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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

कुमारी पर्यन्त उत्तर-पश्चिम मे तक्षशिला से लेकर पूर्वीतटवर्ती
भुवनेश्वर पर्यन्त, और उत्तर-पूर्व मे असम एवं बागला देश से
लेकर पश्चिमी समुद्रतट पर्यन्त इस महादेश भारतवर्ष मे बिखरे
पड़े हैं। देश का कोई राज्य, प्रान्त या प्रदेश ऐसा नही है जिसमे
एक या एक से अधिक जैन तीर्थ विद्यमान न हो। अनेक प्राचीन
तीर्थ विच्छिन्न अथवा विस्मृत भी हो गये और उनके स्थिति-स्थल
को खोजना या चीन्हना दुष्कर हो गया है। कई की स्थिति या
पहचान के विषय मे मतभेद उत्पन्न हो गये और एकाधिक स्थानो
से उनकी चीन्ह की जाने लगी। ऐसे भी अनेक तीर्थ हैं जो गत
साधिक एक सहस्र वर्ष के बीच ही—पूर्व मध्यकाल एव मध्यकाल
मे ही उदय में आये अथवा प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
जिन तीर्थों की यात्रा का क्रम अविच्छिन्न बना रहा, उनकी
स्थिति निर्भ्रान्त बनी रही, उनका अल्पाधिक विकास भी होता
रहा और संरक्षण भी हुआ। किन्तु काल-दोष से—अनेक राज-
नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक आदि कारणो से कई
तीर्थों की यात्रा विच्छिन्न हो गई और वे विस्मृति के गर्भ मे
विलीन होते गये। ऐसी दशा मे तीर्थविषयक साहित्य ही ऐसा
आधार रह गया जिसके द्वारा अधुना अज्ञात या विस्मृत तीर्थो का
नाम जीवित रहा और ज्ञात तीर्थों के सम्बन्ध मे भी अनेक ऐसे
तथ्य एवं वृत्त सुरक्षित रह सके जिन्हे लोकमानस ने विस्मृत
कर दिया था और जिनके सत्यापन का भी अब प्राय कोई उपाय
नही रह गया है।
मूल प्रतिक्रमण पाठ के विसीहदण्डक मे, कुन्दकुन्द कृत प्राकृत
भक्तियो एवं निर्वाणकांड मे, पूज्यपादीय सस्कृत भक्तियो मे यति-
वृषभकृत तिलोयपण्णत्ति मे, आगमसूत्रो और उनकी निर्युक्तियो,
चूर्णियो, भाष्यो, टीकाओ मे, पुराण एवं कथा साहित्य मे, पट्टा-

