हं, वे मेरे लिए गज वने ।
हेतु, उपपत्तियो से निरूपित वस्तु तत्त्व वाला, स्याद्वादपद्धति
से दुर्नय समूह को उसमे समावेश करने वाला, उत्तम सिद्धपल्ली
के लिए विपिन के समान, तीन भुवन मे पूजा का पात्र श्री जिनेन्द्र-
वचन का मै शरण लेता हूँ ।
श्री ऋषभदेव भगवान के शासन रूपी आम्रवन की रक्षिका
नवविद्रुम के समान शरीर की कान्ति वाली है । जो खेचर चक्री
(गरुड) पर चढ कर आकाश मे विचरती हैं, मनोहर चक्र हाथ
मे धारण करती है वह चक्रेश्वरी देवी कल्याणकारी हो ।

५३. आमरकुण्ड पद्मावती देवी-कल्प
तिलग जनपद विभूषण और मनोहर आमरकुण्ड नगर मे
पर्वत-गिखर के भुवन मे विराजमान स्थित श्री पद्मावती देवी
जयवन्त हो ।
कल्याण करने वाले समस्त गुणगण नीरन्ध्र युक्त आन्ध्र देश मे
आमरकुण्ड नामक नगर है। गगनचुम्बी मनोहर हवेलियो की
श्रेणी से नयनाभिराम, नाना प्रकार के छाया वाले वृक्षो से परिष्कृत,
मधुर-मधुर गूँजते हुए मधुकरो के समूह से घिरे हुए पुष्पो के
सौरभ से सुगन्धित दिशाओ वाला, निर्मल पानी से भरे हुए बडे-
बडे सरोबरो और नदो से शोभित और गत्रुओ से क्षुब्ध न होने
वाला अदुर्ग होने पर भी दुर्गयुक्त वह नगर है। उस श्रेष्ठ नगर का
क्या वर्णन करे ? जहाँ करवीर के पुष्प हैं वे भी कस्तूरी की गन्ध
वाले हैं। विशिष्ट गन्ने और बडे-बडे केले के फल मनोहर नार-
गियाँ, अनेक प्रकार के आम्र, सरस पनस, पुन्नाग, नागवल्ली,
पूग-सुपारी अत्यन्त

उसके ऊपर परिणाह आरोहशाली श्री ऋषभदेव और शान्ति-
नाथादि प्रतिमाओ से अलंकृत मनुष्यो के मन को प्रसन्न करने
वाले शुभ प्रासाद शोभायमान है । वहाँ एक पवित्रतर और पार-
गत भवन मे छद्म से मुक्त मन वाले विषय-सुखो से जिनका हृदय
जरा भी क्षुभित नही होता था और अपनी कृपा से सहृदय के
हृदयो को आह्लादित करने वाले थे, ऐसे कामदेव को जीतने
वाले और विस्मयकारी चारित्र-आचरण से वश की गई पद्मावती
से लब्ध-प्रतिष्ठ मेघचन्द्र नाम के दिगम्बर आचार्य थे, जिनकी
सेवा अनेक लोग करते थे । वे एक बार श्रावक गोष्ठी को कह
कर दूसरे स्थान पर विचरने के लिए प्रस्थान कर गये । ज्यो ही
कितनी भूमि चले, अपने अस्तालकार पुस्तक नही देखी तब
उन्होने कहा—अहो ! हम कैसे प्रमादी हैं कि अपने हाथ की
पुस्तक भी भूल गये । ऐसा क्षणमात्र विषाद कर के शीघ्र ही
माधवराज नामक क्षत्रियजातीय एक छात्र को पुस्तक लाने के
लिए वापस भेजा । वह सरल बुद्धि वाला छात्र लौट कर ज्यो ही
मठ मे प्रवेश करता है त्यो ही एक अद्भुत रूप-कान्ति वाली स्त्री
उस पुस्तक को उरु पर रखे बैठी थी, देखा । ज्यो ही वह निर्भीक
और अक्षुब्ध चित्त से उस पर रखी हुई उस पुस्तक को लेने लगा
त्यो ही वह वरवर्णिनी उस पुस्तक को अपने कन्धे पर धारण
किये हुए है ऐसा देखा । इसके बाद वह विद्यार्थी "यह मेरी माता
के समान है" ऐसा सोच कर उसकी जंघाओ पर भी पाँव दे कर
उसके स्कन्ध से पुस्तक को लेने लगा । तब उस स्त्री ने देखा कि
यह व्यक्ति राज्य के योग्य है ऐसा सोच कर हाथ पकड लिया और
बोली—वत्स ! तुम कुछ वर माँगो । वह मैं तुम्हे दू ! मैं तुम्हारे
साहस से तुष्ट हुई हूँ । शिष्य ने कहा—ससार मे एकमात्र वन्द्य मेरे
गुरु मुझे सब प्रकार के अभिरुचित अर्थ को देने मे समर्थ ही है,
इसलिए हे शुभवती ! मैं आपसे क्या मांगू ? ऐसा कह कर और

