विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ श्री कुल्पाक ऋषभदेव-स्तुति
श्री कुल्पाक प्रासाद के आभरण, सत्पुरुषो के शरण्य, माणिक्य
देव नामक श्री ऋषभदेव जिनेश्वर के नमस्कार करता हूँ ।
श्री कुल्पाकपुर लक्ष्मी के शिरोभूषण प्रासाद मे पवित्र रूप से
अधिष्ठित पृथ्वी पर माणिक्य देव नाम से प्रसिद्ध जो ऋषभदेव हैं
उनके चरणकमलो को नमस्कार करता हूँ ।
प्रसन्न चित्त वाले इन्द्र चन्द्र आदि के मुकुटो के श्रेणितट से
जिनके चरण और आसन का घर्षण होता है ऐसे तीर्थंकरो का
समूह मेरे दारुण दु.ख रूपो वृक्षो की श्रेणि को पीस डालने के
लिए मत्त गजेन्द्र हं, वे मेरे लिए गज वने ।
हेतु, उपपत्तियो से निरूपित वस्तु तत्त्व वाला, स्याद्वादपद्धति
से दुर्नय समूह को उसमे समावेश करने वाला, उत्तम सिद्धपल्ली
के लिए विपिन के समान, तीन भुवन मे पूजा का पात्र श्री जिनेन्द्र-
वचन का मै शरण लेता हूँ ।
श्री ऋषभदेव भगवान के शासन रूपी आम्रवन की रक्षिका
नवविद्रुम के समान शरीर की कान्ति वाली है । जो खेचर चक्री
(गरुड) पर चढ कर आकाश मे विचरती हैं, मनोहर चक्र हाथ
मे धारण करती है वह चक्रेश्वरी देवी कल्याणकारी हो ।