विविध तीर्थ-कल्प
वलियो-गुर्वावलियो मे, तथा शिलालेखो मे परम्परागत तीर्थों के
विषय में अनेक फुटकर ज्ञातव्य प्राप्त होते हैं । परन्तु, तीर्थों के
विषय में स्वतन्त्र रचनाएँ, यथा चैत्यवन्दन स्तोत्र, तीर्थविशेषों
के माहात्म्य, तीर्थकल्प, तीर्थमालाएँ आदि मध्यकाल में ही रची
गयीं । मदनकीर्त्ति ( लगभग १२४० ई० ) कृत शासनचतुस्त्रि-
शिका, उदयकीर्त्तिकृत निर्वाणभक्ति, प्रभाचन्द्रसूरि कृत प्रभावक-
चरित्र ( १२७७ ई० ) मेरुतुंग की प्रबन्धचिन्तामणि (१३०५ ई०)
जिनप्रभसूरिका कल्प-प्रदीप ( १३३२ ई० ), राजशेखरसूरिकृत
प्रबन्धकोश ( १३४८ ई० ), हंससोम की पूर्वदेशीय चैत्य-परिपाटी
( १५०८ ई० ), वर्धमानकृत दशभक्त्यादि संग्रह ( १५४२ ई० ),
ब्र० ज्ञानसागर की तीर्थावली ( १५५० ई० लगभग ), विजय-
सागर की तीर्थमाला ( १६०७ ई० ), भ विश्वभूषणकृत सर्वत्रै-
लोक्य जिनालय-जयमाला . ( १६६५ ई० ), शीलविजयगणी की
तीर्थमाला १ ( १६८९ ई० ), महेश्वरसूरि का शत्रुञ्जय-माहात्म्य
( १७०० ई० ), गुणभद्रकृत तीर्थार्चनचन्द्रिका ( ल १७५० ई० ),
देवदत्त दीक्षित के सम्मेदाचल माहात्म्य एवं स्वर्णाचल माहात्म्य
( १७८८ ई० ), प्रभृति इस प्रकार की प्रमुख ज्ञात रचनाएँ हैं ।
कई अन्य ( गिरनार आदि ) तीर्थों के माहात्म्य, कई एक तीर्थों के
पूजापाठ, जयमाला, स्तवन आदि, पं० भगवतीदास कृत अर्गलपुर-
जिनदेवता ( १५९४ ई० ) जैसे स्थानीय विवरण भी प्राप्त होते
हैं । वर्तमान शताब्दी में जैन तीर्थक्षेत्रों के जो अनेक विवरण-विवे-
चन प्रकाशित हुए हैं, वे ज्ञात एवं मान्य तीर्थों के वर्तमान रूप,
१ मुनि विजयधर्म सूरि ने स्वसम्पादित 'प्राचीन तीर्थमाला संग्रह'
( १९२१ ई० ) में ऐसी २५ तीर्थमालाओं का संग्रह प्रकाशित किया
था । चैत्य-वन्दन स्तोत्रों के लिए देखिए शोधांक नं० २४
पृ १३९-१४१ पर हमारा लेख ।

तत्संबंधी अनुश्रुतियों एवं किंवदंतियों और उपरोक्त मध्यकालीन
तीर्थ-साहित्य के आधार पर ही लिखे गये हैं। १ इस विषय में
सन्देह नहीं है कि उक्त मध्यकालीन रचनाओं में आचार्य जिन-
प्रभसूरि कृत कल्पप्रदीप (विविध तीर्थ-कल्प) अनेक दृष्टियो से
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
आचार्य जिनप्रभसूरि अपने युग के महान शासन प्रभावक
आचार्य थे। गुजरात के मोहिलवाड़ी ग्राम निवासी, श्रीमाल
ज्ञातीय, ताम्बीगोत्रीय श्रावक महाधर के पौत्र और रत्नपाल एवं
सेतलदेवी के कनिष्ठ सुपुत्र सुभटपाल के रूप में १२६१ ई० के
लगभग उनका जन्म हुआ था। ग्यारहवीं शती ई० के प्रथम पाद
मे आचार्य जिनेश्वरसूरि (प्रथम) द्वारा संस्थापित खरतरगच्छ के
अष्टम आचार्य जिनेश्वरसूरि द्वितीय (१२२१-१२७४ ई०) थे।
उनके समय मे खरतरगच्छ दो शाखाओं मे विभक्त हो गया—
वृहत्शाखा के आचार्य उनके पट्टशिष्य जिनप्रबोध सूरि हुए, और
दूसरे शिष्य, जिनसिंह सूरि, लघुशाखा के प्रथम आचार्य हुए।
इन्ही जिनसिंह सूरि (१२२३-१२८४ ई०) के निकट सुभटपाल ने
मात्र आठ वर्ष की बालवय मे जिनदीक्षा ली और धर्मतिलक नाम
प्राप्त किया। गुरु के सान्निध्य मे मनोयोग से विद्याभ्यास करके
कुछ ही वर्षों मे वह इतने बहुविज्ञ विद्वान हो गये कि उपाध्याय
पद प्राप्त कर लिया और मात्र २३ वर्ष की आयु मे, १२८४ ई०
मे जिनप्रभसूरि नाम से आचार्य पद पर आसीन होकर गुरु के
पट्टधर हुए। इस प्रकार लघु खरतर शाखा के वह द्वितीय और