आमरकुण्ड पद्मावतीदेवी-कल्प २२३
पुस्तक ले कर वह छात्र अपने आचार्य के पास आ गया। वहाँ का
सारा स्वरूप निवेदन कर पुस्तक आचार्य को दे दी। क्षपणक
गणाधिपति बोले—भइ वह स्त्री मात्र नही, किन्तु वह भगवती
पद्मावती देवी है। इसलिए जाओ और मनोहर पद्य लिखा हुआ
यह पत्र उन्हे दिखलाओ।
गुरु के आदेशानुसार वह छात्र शीघ्र ही मठ मे लौटा और
उस देवी को वह पत्र समर्पण कर आगे खडा रहा। देवी ने उस
पत्र को पढ़ा। यथा—“आठ हजार हाथी, नव कोटि पदाति, इतने
ही रथ तथा घोडे एव एक लाख मुद्राओ का कोष इसे दीजिये!”
भगवती ने भी पद्यार्थ को समझ कर उस शिष्य को एक चतुर
घोडा दिया और बोली—आप इसके ऊपर चढ कर जाओ, जो
इस पत्र मे लिखा है वह सब तुम्हारे पीछे ही आ जायगा।
केवल पहाडी मार्ग से तुम जाना और पीछे मत देखना।” ऐसा
उसका वचन “ऐसा ही होगा” कहते हुए स्वीकार कर कृत्य को
समझने वाला वह पहाड की गुफा मे अश्वसहित प्रवेश कर गया
और बारह योजन तक चलता रहा। इसके वाद आते हुए
हाथियो के समूह की घटाओ से रणत्कार की तुमुल और जोर की
ध्वनि सुनकर वह छात्र उतावल से कुतूहलपूर्वक पीछे मुडकर
सिंहावलोकित न्याय से देखने लगा। उसने हाथी, घोडे आदि
समूह से परिपूर्ण सेना को देखा और विस्मय रसमय हृदय वाला
होने से वही पर बारह योजन वाद जिस घोडे पर चढा था वह
घोडा ठहर गया। तदनन्तर परम जैन श्री माधवराज ने सेना
से घिरे हुए वही नगर वसा कर उसमे देवी का भुवन वनवाया,
फिर आमरकुण्ड नगर मे आकर भूपालमौलि लालित्य वाली
राज्यलक्ष्मी का पालन किया। उसे स्वर्ण-कलश, दण्ड, ध्वज से
शोभायमान गगनचुम्बी शिखर वाले प्रासाद का निर्माण कराया
और उसमे चित्रीयमान नमस्कार करते हुए मनुष्ययुक्त श्री

२२४ विविध तीर्थ-कल्प
पद्मावती देवी को प्रतिष्ठित किया। वह पूर्ण भक्तियुक्त हृदय से
त्रिकाल अष्टप्रकारी पूजा करता। आज भी भुवनोदरव्यापी
माहात्म्य अमन्द लक्ष्मी वाला भगवती का भव्य मन्दिर, भव्य
जनता से पर्युपास्यमान विद्यमान है।
उस पहाडी गुफा के द्वार पर चौडा शिलापट्ट आज भी लगा
हुआ है कि जिससे उस मार्ग से सब लोग नही जा सकते क्योकि
वहाँ शिला को उघाड कर विस्तारपूर्वक पूजा करके कितनी
कला तक लोटते-रेंगते हुए जाय, उससे आगे बैठा-बैठा चले और
आगे विशेष चौडाई मे ऊँचा देवी के मन्दिरपर्यन्त जाना चाहिए।
सैकडो विघ्नो की सम्भावना और कष्ट के भय से प्राय कोई
उस गुफा के द्वार को चतुरतापूर्वक उघाडने का साहस नही करता
है। शिला से ढँके हुए मुख वाले गुफास्थान मे ही सभी श्रद्धालुगण
पद्मावती की पूजा करते हैं और सभी प्रकार की अभीष्ट सिद्धियो
को प्राप्त करते हैं। माधवराज के वंशज पुरटिरित्तमराज,
पिण्डकुण्डिमराज, पोल्लराज, रुद्रदेव, गणपतिदेव हुए हैं। गणपति-
देव की पुत्री रुद्रमहादेवी ने पैंतीस वर्ष तक राज्य किया, इसके
बाद श्री प्रतापरुद्र राजा ने राज्य किया। ये ककती ग्रामवासी
होने से काकतीय नाम से प्रसिद्ध हैं।
इस प्रकार आमरकुण्डा नामक पद्मावती का यह कल्प संक्षेप
से श्री जिनप्रभसूरि ने यथाश्रुत कहा।
श्री आमरकुण्ड पद्मावती का कल्प समाप्त हुआ। इनकी
श्लोक-संख्या ५९ और २२ अक्षर हैं।

