विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुल्पाक माणिक्यदेव तीर्थ-कल्प २३३
परन्तु चिरकालपर्यन्त क्षारसमुद्र-नीर के सग कठिनाङ्ग हो गई।
भगवान् माणिक्यदेव को स्वर्ग से लाये ग्यारह लाख असी
हजार नौ सौ पाँच वर्ष बीत गए। राजा ने वहाँ श्रेष्ठ प्रासाद
और देव-पूजार्थ बारह गाँव दिए। विक्रम सवत् ६८० पर्यन्त
भगवान् अन्तरिक्ष स्थित रहे। फिर म्लेच्छो का प्रवेश ज्ञात कर
सिंहासन पर विराजमान हुए। यह प्रतिमा अपनी अपूर्व कान्ति से
भव्य जीवो के नयनो मे अमृत वर्षा करती है।
क्या यह प्रतिमा टकोत्कीर्णित है या खान से लायी हुई है ?
क्या नागकुमार ने घडी है ? यह वज्रमय है या नीलमणिमय है ?
निश्चय नही किया जाता। कदलीस्तम्भ जैसी दिखाई देती है।
आज भी भगवान के न्हवण-जल से दीपक जलता है। आज भी
न्हवण-जल से मिट्टी को भिगो कर अन्धे की आँखो पर बाँधने से
नेत्र ज्योतिसहित हो जाते हैं। आज भी तीर्थानुभाव से चैत्यमण्डप
से झरते हुए जल-सीकर यात्री लोगो के वस्त्रादि को सिक्त करता
है। प्रभु के आगे से साँप काटा मनुष्य भी उठ खडा होता है।
इस प्रकार अनेक प्रकार के प्रभाव वाले महातीर्थ का माणिक्यदेव
का यात्रा-महोत्सव व पूजा जो करते, कराते हैं, अनुमोदन करते हैं
वे लोग इहलोक और पारलौकिक सुखश्री को प्राप्त करते हैं।
श्री जिनप्रभसूरि जी द्वारा सक्षेप से वर्णित यह माणिक्यदेव
का कल्प जीवो का कल्याण करे।
श्री माणिक्यदेव तीर्थ-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रथ-सख्या
४४ अक्षर ५ हैं।
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