१ स्व प नाथूराम प्रेमी ने अपने 'जैन साहित्य और इतिहास'
(द्वि स, १९५६) में पृ ४२२ से ४७७ पर्यन्त 'हमारे तीर्थक्षेत्र,'
'दक्षिण के तीर्थक्षेत्र' और 'तीर्थों के विवाद' शीर्षको से जैन तीर्थों
के विषय में अत्युत्तम ऊहापोह एवं विवेचन किया हैं।

करने मे इस ग्रन्थ का उपयोग हुआ है । लगभग एक सौ वर्ष पूर्व
पीटरसन ने सस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्थो की अपनी चतुर्थ रिपोर्ट
मे विविध तीर्थ कल्प का उल्लेख किया था; एस पी पडित ने
वाक्पतिकृत प्राकृत काव्य 'गउडवहो' के स्वसम्पादित सस्करण
की भूमिका मे विविध तीर्थ-कल्प के मथुरापुरी कल्प मे वर्णित
बप्पभट्टिसूरि एव आमराज के प्रसग का उल्लेख किया था, डा०
वुहलर ने मथुरा के स्वसपादित शिलालेखो की प्रस्तावना मे तथा
'ए लीजेन्ड आफ दी जैना स्तूप एव मथुरा' ( १८९७ ई० ) मे
उसका उपयोग किया है । कालान्तर मे प नाथूराम प्रेमी, डा०
वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रो० कृष्णदत्त वाजपेयी, नाहटा जी,
स्वयं हमने, तथा अन्य अनेक विद्वानो ने जिनप्रभसूरि के विविध
तीर्थ-कल्प का उपयोग किया है ।
अन्त्य प्रशस्ति के अनुसार यह ग्रन्थ 'भूमडल के इन्द्र (अधिपति
या स्वामी) श्री हम्मीर महम्मद ( अमीर अर्थात् सुलतान, मुहम्मद
विन तुगलुक ) के राज्य मे, योगिनीपत्तन ( योगिनीपुर, दिल्ली )
मे भाद्रपद कृष्ण दशमी बुधवार, विक्रम सवत् १३८९
( सन् १३३२ ई० ) मे पूर्ण हुआ था । अनुष्टुप्मान से इसका श्लोक
परिमाण ३५६० था । ग्रन्थ मे कुल ६२ कल्प या प्रकरण सकलित
है, जिनमे से केवल ६ के अन्त मे उनकी रचना-तिथि दी गयी है—
वैभारगिरि-कल्प—क्रमांक ११ (१३०७ ई०), शत्रुजय तीर्थ-कल्प—
क्रमांक १ ( १३२८ ई० ), ढिपुरीस्तव-क्रमांक ४४ ( १३२९ ई० )
अपापा वृहत्कल्प—क्रमांक २१ ( १३३० ई० ), हस्तिनापुर तीर्थ
स्तवन—क्रमांक ५० (१३३१ ई०), और श्री महावीरगणधर-कल्प—
क्रमांक ३९ ( १३३२ ई० ) । शेष कल्पो मे उनकी रचना की
तिथि सूचित नही की गई है । किन्तु कुछ कल्पो की रचना-तिथि
अनुमान की जा सकती है, उनमे दिये गये संदर्भों के आधार पर,

