विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें५४. चतुर्विंशतिजिनकल्याण-कल्प
अतीत, वर्त्तमान और अनागत चौबीस जिनेश्वरो का उत्स-
र्पिणी-अवसर्पिणी मे हुए अनुलोम प्रतिलोम से पाँच भरत और
पाच ऐरवत मे स्वर्गादि से पृथ्वी पर आगमनरूप हुए च्यवन-
कल्याणक है, पच महाविदेहो शाश्वत क्षेत्रो के नही।
एकाशना, नीवी, आयंबिल और उपवास से प्रथम और दूसरे
पच कल्याणको मे से प्रथम और दूसरा एकाशना, नीवी, आयंबिल
और उपवास आदि करके सक्षेप से पच कल्याणको का अपराध
करो।
विस्तृत रूप से आराधन करने वाले को च्यवन और जन्म
कल्याणक के दिन उपवास करना तथा दीक्षादि तीन कल्याणक
जिनेश्वरो द्वारा किए हुए तप से आराधन करना चाहिए।
सुमतिनाथ भगवान नित्यभक्त से दीक्षित हुए और वासुपूज्य
स्वामी ने उपवास से दीक्षा ली। पार्श्वनाथ और मल्लिनाथ ने
अष्टम तप पूर्णक दीक्षा ली। अवशिष्ट जिनेश्वरो ने छठ्ठ भक्त
(२ उपवास) से अभिनिष्क्रमण किया।
ऋषभदेव, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ को अष्टम तप
से केवलज्ञान हुआ। वासुपुज्य भगवान को चतुर्थ भक्त से एव शेष
तीर्थंकरो को छठ्ठ भक्त से केवलज्ञान हुआ।
ऋषभदेव चतुर्थ भक्त से, महावीर स्वामी छठ्ठ भक्त से, नित्य-
भोजी सुमतिनाथ भी उपवास से सिद्ध हुए।
जिन-पथ के आराधक इस प्रकार कल्याणक तप करके विधि-
पूर्वक उद्यापन करते हैं। वे क्रमश. परम पद को प्राप्त करते हैं।
जिणपह शब्द से कर्त्ता ने अपना नाम भी दे दिया है।
१५