५४. चतुर्विंशतिजिनकल्याण-कल्प
अतीत, वर्त्तमान और अनागत चौबीस जिनेश्वरो का उत्स-
र्पिणी-अवसर्पिणी मे हुए अनुलोम प्रतिलोम से पाँच भरत और
पाच ऐरवत मे स्वर्गादि से पृथ्वी पर आगमनरूप हुए च्यवन-
कल्याणक है, पच महाविदेहो शाश्वत क्षेत्रो के नही।
एकाशना, नीवी, आयंबिल और उपवास से प्रथम और दूसरे
पच कल्याणको मे से प्रथम और दूसरा एकाशना, नीवी, आयंबिल
और उपवास आदि करके सक्षेप से पच कल्याणको का अपराध
करो।
विस्तृत रूप से आराधन करने वाले को च्यवन और जन्म
कल्याणक के दिन उपवास करना तथा दीक्षादि तीन कल्याणक
जिनेश्वरो द्वारा किए हुए तप से आराधन करना चाहिए।
सुमतिनाथ भगवान नित्यभक्त से दीक्षित हुए और वासुपूज्य
स्वामी ने उपवास से दीक्षा ली। पार्श्वनाथ और मल्लिनाथ ने
अष्टम तप पूर्णक दीक्षा ली। अवशिष्ट जिनेश्वरो ने छठ्ठ भक्त
(२ उपवास) से अभिनिष्क्रमण किया।
ऋषभदेव, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ को अष्टम तप
से केवलज्ञान हुआ। वासुपुज्य भगवान को चतुर्थ भक्त से एव शेष
तीर्थंकरो को छठ्ठ भक्त से केवलज्ञान हुआ।
ऋषभदेव चतुर्थ भक्त से, महावीर स्वामी छठ्ठ भक्त से, नित्य-
भोजी सुमतिनाथ भी उपवास से सिद्ध हुए।
जिन-पथ के आराधक इस प्रकार कल्याणक तप करके विधि-
पूर्वक उद्यापन करते हैं। वे क्रमश. परम पद को प्राप्त करते हैं।
जिणपह शब्द से कर्त्ता ने अपना नाम भी दे दिया है।
१५

२२६ विविध तीर्थ-कल्प
सभी जिनेश्वरो के च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवल और मोक्ष ये
पच कल्याणक हुए हैं, किन्तु भगवान महावीर के गर्भापहारसहित
छ कल्याणक हैं।
इन क्षेत्रो मे होने वाले जिनेश्वरो के पंचकल्याणंक जिसने
आराधन किए उसने दश क्षेत्रो मे होने वाले तीन काल के अर्हन्तो
की उपासना की।
भव्यजनो के मन के अभीष्ट संकल्पो को पूर्ण करने वाले इस
˙चकल्याणक तप को जो भव्य पढते सुनते है उन्हे सिद्धिश्री
अवश्य वरण करती है।
इसकी ग्रन्थ संख्या १३१ अक्षर १५ है।
५५. तीर्थंकर अतिशय-विचार
पहले चार सहज अतिशय, उसके बाद घाती कर्मो के क्षय मे
ग्यारह अतिशय और देवकृत १९ अतिशय होते हैं। इस प्रकार
कुल ३४ अतिशय हुए। इनमे अपायापगम अतिशय, ज्ञानातिशय,
वचनातिशय और पूजातिशय का समावेश हो जाता है।
ग्रन्थसंख्या २ अक्षर ७ है।

५६. पञ्चकल्याणक-स्तवन
जिनेश्वर भगवान को नमस्कार करके उन्ही के च्यवन-जन्म-
दीक्षा-ज्ञान और निर्वाण के पंच कल्याणको का कीर्त्तन करता हूँ।
कार्त्तिक कृष्ण ५ को सभवनाथ का, वारस को नेमिनाथ का च्यवन
और पद्मप्रभ का जन्म हुआ।
तेरस को पद्मप्रभ की दीक्षा, अमावस्या को वीर प्रभु का
निर्वाण, काती सुदि तीज को सुविधिनाथ का और अरनाथ
स्वामी का वारस को निर्वाण हुआ। मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी को
सुविधिनाथ का जन्म, छठ के दिन सुविधिनाथ की और दगमी
को महावीर स्वामी की दीक्षा हुई।
मार्गशीर्प वदि ग्यारस को पद्मप्रभ का मोक्ष, सुदि दशमी को
अरनाथ का मोक्ष और जन्म हुआ। ग्यारस को अरनाथ की दीक्षा,
मल्लिनाथ का जन्म दीक्षा और ज्ञान, नमिनाथ का भी केवल-
ज्ञान हुआ।
मार्गशीर्ष शुक्ल १४ जन्म और पूर्णिमा को संभवनाथ की
दीक्षा हुई। पोप कृष्ण १० को पार्श्वनाथ का जन्मोत्सव हुआ।
ग्यारस को पार्श्वनाथ की दीक्षा, वारस को चन्द्रप्रभ का जन्म और
तेरस के दिन दीक्षा हुई।
पौष कृष्ण चतुर्दगी को गीतलनाथ को केवलज्ञान उत्पन्न
हुआ। पोष सुदि ६ को विमलनाथ और नवमी के दिन गान्तिनाथ
ने दीक्षा ली। सुदि चतुर्दशी को अभिनन्दन एव पूर्णिमा को धर्म-
नाथ का मनुष्यो को आनन्द देने वाला केवलज्ञान हुआ।
माघ कृष्ण छठ को पद्मप्रभ का च्यवन, वारस को गीतलनाथ
का जन्म और दीक्षा दो कल्याणक हुए। ऋषभदेव त्रयोदगी को