प्रस्तावना · १५
यथा सत्यपुर-साचौर तीर्थ कल्प ( न० १७ ) १३१० ई० के वाद
कभी रचा गया है, अर्बुदगिरि कल्प ( न० ८ ) १३२१ ई० के
उपरान्त रचा गया, और कन्यानयननीय महावीर प्रतिमा कल्प
( न० २२ ) १३२८ ई० के उपरान्त, सम्भवतया १३३१-३२ ई० मे
रचा गया। इस कल्प का पूरक ( न० ५१ ) तो आचार्य के देहान्त
के पर्याप्त समय बाद रचा गया प्रतीत होता है—उसे उनके विद्या-
शिष्य संघतिलक सूरि के पट्टधर विद्यातिलक अपर नाम सोम-
तिलक सूरि ने रचा था, जिनके कुमारपालप्रबन्ध का रचनाकाल
१३६७ ई० है। अस्तु, कल्प-प्रदीप के विभिन्न कल्पो की रचना
आचार्य ने १३०७ से १३३२ ई० पर्यन्त लगभग २५ वर्षा के बीच
की थी। दो-चार की रचना १३०७ के पूर्व भी की गयी हो सकती
है। रचना-स्थलो मे न० १ और २२ दिल्ली मे रचे गये प्रतीत
होते हैं, न० २१ देवगिरि मे रचा गया और न० ५० हस्तिनापुर
में। शेष मे से कुछ विवक्षित तीर्थ स्थानो पर भी रचे गये हो
सकते हैं और अन्यत्र भी। भाषा की दृष्टि से २२ कल्प सस्कृत मे
और शेष प्राकृत मे रचित हैं।
पुस्तकगत कुल ६३ कल्पो मे एक तो अन्त्य प्रशस्ति के रूप
मे है, एक ( न० ४५ ) मे ८४ तीर्थो की सूची है, कई कल्प
स्तवन-स्तोत्र आदि के रूप मे हैं, नन्दीश्वर द्वीप जैसे मिथिक
स्थलो के तथा अष्टापदⁿ जैसे अनिश्चित आकार-प्रकार व स्थिति
के तीर्थों के भी कल्प है। कई तीर्थों पर एकाधिक कल्प रचे हैं,
यथा उज्ज्यन्त ( रैवतगिरि या गिरनार ) पर चार, प्रतिष्ठान पर
तीन और पावापुरी, ढीपुरी, हस्तिनापुर, अष्टापद, एव स्तभनक

ⁿ इस पर्वत की ऊँचाई ८ योजन (लगभग १०० किलोमीटर) और
स्थिति अयोध्या से १२ योजन (लगभग १५० कि० मी०) उत्तर में
[···]—इन दोनो ही बातो का प्राचीन परम्परा से सम्बन्ध है।

१२ विविध तीर्थ-कल्प
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आचार्य हुए। वह एक बहुभाषाविज्ञ, विविध
विषयनिष्णात, अनेक दीक्षाशिष्यो एव विद्याशिष्यो के गुरु, विपुल
साहित्य-प्रणेता, तीर्थोद्धारकर्त्ता, महान प्रभावक एव राज्य मान्य
जैनाचार्य थे। उनके द्वारा रचित साहित्य मे व्याकरण, कोष,
अलकार, मन्त्रशास्त्र, तीर्थपरिचय, खण्डन-मडन, वैधानिक
रचनाएँ, चरित्र काव्य, स्तोत्र-स्तवन, आगमिक एव अन्य टीकाएँ
आदि, सस्कृत और प्राकृत, गद्य एव पद्य की सैकडो कृतियाँ है।
अकेले स्तोत्र ही उन्होने ७०० रचे थे, ऐसी अनुश्रुति है। उनमे से
लगभग ८५ तो अद्यावधि उपलब्ध है। संकीर्ण साम्प्रदायिक
मनोवृत्ति से वह ऊपर थे। यही कारण है कि श्वेताम्बर सम्प्रदाय
के एक ( खरतर-लघु ) शाखागच्छ के प्रधान आचार्य होते हुए भी
कई अन्य गच्छो के साधु उनके प्रिय विद्याशिष्य थे। दिगम्बरो के
साथ भी उनका अच्छा सद्भाव था, और जैनेतरो मे हिन्दुओ के
प्रति ही नही, मुसलमानो के साथ भी उनका समुचित सद्भाव
रहा। अतएव जनता के प्राय सभी वर्गो से उन्होने आदर प्राप्त
किया। वह ऐसे युगचेता, समयानुसारी प्रवृत्ति के पारखी और
अवसर का लाभ उठाने मे पटु थे कि दिल्ली के तुर्क सुलतान
मुहम्मद बिन तुगलुक की उदार मनस्विता, विद्यारसिकता एव
दार्शनिक रुझान का लाभ उठाकर उन्होने उससे सम्पर्क साधा,
अपने चरित्र एवं प्रतिभा से उसे प्रभावित किया और उससे प्रभूत
सम्मान प्राप्त किया। इतना ही नही, सुलतान की प्रसन्नता का
का उपयोग उन्होने जिन-शासन की प्रभावना, जिन-मन्दिरो,
मूर्त्तियो और तीर्थों के सरक्षण तथा तीर्थों की ससघ यात्राओ के
लिए कई शाही फर्मान प्राप्त करने मे किया। धर्म-प्रभावना के
अपूर्व उत्साह मे उन्होने अपनी वृद्धावस्था, अस्वास्थ्य तथा जैन-
मुनि के वर्षावास आदि नियमो की भी परवाह नही की। इस
सुलतान के साथ उनका सम्पर्क चार-पाँच वर्ष ही रह पाया।

