विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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सभी जिनेश्वरो के च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवल और मोक्ष ये
पच कल्याणक हुए हैं, किन्तु भगवान महावीर के गर्भापहारसहित
छ कल्याणक हैं।
इन क्षेत्रो मे होने वाले जिनेश्वरो के पंचकल्याणंक जिसने
आराधन किए उसने दश क्षेत्रो मे होने वाले तीन काल के अर्हन्तो
की उपासना की।
भव्यजनो के मन के अभीष्ट संकल्पो को पूर्ण करने वाले इस
˙चकल्याणक तप को जो भव्य पढते सुनते है उन्हे सिद्धिश्री
अवश्य वरण करती है।
इसकी ग्रन्थ संख्या १३१ अक्षर १५ है।
५५. तीर्थंकर अतिशय-विचार
पहले चार सहज अतिशय, उसके बाद घाती कर्मो के क्षय मे
ग्यारह अतिशय और देवकृत १९ अतिशय होते हैं। इस प्रकार
कुल ३४ अतिशय हुए। इनमे अपायापगम अतिशय, ज्ञानातिशय,
वचनातिशय और पूजातिशय का समावेश हो जाता है।
ग्रन्थसंख्या २ अक्षर ७ है।