२२८ विविध तीर्थ-कल्प

निर्वाण प्राप्त हुए। अमावस्या के दिन श्रेयांसनाथ को केवल-
ज्ञान हुआ।
माघ शुक्ल दूज के दिन अभिनंदन का जन्म और वासुपूज्य
का केवलज्ञान ये दो कल्याणक हुए। तृतीया के दिन धर्मनाथ
और विमलनाथ जिनेश्वर का जन्म हुआ। चतुर्थी के दिन विमल-
नाथ की दीक्षा हुई और सुदि अष्टमी को अजितनाथ का जन्म
हुआ।
अजितनाथ स्वामी ने माघ शुक्ल नवमी को दीक्षा ली और
बारस को अभिनंदन स्वामी की दीक्षा एव धर्मनाथ जिनेश्वर की
दीक्षा भी तेरस को प्रसिद्ध है। फाल्गुन कृष्ण छठ को सुपार्श्वनाथ
को केवलज्ञान और सप्तमी को निर्वाण हुआ। उसी दिन चन्द्रप्रभ
भगवान को केवल ज्ञान हुआ।
फाल्गुन कृष्ण नवमी को सुविधिनाथ का च्यवन और ग्यारस
के दिन ऋषभदेव को केवलज्ञान हुआ। श्रेयांसनाथ का जन्म
और मुनि सुव्रत का केवलज्ञान बारस के दिन हुआ। त्रयोदशी
को श्रेयांसनाथ भगवान ने चारित्र लिया। चतुर्दशी वासुपूज्य का
जन्म और अमावस्या के दिन दीक्षाकल्याणक है।
फाल्गुन शुक्ल दूज को अरनाथ जिनेश्वर का च्यवन हुआ।
चतुर्थी को मल्लिनाथ और अष्टमी को सभवनाथ जी का च्यवन
कल्याणक है। बारस के दिन सुमतिनाथ की दीक्षा और मल्लिनाथ
जिनेश्वर का निर्वाण हुआ। चैत्र कृष्ण चतुर्थी को पार्श्वनाथ
भगवान का केवलज्ञान और च्यवनकल्याणक है।
चैत्र कृष्ण पचमी को चन्द्रप्रभ भगवान का च्यवन, अष्टमी के
दिन ऋषभदेव प्रभु का जन्म, और दीक्षाकल्याणक हैं। चैत्र शुक्ल
तृतीया को कुन्थुनाथ का केवल ज्ञान, पचमी को अनतनाथ का
अजितनाथ का और सभवनाथ का भी निर्वाण हुआ।

पञ्चकल्याणक-स्तवन २२९
चैत्र गुक्ल नवमी के दिन सुमतिनाथ का निर्वाण और ग्यारस
को केवलज्ञान हुआ। त्रयोदशी के दिन भगवान महावीर का
जन्मोत्सव हुआ। पूर्णिमा के दिन पद्मप्रभ को केवलज्ञान हुआ।
वैशाख कृष्ण प्रतिपदा के दिन कुन्थुनाथ भगवान का निर्वाण
हुआ।
वैशाख कृष्ण द्वितीया को शीतलनाथ का निर्वाण, पचमी को
कुन्थुनाथ की दीक्षा, और छट्ठ के दिन गीतलनाथ का च्यवन
हुआ। दगमी के दिन नमिनाथ का मोक्ष, त्रयोदशी की अनन्तनाथ
का जन्म और चतुर्दशी को उनकी दीक्षा और केवलज्ञान
कल्याणक हुआ।
वैशाख कृष्ण चतुर्दशी के दिन निर्मल चित्त वाले कुन्थुनाथ
भगवान का जन्म और गुक्ल चतुर्थी को अभिनन्दन का च्यवन
हुआ। सप्तमी के दिन धर्मनाथ तीर्थंकर का च्यवन और अष्टमी
के दिन अभिनन्दन स्वामी का निर्वाण हुआ।
वैशाख शुक्ल अष्टमी को सुमतिनाथ का जन्म और नवमी को
दीक्षा हुई। दगमी के दिन महावीर स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त
हुआ। द्वादशी के दिन विमलनाथ का एव त्रयोदशी को अजितनाथ
का च्यवनकल्याणक है। ज्येष्ठ वदि छठ को श्रेयासनाथ का
च्यवन हुआ।
ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी को मुनि सुव्रत का जन्म और नवमी के
दिन निर्वाण हुआ। त्रयोदशी के दिन शान्तिनाथ स्वामी का जन्म
एव निर्वाण हुआ एव चतुर्दशी को उन्ही का दीक्षा कल्याणक है।
गुक्ल पचमी को धर्मनाथ स्वामी का निर्वाण और नवमी को
वासुपूज्य जिनेश्वर का च्यवनकल्याणक है।
ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को सुपार्श्वनाथ जी का जन्म और
त्रयोदशी को दीक्षा हुई। आपाढ कृष्ण चतुर्थी को ऋषभदेव