प्रस्तावना १३
१३२८ मे वह सर्वप्रथम उसके सम्पर्क मे आये और संभवतया
१३३३ ई० मे, लगभग ७२ वर्ष की आयु मे दिल्ली मे ही दिवंगत
हो गये थे ।१
विविध तीर्थ-कल्प, जिसका अपर, वल्कि मूल, नाम 'कल्प-
प्रदीप' है,२ आचार्य जिनप्रभसूरि की छोटी-बड़ी शताधिक रचनाओ
मे अनेक दृष्टियो से सर्वोपरि महत्त्व रखता है। लोक मे उनकी
प्रसिद्धि मुख्यतया इसी ग्रन्थ के कर्त्ता के रूप मे है। जैन विद्वानो
के अतिरिक्त अनेक जैनेतर प्राच्यविद एवं इतिहासकार भी उससे
परिचित हुए हैं, और इसमे चर्चित तीर्थों के विवेचन मे तथा उसमे
उल्लिखित कतिपय अनुश्रुतियो की ऐतिहासिकता पर ऊहापोह
१ आचार्य जिनप्रभसूरि का संक्षिप्त-जीवन परिचय मुनि जिनविजय जी
द्वारा सम्पादित एव सिंधी जैन ग्रन्थमाला, कलकत्ता से १९३४ ई०
में प्रकाशित 'विविध तीर्थ-कल्प' (मूल) की भूमिका में, श्री अगरचन्द
नाहटा द्वारा 'विविध मार्ग-प्रपा' के प्रारम्भ में, तथा श्री लालचन्द-
भगवान गांधी की गुजराती पुस्तक 'जिनप्रभसूरि अने सुलतान
मुहम्मद' में प्राप्त होता है। श्री अगरचन्द नाहटा द्वारा १९७५ में
प्रकाशित एव महोपाध्याय विनयसागर जी द्वारा लिखित पुस्तक
'शासन प्रभावक आचार्य जिनप्रभ और उनका साहित्य' में तो
आचार्य के जीवनवृत्त, गुरु-शिष्यपरम्परा, व्यक्तित्व, सुलतान
मुहम्मद तुगलक के साथ उनके सम्बन्धो, उनके चमत्कारो और
प्रभावक कार्यों तथा उनकी साहित्यिक कृतियो पर विस्तारपूर्वक
विचार किया गया है।
२. ग्रन्थ की अन्त्य प्रशस्ति में 'कल्पप्रदीपनामायं ग्रन्थो विजयतां
चिरम्', तथा उसके उपरान्त दी हुई पुष्पिका में 'इति श्रीकल्प-
प्रदीप ग्रन्थ समाप्त' रूप से स्वयं ग्रन्थकार ने अपनी कृति का
नाम 'कल्पप्रदीप' ही सूचित किया है।

