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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 442 में से

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पृष्ठ 315

ने यह वृत्तान्त ज्ञात कर इन्द्र की आराधना की। उसने सन्तुष्ट
होकर वह प्रतिमा महादेवी को समर्पित की। वह प्रसन्नतापूर्वक
त्रिकाल पूजा करने लगी।
एक वार रावण ने सीतादेवी का अपहरण किया और
मदोदरी के समझाने पर भी उसने उसे नही छोडा तो प्रतिमा के
अधिष्ठायक ने स्वप्न मे मन्दोदरी को लंका का भग और गवण
का विनाग वतलाया। उसने उस प्रतिमा को समुद्र मे डुवा दिया
वहाँ देवो द्वारा पूजा होने लगी।
अब कन्नड देग के कल्याणनगर मे गकर नामक जिनेन्द्र-
भक्त राजा हुआ। किसी मिथ्यात्वी देव ने उसके राज्य मे कुपित
होकर महामारि रोग पैदा कर दिया। राजा चिन्तित हुआ।
पद्मावती देवी ने उसे दुखी देखकर रात्रि मे स्वप्न मे कहा-
महाराज ! यदि समुद्र मे से माणिक्यदेव को अपने नगर मे लाकर
पूजा करो तो कल्याण हो। तब राजा ने समुद्र तट पर जाकर
उपवास किया। सन्तुष्ट लवण-समुद्र के अधिष्ठाता ने प्रकट होकर
राजा से कहा- इच्छानुसार रत्न ग्रहण करो। राजा ने कहा-
राजा ने कहा- मुझे रत्नादि से प्रयोजन नही, मन्दोदरी की
स्थापित प्रतिमा दो। देव ने प्रतिमा निकाल कर राजा को समर्पित
की और कहा-तुम्हारे देश के लोग सुखी होगे, परन्तु मार्ग
चलते जहाँ तुम्हे सन्देह हो, वही प्रतिमा स्थापित कर देना।
राजा ने यह वात मान ली। देवता के प्रभाव से वछडो की जोडी
पर जुते हुए गाडे मे विराजमान विम्ब आने लगा। दुर्गम मार्ग
को उल्लघन कर राजा के मन मे सगय हुआ कि भगवान आते हैं
कि नही ? तब शासनदेवी तिलग देश कुल्पाक नगर - जो पण्डितो
द्वारा "दक्षिण वाराणसी" नाम से प्रसिद्ध है- मे प्रतिमा को
स्थापित किया। पहले यह अत्यन्त निर्मल मरकतमणि की थी,