२३० विविध तीर्थ-कल्प
भगवान का च्यवनकल्याणक है। सप्तमी को विमलनाथ का
निर्वाण, नवमी के दिन नमिनाथ प्रभु की दीक्षा हुई। शुक्ल छठ
को वीर प्रभु का च्यवन और अष्टमी के दिन श्री नमिनाथ का
निर्वाण हुआ।
आषाढ शुक्ल चतुर्दशी के दिन श्री वासुपूज्य स्वामी सिद्ध
हुए। श्रावण कृष्ण तृतीया को श्रेयासनाथ का निर्वाण हुआ।
सप्तमी के दिन अनन्तनाथ का च्यवन, अष्टमी को नमिनाथ का
जन्म, नवमी को कुन्थुनाथ का च्यवन और शुक्ल द्वितीया को
सुमतिनाथ जी की दीक्षा हुई।
श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन नेमिनाथ भगवान का जन्म और
दीक्षा, अष्टमी को पार्श्वनाथ जी का निर्वाण एव पूर्णिमा को
मुनि सुव्रत भगवान का च्यवन हुआ। भाद्रपद कृष्ण सप्तमी को
शान्तिनाथ जी का च्यवन और चन्द्रप्रभ का मोक्ष हुआ। अष्टमी
के दिन सुपार्श्वनाथ तीर्थंकर का च्यवनकल्याणक है।
भाद्रपद शुक्ल नवमी को सुविधिनाथ जिनेश्वर का निर्वाण
हुआ। आश्विन कृष्ण अमावस्या को नेमिनाथ भगवान केवली
हुए। पूर्णिमा को नमिनाथ का च्यवन कल्याणक है।
श्री सोमसूरि स्तवना करते हुए कहते है कि वे हमे मंगल-
कारी हो।
श्री सोमसूरि द्वारा कृत कल्याणकस्तवन समाप्त हुआ। यह
२० काव्यो मे है।

५७. कुल्पाकमाणिक्यदेवतीर्थ-कल्प
श्री कुल्पाकपुर श्रेष्ठ के मडन माणिक्यदेव ऋषभ स्वामी का
कल्प किञ्चित् सक्षेप से यथाश्रुत लिखूँगा ।
पूर्वकाल मे भरत चक्रवर्त्ती ने अष्टापद पर्वत पर अपने-अपने
वर्ण-प्रमाण-सस्थानयुक्त चौवीस तीर्थङ्करो की सिंहनिषद्या प्रासाद
मे रत्नमय प्रतिमाएँ बनवाइँ । वह मनुष्यो के लिए अगम्य होगा,
ऐसा सोचकर एक ऋषभदेव स्वामी की एक प्रतिमा लोकानु-
ग्रहार्थ स्वच्छ मरकत मणिमय, कधो पर जटायुगल, चिबुक पर
सूर्य, भालस्थल मे चन्द्र और नाभि पर शिव-लिग वाली प्रतिमा
बनवाई, जो माणिक्यदेव नाम से विख्यात हुए । कालान्तर मे यात्रा
के लिए आये हुए विद्याधरो ने उसे देखा—वह अपूर्व रूप वाली
थी । अत. विस्मित मन से विमान मे रखकर वैताढ्य पर्वत की
दक्षिण श्रेणी मे ले गए और उसकी हार्दिक भक्तिपूर्वक पूजा
करने लगे ।
एक बार नारद ऋषि भ्रमण करते हुए वैताढ्य पर्वत पर
गए । उन्होने उस प्रतिमा को देख कर विद्याधरो से पूछा—यह
कहाँ से आई ? उन्होने कहा—हम अष्टापद से लाये है । जब से
हम इनकी पूजा करते है तब से हमारी ऋद्धि दिनो-दिन बढती
जा रही है । यह सुनकर नारद ने स्वर्ग मे इन्द्र को इस प्रतिमा
का माहात्म्य कहा । इन्द्र ने स्वर्ग मे मँगा कर भक्तिपूर्वक पूजा
करनी प्रारम्भ की । उसने मुनि सुव्रत और और नमिनाथ भगवान
के अन्तराल यावन् पूजा की । इसके पश्चात् लका मे त्रैलोक्य
कण्टक रावण उत्पन्न हुआ । उसकी भार्या मन्दोदरो परम सम्यक्-
दृष्टि थी । उसने नारद से इस रत्न-विम्ब का माहात्म्य श्रवण कर
उसकी पूजा करने का गाढ अभिग्रह ले लिया । महाराजा रावण

