विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पति और सघ ने महोत्सव किये । भाट-भोजक आदि लोगो का
वस्त्र-भोजन-ताम्बूलादि से पूजा सत्कार किया ।
गुरु महाराज ने यात्रा से लौटते ही मिती वैगाख गुक्ल १०
के दिन समस्त दुरित नागक श्री महावीर स्वामी के विम्ब की
महोत्सव पूर्वक स्थापना की । वादशाह के बनवाए हुए मन्दिर मे
सघ के द्वारा वहाँ पूजा की जाती है । सुलतान के दिगयात्रा से
आने पर मन्दिर मे विगेप उत्सव प्रवर्त्तित होते हैं । सार्वभौम
सम्राट उत्तरोत्तर अधिकाधिक मान दे कर गुरु महाराज को
सम्मानित करता है । सूरिसार्वभौम श्री जिनप्रभसूरि की धर्म-
प्रभावना का यशपटह सर्व दिगाओ मे वजता है । राजाधिराज
के दिए हुए फरमान हाथ मे होने से श्वेताम्बर-दिगम्बर सर्व देश
मे विना किसी उपसर्ग वाधा के विचरण करते हैं । यवन सैन्य
परिभूत दिग् चक्र किये होने पर भी खरतर गच्छालकार गुरु
महाराज के प्रसाद से फरमान ग्रहण करते शत्रुञ्जय-गिरनार-
फलौदी आदि तीर्थ निर्भय-निरापद हुए । इस प्रकार के धर्मकृत्यो
से श्री पादलिप्तसूरि-मल्लवादी-सिद्धसेन दिवाकर-हरिभद्रसूरि-हेम-
चन्द्रसूरि आदि पूर्वाचार्यों को उद्योतित किया । अधिक क्या कहा
जाय, सूरिचक्रवर्त्ती गुरु महाराज के गुणो से खिचे हुए नरेन्द्र भो
सकल धर्म कार्यारम्भ मे प्रवर्त्तन करता था ।
चैत्य-वसतियो मे प्रति प्रात काल शखध्वनि वजती रहती है ।
धार्मिक लोगो द्वारा वीरविहार मे मादल, मृदङ्ग, भुगल, ताल
वजते हुए प्रेक्षणीय महापूजाएँ की जाती हैं । भगवान महावीर के
आगे भव्य लोग कर्पूर, अगर, परिमल युक्त धूप दे कर उसकी
भुगन्ध दिगमंडल मे व्याप्त करते हैं । हिन्दू राज्य के समान
सचरण करते हैं । इस पचम काल और अनार्य राज्य मे भी चतुर्थ
आरे की भाँति जो जिन-गासन की प्रभावना होती है वह गुरु-
गिक्षा का ही प्रभाव है । और तो क्या ? गुरु महाराज के चरणो