विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पद्मावती देवी को प्रतिष्ठित किया। वह पूर्ण भक्तियुक्त हृदय से
त्रिकाल अष्टप्रकारी पूजा करता। आज भी भुवनोदरव्यापी
माहात्म्य अमन्द लक्ष्मी वाला भगवती का भव्य मन्दिर, भव्य
जनता से पर्युपास्यमान विद्यमान है।
उस पहाडी गुफा के द्वार पर चौडा शिलापट्ट आज भी लगा
हुआ है कि जिससे उस मार्ग से सब लोग नही जा सकते क्योकि
वहाँ शिला को उघाड कर विस्तारपूर्वक पूजा करके कितनी
कला तक लोटते-रेंगते हुए जाय, उससे आगे बैठा-बैठा चले और
आगे विशेष चौडाई मे ऊँचा देवी के मन्दिरपर्यन्त जाना चाहिए।
सैकडो विघ्नो की सम्भावना और कष्ट के भय से प्राय कोई
उस गुफा के द्वार को चतुरतापूर्वक उघाडने का साहस नही करता
है। शिला से ढँके हुए मुख वाले गुफास्थान मे ही सभी श्रद्धालुगण
पद्मावती की पूजा करते हैं और सभी प्रकार की अभीष्ट सिद्धियो
को प्राप्त करते हैं। माधवराज के वंशज पुरटिरित्तमराज,
पिण्डकुण्डिमराज, पोल्लराज, रुद्रदेव, गणपतिदेव हुए हैं। गणपति-
देव की पुत्री रुद्रमहादेवी ने पैंतीस वर्ष तक राज्य किया, इसके
बाद श्री प्रतापरुद्र राजा ने राज्य किया। ये ककती ग्रामवासी
होने से काकतीय नाम से प्रसिद्ध हैं।
इस प्रकार आमरकुण्डा नामक पद्मावती का यह कल्प संक्षेप
से श्री जिनप्रभसूरि ने यथाश्रुत कहा।
श्री आमरकुण्ड पद्मावती का कल्प समाप्त हुआ। इनकी
श्लोक-संख्या ५९ और २२ अक्षर हैं।