ने यह वृत्तान्त ज्ञात कर इन्द्र की आराधना की। उसने सन्तुष्ट
होकर वह प्रतिमा महादेवी को समर्पित की। वह प्रसन्नतापूर्वक
त्रिकाल पूजा करने लगी।
एक वार रावण ने सीतादेवी का अपहरण किया और
मदोदरी के समझाने पर भी उसने उसे नही छोडा तो प्रतिमा के
अधिष्ठायक ने स्वप्न मे मन्दोदरी को लंका का भग और गवण
का विनाग वतलाया। उसने उस प्रतिमा को समुद्र मे डुवा दिया
वहाँ देवो द्वारा पूजा होने लगी।
अब कन्नड देग के कल्याणनगर मे गकर नामक जिनेन्द्र-
भक्त राजा हुआ। किसी मिथ्यात्वी देव ने उसके राज्य मे कुपित
होकर महामारि रोग पैदा कर दिया। राजा चिन्तित हुआ।
पद्मावती देवी ने उसे दुखी देखकर रात्रि मे स्वप्न मे कहा-
महाराज ! यदि समुद्र मे से माणिक्यदेव को अपने नगर मे लाकर
पूजा करो तो कल्याण हो। तब राजा ने समुद्र तट पर जाकर
उपवास किया। सन्तुष्ट लवण-समुद्र के अधिष्ठाता ने प्रकट होकर
राजा से कहा- इच्छानुसार रत्न ग्रहण करो। राजा ने कहा-
राजा ने कहा- मुझे रत्नादि से प्रयोजन नही, मन्दोदरी की
स्थापित प्रतिमा दो। देव ने प्रतिमा निकाल कर राजा को समर्पित
की और कहा-तुम्हारे देश के लोग सुखी होगे, परन्तु मार्ग
चलते जहाँ तुम्हे सन्देह हो, वही प्रतिमा स्थापित कर देना।
राजा ने यह वात मान ली। देवता के प्रभाव से वछडो की जोडी
पर जुते हुए गाडे मे विराजमान विम्ब आने लगा। दुर्गम मार्ग
को उल्लघन कर राजा के मन मे सगय हुआ कि भगवान आते हैं
कि नही ? तब शासनदेवी तिलग देश कुल्पाक नगर - जो पण्डितो
द्वारा "दक्षिण वाराणसी" नाम से प्रसिद्ध है- मे प्रतिमा को
स्थापित किया। पहले यह अत्यन्त निर्मल मरकतमणि की थी,

