विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके ऊपर परिणाह आरोहशाली श्री ऋषभदेव और शान्ति-
नाथादि प्रतिमाओ से अलंकृत मनुष्यो के मन को प्रसन्न करने
वाले शुभ प्रासाद शोभायमान है । वहाँ एक पवित्रतर और पार-
गत भवन मे छद्म से मुक्त मन वाले विषय-सुखो से जिनका हृदय
जरा भी क्षुभित नही होता था और अपनी कृपा से सहृदय के
हृदयो को आह्लादित करने वाले थे, ऐसे कामदेव को जीतने
वाले और विस्मयकारी चारित्र-आचरण से वश की गई पद्मावती
से लब्ध-प्रतिष्ठ मेघचन्द्र नाम के दिगम्बर आचार्य थे, जिनकी
सेवा अनेक लोग करते थे । वे एक बार श्रावक गोष्ठी को कह
कर दूसरे स्थान पर विचरने के लिए प्रस्थान कर गये । ज्यो ही
कितनी भूमि चले, अपने अस्तालकार पुस्तक नही देखी तब
उन्होने कहा—अहो ! हम कैसे प्रमादी हैं कि अपने हाथ की
पुस्तक भी भूल गये । ऐसा क्षणमात्र विषाद कर के शीघ्र ही
माधवराज नामक क्षत्रियजातीय एक छात्र को पुस्तक लाने के
लिए वापस भेजा । वह सरल बुद्धि वाला छात्र लौट कर ज्यो ही
मठ मे प्रवेश करता है त्यो ही एक अद्भुत रूप-कान्ति वाली स्त्री
उस पुस्तक को उरु पर रखे बैठी थी, देखा । ज्यो ही वह निर्भीक
और अक्षुब्ध चित्त से उस पर रखी हुई उस पुस्तक को लेने लगा
त्यो ही वह वरवर्णिनी उस पुस्तक को अपने कन्धे पर धारण
किये हुए है ऐसा देखा । इसके बाद वह विद्यार्थी "यह मेरी माता
के समान है" ऐसा सोच कर उसकी जंघाओ पर भी पाँव दे कर
उसके स्कन्ध से पुस्तक को लेने लगा । तब उस स्त्री ने देखा कि
यह व्यक्ति राज्य के योग्य है ऐसा सोच कर हाथ पकड लिया और
बोली—वत्स ! तुम कुछ वर माँगो । वह मैं तुम्हे दू ! मैं तुम्हारे
साहस से तुष्ट हुई हूँ । शिष्य ने कहा—ससार मे एकमात्र वन्द्य मेरे
गुरु मुझे सब प्रकार के अभिरुचित अर्थ को देने मे समर्थ ही है,
इसलिए हे शुभवती ! मैं आपसे क्या मांगू ? ऐसा कह कर और