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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 442 में से

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पृष्ठ 306

आमरकुण्ड पद्मावतीदेवी-कल्प २२३
पुस्तक ले कर वह छात्र अपने आचार्य के पास आ गया। वहाँ का
सारा स्वरूप निवेदन कर पुस्तक आचार्य को दे दी। क्षपणक
गणाधिपति बोले—भइ वह स्त्री मात्र नही, किन्तु वह भगवती
पद्मावती देवी है। इसलिए जाओ और मनोहर पद्य लिखा हुआ
यह पत्र उन्हे दिखलाओ।
गुरु के आदेशानुसार वह छात्र शीघ्र ही मठ मे लौटा और
उस देवी को वह पत्र समर्पण कर आगे खडा रहा। देवी ने उस
पत्र को पढ़ा। यथा—“आठ हजार हाथी, नव कोटि पदाति, इतने
ही रथ तथा घोडे एव एक लाख मुद्राओ का कोष इसे दीजिये!”
भगवती ने भी पद्यार्थ को समझ कर उस शिष्य को एक चतुर
घोडा दिया और बोली—आप इसके ऊपर चढ कर जाओ, जो
इस पत्र मे लिखा है वह सब तुम्हारे पीछे ही आ जायगा।
केवल पहाडी मार्ग से तुम जाना और पीछे मत देखना।” ऐसा
उसका वचन “ऐसा ही होगा” कहते हुए स्वीकार कर कृत्य को
समझने वाला वह पहाड की गुफा मे अश्वसहित प्रवेश कर गया
और बारह योजन तक चलता रहा। इसके वाद आते हुए
हाथियो के समूह की घटाओ से रणत्कार की तुमुल और जोर की
ध्वनि सुनकर वह छात्र उतावल से कुतूहलपूर्वक पीछे मुडकर
सिंहावलोकित न्याय से देखने लगा। उसने हाथी, घोडे आदि
समूह से परिपूर्ण सेना को देखा और विस्मय रसमय हृदय वाला
होने से वही पर बारह योजन वाद जिस घोडे पर चढा था वह
घोडा ठहर गया। तदनन्तर परम जैन श्री माधवराज ने सेना
से घिरे हुए वही नगर वसा कर उसमे देवी का भुवन वनवाया,
फिर आमरकुण्ड नगर मे आकर भूपालमौलि लालित्य वाली
राज्यलक्ष्मी का पालन किया। उसे स्वर्ण-कलश, दण्ड, ध्वज से
शोभायमान गगनचुम्बी शिखर वाले प्रासाद का निर्माण कराया
और उसमे चित्रीयमान नमस्कार करते हुए मनुष्ययुक्त श्री