कुल्पाक माणिक्यदेव तीर्थ-कल्प २३३
परन्तु चिरकालपर्यन्त क्षारसमुद्र-नीर के सग कठिनाङ्ग हो गई।
भगवान् माणिक्यदेव को स्वर्ग से लाये ग्यारह लाख असी
हजार नौ सौ पाँच वर्ष बीत गए। राजा ने वहाँ श्रेष्ठ प्रासाद
और देव-पूजार्थ बारह गाँव दिए। विक्रम सवत् ६८० पर्यन्त
भगवान् अन्तरिक्ष स्थित रहे। फिर म्लेच्छो का प्रवेश ज्ञात कर
सिंहासन पर विराजमान हुए। यह प्रतिमा अपनी अपूर्व कान्ति से
भव्य जीवो के नयनो मे अमृत वर्षा करती है।
क्या यह प्रतिमा टकोत्कीर्णित है या खान से लायी हुई है ?
क्या नागकुमार ने घडी है ? यह वज्रमय है या नीलमणिमय है ?
निश्चय नही किया जाता। कदलीस्तम्भ जैसी दिखाई देती है।
आज भी भगवान के न्हवण-जल से दीपक जलता है। आज भी
न्हवण-जल से मिट्टी को भिगो कर अन्धे की आँखो पर बाँधने से
नेत्र ज्योतिसहित हो जाते हैं। आज भी तीर्थानुभाव से चैत्यमण्डप
से झरते हुए जल-सीकर यात्री लोगो के वस्त्रादि को सिक्त करता
है। प्रभु के आगे से साँप काटा मनुष्य भी उठ खडा होता है।
इस प्रकार अनेक प्रकार के प्रभाव वाले महातीर्थ का माणिक्यदेव
का यात्रा-महोत्सव व पूजा जो करते, कराते हैं, अनुमोदन करते हैं
वे लोग इहलोक और पारलौकिक सुखश्री को प्राप्त करते हैं।
श्री जिनप्रभसूरि जी द्वारा सक्षेप से वर्णित यह माणिक्यदेव
का कल्प जीवो का कल्याण करे।
श्री माणिक्यदेव तीर्थ-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रथ-सख्या
४४ अक्षर ५ हैं।
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५८. श्रीपुर-अन्तरिक्षपार्श्वनाथ-कल्प
प्रकट प्रभावशाली श्रीपुर के अलकार पार्श्वनाथ भगवान को
नमस्कार करके अतरिक्ष स्थित उनकी प्रतिमा का सक्षिप्त कल्प
कीर्त्तन करता हूँ।
पूर्वकाल मे अर्द्धचक्री प्रतिवासुदेव दगग्रीव रावण ने मालि,
सुमालि नामक अपने सेवको को कही किसी कार्य के लिए
भेजा। आकाश मार्ग से विमानारूढ़ जाते हुए उनके भोजन का
समय हो गया। पुष्प-वटुक ने सोचा—मैंने आज ऊतावल मे जिन-
प्रतिमा का करण्डिया घर पर ही भुला दिया, ये दोनो पुण्यात्मा
देव-पूजा किए बिना कही भी भोजन नही करेंगे। एवं देवपूजा के
समय करण्डिया न देखकर मुझ पर रुष्ट होगे। उसने विद्याबल
से पवित्र वालुका की नवीन भावितीर्थङ्कर पार्श्वनाथ की प्रतिमा
तैयार की। मालि-सुमालि ने पूजन करके भोजन किया। पुष्प-
वटुक ने प्रतिमा आकाश मार्ग से प्रस्थान करते समय निकटवर्ती
सरोवर के जल मे डाल दी। देवता के प्रभाव से वह प्रतिमा
सरोवर मे अखण्ड रही। कालक्रम से उस तालाब का पानी
थोडा रह गया और जल से भरे खड्डे की भाँति लगा।
कितने ही काल पश्चात् टिंगउल्ल देश के टिंगउल्ल नगर मे
श्रीपाल नामक राजा हुआ। वह सर्वाङ्ग मे कुष्ठ व्याधि से ग्रस्त
था। एक बार वह शिकार खेलने के लिए गया, वहाँ प्यास लगने
पर क्रमश. उस खड्डे पर पहुँचा। मुंह हाथ धोकर पानी पिया
तब उसका अग-अवयव कनक-कमलोज्वल नीरोग हो गया। घर
आने पर महादेवी ने राजा को देख कर साश्चर्य पूछा—स्वामिन् !
आज अपने कही स्नानादि किया ? राजा के यथास्थित कहने पर

श्रीपुर-अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प २३५
उसने सोचा—अहो ! वह दिव्य जल है। दूसरे दिन वह राजा को
वहाँ ले गई, सर्वाङ्ग-प्रक्षालन किया जिससे राजा का सारा शरीर
अभिनव हो गया। देवी ने बलि-पूजादि करके कहा—यहाँ जो
देवता हो वे अपने को प्रकट करे ।
घर आने पर रानी को देवता ने स्वप्न मे कहा—यहाँ भावी
तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा रखी हुई है, उसी के
प्रभाव से राजा को आरोग्यलाभ हुआ है। उस प्रतिमा को गाडे
मे चढाकर सात दिन के जन्मे बछडो को कच्चे सूत ततु की रस्सी
मात्र से जोत कर राजा स्वय सारथी बन कर अपने स्थान के
प्रति ले चलें। जहाँ भी राजा पीछे मुड कर देखेगे वही प्रतिमा
स्थिर हो जायगी।
राजा ने खड्डे के जल को आलोडित कर प्रतिमा प्राप्त की
और उसी प्रकार विधि करके प्रतिमा को लेकर चला । कितनी ही
दूर जाने पर राजा ने प्रतिमा आती है कि नही ? यह जानने के
लिए पीछे सिंहावलोकन किया। प्रतिमा वही आकाश मे ठहर गई,
गाडी आगे निकल गई। राजा ने अधृति से प्रतिमा को न देखकर
वही पर अपने नाम से श्रीपुरनगर वसाया, वही मन्दिर निर्माण
कराया और बडे भारी समारोह के साथ प्रतिमा प्रतिष्ठित की
गई। राजा उसकी त्रिकाल पूजा करने लगा। आज भी वह
प्रतिमा उसी प्रकार अंतरिक्ष मे ठहरी हुई है। पूर्णकाल मे बेहडे-
घडे सहित सिर पर रखे स्त्री प्रतिमा के सिंहासन के नीचे से निकल
जाती थी। कालक्रम से भूमि ऊँच हो जाने से या म्लेच्छादि दूषित
कालानुभाव से नीची-नीची होते वर्त्तमान मे केवल वस्त्र ही
प्रतिमा के नीचे से निकलता हैं। दीपकप्रभा भी सिंहासन और
भूमि के बीच दिखाई देती है।
जब वह प्रतिमा गाडी पर चढाई, तब अम्बा देवी और क्षेत्र-

