विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकन्नाणयन महावीर कल्प-परिशिष्ट २१९
मे पाँचो दर्शनी लोग किंकर की भाँति सपरिवार लौटते हैं । गुरु
महाराज के वचनो की प्रतीक्षा मे प्रतीक्षित रहते हैं । गुरु महाराज
के दर्शनो के उत्सुक इह—परलोक कार्यार्थी परतीर्थिक लोग दर-
वाजे पर स्थित रह कर निरन्तर सेवा करते हैं । गुरु महाराज
नरेश्वर की अभ्यर्थना से नित्य राजसभा मे जाते हैं और वन्दी
वर्ग को मुक्त कराते हैं ।
सच्चारित्र वाले सूरि महाराज अपनी उच्च कोटि की चर्या
मे प्रवृत्त रह कर पद-पद पर धर्म-प्रभावना करते हुए जिनोक्त युक्ति-
युक्त वचनो से निरन्तर नरेश्वर के मन मे कुतूहल उत्पन्न करते
हैं । गगाजल की भाँति स्वच्छ चित्त वाले वे अपनी यशश्चन्द्रिका
द्वारा अन्तराल को धवलित करते हैं । उनके वचनामृत से जीव
लोक उपजीवित है । स्वदर्शनी व परदर्शनी लोग समग्र व्यापार मे
आज्ञा शिरोधार्य करते है । युगप्रधान प्रभु स्व पर सिद्धान्तो की
अनन्य असाधारण भंगिमा से व्याख्या करते हैं ।
इस प्रकार धर्म-प्रभावनाप्रकारो से परिभाव्यमान पवाडे—
कीर्त्ति जिनके नित्य ही वर्त्तमान है ऐसो अपरिमित कीर्त्ति को अल्प-
मति कैसे कह सकते हैं ?
ये सूरि महाराज करोडो वर्ष जीवे, जिन-शासन की चिरकाल
प्रभावना करे ।
कन्नाणय महावीर कल्प के परिशिष्ट रूप मे श्री जिनप्रभ
सूरिजी के प्रभावना अगो की यह गुणस्तुति लेशमात्र—सक्षेप मे
कही गई है ।