१६ | विविध तीर्थ-कल्प


मे से प्रत्येक पर दो-दो। कन्यानयन-महावीर पर दूसरा कल्प
( न० ५१ ) तथा पंचकल्याणक स्तवन ( न० ५६ ) अन्यकर्तृक
हैं। इस प्रकार कुल केवल ३६ विभिन्न तीर्थ स्थानो के कल्प इस
ग्रन्थ मे प्राप्त हैं। आचार्य ने कर्त्तारूप मे अपना नाम अथवा
सकेत १९-२० कल्पो मे ही किया है। सभावना यही है कि शेष
भी उन्होने ही रचे होगे, किन्तु यह निश्चयपूर्वक कहना कठिन है
कि उनमे से कोई भी भिन्नकर्तृक नही है। कल्प न० ४५ मे
तन्त्र के जानकारो से प्राप्त सूचना के आधार पर जिन प्रसिद्ध
८४ तीर्थों की सूची दी हैं, उसके विषय में स्वयं स्वीकार किया है
कि 'इनमे से कुछ ही देखे हैं, शेष के विषय में सुना है।' इस सूची
मे एक-एक तीर्थ का कई बार उल्लेख हुआ है, एक स्थान से
सम्बधित कई तीर्थों का भी पृथक्-पृथक् उल्लेख किया है, और
कई तीर्थ, यथा क्रौंचद्वीप, हंसद्वीप, लका, पाताल लका, त्रिकूट
गिरि, कैलाश, अष्टापद आदि भारतवर्ष के बाहर हैं। जैन परम्परा
मे मान्य सभी तीर्थ इस सूची मे समाविष्ट नही हैं, और अधिकांश
तीर्थ अतिशय क्षेत्र हैं।

जिन विभिन्न वास्तविक ३६-३७ तीर्थ स्थानो का परिचय
आचार्य ने इस कल्प-प्रदीप मे दिया है वे गुजरात, राजस्थान,
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब-हरियाणा, विहार, महाराष्ट्र,
आन्ध्र और कर्नाटक जैसे विभिन्न प्रदेशो मे अवस्थित है। उनमे
से अधिकतर ऐसे है जिनको आचार्य ने स्वयं यात्रा की लगती है,
और कई ऐसे हैं जिनकी यात्रा तो वे नही कर पाये किन्तु उनके
विषय मे जैसा जाना-सुना, लिख दिया है। जिन तीर्थों को
उन्होने स्वयं देखा उनके विषय मे तो बहुत कुछ जैसा देखा
वैसा लिखा, साथ ही स्थानीय किवदंतियो अथवा पूर्ववर्ती
साहित्यिक या मौखिक अनुश्रुतियो से जो जाना, वह भी लिख

दिया। ऐसी स्थिति मे कल्प के अन्त मे बहुधा यह भी स्पष्ट
सकेत कर दिया कि 'जैसा सुना या जाना है, वैसा लिखा है !'
अनेक बार तत्कालीन वस्तुस्थिति, ऐतिहासिक तथ्य, दंतकथाओ
आदि पर आधारित सूचनाएं, विशेषकर स्थान या प्रतिमा विशेष
से सम्बन्धित अतिशयो, चमत्कारो आदि के कथन, कुछ इस प्रकार
मिश्रित हो गये है कि आधुनिक अन्वेषक के लिए उनमे से
तथ्यातथ्य को पृथक्-पृथक् करना दुष्कर हो सकता है। तथापि,
आचार्य की मनोवृत्ति, व्यक्तित्व, शैली और सकेतो की पकड़
पा लेने से यह कार्य बहुत कुछ सुगम हो जाता है।
पूरे ग्रन्थ के विश्लेषण से अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
उपलब्ध होते है, अनेक ऐसी ऐतिहासिक अनुश्रुतियाँ भी प्राप्त
होती है जिनका सत्यापन असंभव नही है, और जितने अगों मे
वे सत्यापित हो जाती है, इतिहास-निर्माण मे अतीव उपयोगी
होगी। तीर्थों के परिचय मे अनेक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक सूचनाएँ
भी प्राप्त होती हैं। उस युग की लोकदशा, जैन संस्कृति, कतिपय
धार्मिक एव सामाजिक प्रथाओ, आर्थिक एव राजनैतिक परिस्थिति
पर साथ ही श्वेताम्बरो एव दिगम्बरो के, तथा जैनो और अजैनों
के पारस्परिक सम्बन्धो पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस ग्रन्थ
से ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल मे ये सम्बंध अपेक्षाकृत
अधिक सौहार्द एव प्रीतिपूर्ण थे। दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय का
भेद चिरकालीन एव रूढ हो चुका था, परन्तु अभी तक मन्दिर,
मूर्त्तियाँ एव तीर्थस्थान प्राय अभिन्न थे। उभय सम्प्रदायो के
श्रावक-श्राविकाएँ ही नही, साधु भी बहुधा साथ-साथ उनका
धर्मलाभ उठाते थे। यदि गुजरात, राजस्थान आदि के कतिपय
तीर्थों के प्रति श्वेताम्बरो का विशेष आकर्षण था तो महाराष्ट्र,
आन्ध्र, कर्णाटक आदि के तीर्थों पर दिगम्बरो का विशेष यातायात
था, किन्तु ऐसा कोई भेद उस समय तक उदय मे आया नही
२