२३६ विविध तीर्थ-कल्प

पाल भी प्रतिमा के साथ थे। उतावलवश अम्बा देवी के सिद्ध-
बुद्ध पुत्रो मे से एक तो देवी ने लिया और एक पीछे छूट गया ।
देवी ने क्षेत्रपाल को आज्ञा दी कि लडके को तुम ले आना ।
अतिशीघ्रता से चलते हुए वह भी नही लाया तो देवी ने ठोले से
उसके मस्तक पर प्रहार किया जो आज भी उसी प्रकार क्षेत्रपाल
के मस्तक पर दिखाई देता है।
इस प्रकार अम्बा देवी और क्षेत्रपाल द्वारा ससेवित धरणेन्द्र,
पद्मावती द्वारा कृतप्रातिहार्य वह प्रतिमा भव्य लोको द्वारा पूजी
जाती है। यात्रीगण यात्रामहोत्सव करते हैं। वहाँ प्रभु के न्हवण-
जल से सींची हुई आरती नही बुझती । न्हवण-जल से अभिषिक्त
शरीर के दाद, खाज, कुष्ठ रोगादि उपशान्त होते हैं।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ का कल्प यथाश्रुत किंचित् श्री जिन-
प्रभसूरि ने परोपकार के हेतु लिखा है।
श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक-
सख्या ४१ और ८ अक्षर हैं।

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५९. स्तम्भन-पार्श्वनाथ-कल्प शिलोञ्छ
स्तम्भन पार्श्वनाथ कल्प मे जो बातें विस्तारभय से सगृहीत
नही की उन्हे श्री जिनप्रभसूरि इस कल्प मे अंशमात्र कहते हैं।
ढक पर्वत पर रणसिंह राजपुत्र की भोपल नामक पुत्री को
रूपलावण्यसम्पन्न देख कर अनुराग उत्पन्न होने पर वासुकि ने
सेवन किया और उसके नागार्जुन नामक पुत्र हुआ । उसे पिता ने

पुत्र-स्नेहमोहित मन से सभी महौषधियो के फल, मूल और पत्ते
खिलाये जिसके प्रभाव से वह महासिद्धियो से अलंकृत सिद्ध पुरुष
के रूप मे प्रसिद्ध हुआ । वह पृथ्वीमण्डल मे घूमता हुआ राजा
सालाहण का कलागुरु हुआ । वह पादलिप्तपुर मे गगनगामिनी
विद्या-अध्ययनार्थ पादलिप्ताचार्य की सेवा करने लगा । एक बार
पादलेप के वल से उड कर अष्टापदादि तीर्थों की वन्दना कर
भोजनावसर मे स्वस्थान लौटने पर पादलिप्तसूरि के चरण-प्रक्षा-
लन के जल को चख कर वर्ण, रस, गधादि द्वारा उनके नामादि
निश्चय कर गुरु के उपदेश विना ही पादलेप करके कुर्कुट की
भाँति उडता हुआ कुएँ के तट पर जा गिरा । नागार्जुन के जर्जरित
अग को देख कर गुरु महाराज ने पूछा तो उसने यथास्थित वात
कही । सूरिजी ने उसके कौशल से चमत्कृत होकर मस्तक पर
हाथ रख कर कहा—उन औषधियो को साठी चावल के पानी के
साथ बाँट कर पादलेप करने से आकाश मार्ग मे गमन होता है ।
वह सिद्धि प्राप्त कर परितुष्ट हुआ ।
फिर कभी उसने गुरु महाराज के मुख से सुना कि—श्री
पार्श्वनाथ भगवान के सामने समस्त सुस्त्रीलक्षणयुक्त महासती
द्वारा मर्दन किया हुआ रस कोटिवेधी होता है । यह सुनकर वह
पार्श्वनाथ प्रतिमा का अन्वेषण करने मे लग गया । द्वारिका मे
समुद्रविजय दशार्ह ने श्री नेमिनाथ प्रभु के मुख से महान् अतिशय
वाली ज्ञात कर रत्नमयी श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को प्रासाद मे
स्थापित कर पूजी । द्वारिका के दाह के अनन्तर वह प्रतिमा समुद्र
मे गई और वही रही । कालान्तर मे कान्तिनगरनिवासी धनपति
नामक सेठ का जहाज देवतातिशय से स्खलित हो गया । उसने
देववाणी से निश्चय किया कि यहाँ जिन-प्रतिमा विद्यमान है ।
उसने नौका प्रक्षिप्त कर सात कच्चे सूत के तन्तु से प्रतिमा को
वाहर निकाला । उसने अपने नगर मे ले जाकर वहाँ प्रासाद मे