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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 442 में से

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पृष्ठ 314

५७. कुल्पाकमाणिक्यदेवतीर्थ-कल्प
श्री कुल्पाकपुर श्रेष्ठ के मडन माणिक्यदेव ऋषभ स्वामी का
कल्प किञ्चित् सक्षेप से यथाश्रुत लिखूँगा ।
पूर्वकाल मे भरत चक्रवर्त्ती ने अष्टापद पर्वत पर अपने-अपने
वर्ण-प्रमाण-सस्थानयुक्त चौवीस तीर्थङ्करो की सिंहनिषद्या प्रासाद
मे रत्नमय प्रतिमाएँ बनवाइँ । वह मनुष्यो के लिए अगम्य होगा,
ऐसा सोचकर एक ऋषभदेव स्वामी की एक प्रतिमा लोकानु-
ग्रहार्थ स्वच्छ मरकत मणिमय, कधो पर जटायुगल, चिबुक पर
सूर्य, भालस्थल मे चन्द्र और नाभि पर शिव-लिग वाली प्रतिमा
बनवाई, जो माणिक्यदेव नाम से विख्यात हुए । कालान्तर मे यात्रा
के लिए आये हुए विद्याधरो ने उसे देखा—वह अपूर्व रूप वाली
थी । अत. विस्मित मन से विमान मे रखकर वैताढ्य पर्वत की
दक्षिण श्रेणी मे ले गए और उसकी हार्दिक भक्तिपूर्वक पूजा
करने लगे ।
एक बार नारद ऋषि भ्रमण करते हुए वैताढ्य पर्वत पर
गए । उन्होने उस प्रतिमा को देख कर विद्याधरो से पूछा—यह
कहाँ से आई ? उन्होने कहा—हम अष्टापद से लाये है । जब से
हम इनकी पूजा करते है तब से हमारी ऋद्धि दिनो-दिन बढती
जा रही है । यह सुनकर नारद ने स्वर्ग मे इन्द्र को इस प्रतिमा
का माहात्म्य कहा । इन्द्र ने स्वर्ग मे मँगा कर भक्तिपूर्वक पूजा
करनी प्रारम्भ की । उसने मुनि सुव्रत और और नमिनाथ भगवान
के अन्तराल यावन् पूजा की । इसके पश्चात् लका मे त्रैलोक्य
कण्टक रावण उत्पन्न हुआ । उसकी भार्या मन्दोदरो परम सम्यक्-
दृष्टि थी । उसने नारद से इस रत्न-विम्ब का माहात्म्य श्रवण कर
उसकी पूजा करने का गाढ अभिग्रह ले लिया । महाराजा रावण