१८ विविध तीर्थ-कल्प

लगता कि अमुक तीर्थक्षेत्र श्वेताम्बर है, अमुक दिगम्बर है।
जिन मदिरो एव जिन-प्रतिमाओ के विषय मे भी यही स्थिति
थी । जैनेतरो के लिए तो दिगम्बरो और श्वेताम्बरो मे कोई
भेद ही नही था—दोनो समान रूप से 'सरावगान' ( श्रावक )
कहलाते थे, क्योकि जैन गृहस्थो के लिए उस काल मे यही गव्द
बहुप्रचलित था ।
आचार्य जिनप्रभ गास्त्रज्ञ विद्वान थे, साथ ही जिनभक्त,
तीर्थभक्त श्रद्धालु साधु थे । मन्त्र-तन्त्र, चमत्कारो और अतिगयो
मे उनका सहज विश्वास था । वह युग भी तान्त्रिक युग था, नाथ-
सम्प्रदायी जोगियो का यत्र-तत्र बाहुल्य था, मुसलमान सूफी
फकीर भी चमत्कारो का आश्रय लेते थे । इस प्रकार के विश्वास
उस काल मे लोकप्रचलित थे । विविध तीर्थकल्प मे वर्णित अनेक
चमत्कार ऐसे हैं, जिनकी विभिन्न जिन प्रतिमाओं के प्रसग मे
पुनरावृत्ति हुई लगती है, और कई एक अन्यत्र भी हुए सुने गये
हैं । आज के वैज्ञानिक दृष्टि से प्रभावित तार्किक मानस को वे
[

नही होती उन्हे जैन नही मानते' ( अत्र च यदसम्भाव्य क्वचि-
दूचे तत्र परसमय एव मन्तव्यो हेतुर्यन्नासंगतवाग्जनो जैन ) ।
काश, अपनी परम्परा से सम्बन्धित चमत्कारो आदि के विषय मे
भी आचार्य ऐसी परीक्षाप्रधान तार्किक दृष्टि रख पाते ।
उज्जयन्त (गिरनार), आर्हच्छत्रा, मथुरा, कौशाम्बी, अपापा-
पुरी (पावापुर), हस्तिनापुर, मिथिला, रत्नवाहपुर (रत्नपुरी),
श्रावस्ती, वाराणसी प्रभृति सर्वमान्य प्रसिद्ध तीर्थों का जिनप्रभसूरि
ने जितना और जो आँखो देखा वर्णन किया है, उससे स्पष्ट है
कि उन क्षेत्रो मे उस समय ऐसे अनेक धार्मिक स्मारक आदि
विद्यमान थे जिनका अब वहाँ कोई चिह्न भी शेष नही है । उनसे
सम्बन्धित ऐसे कई अतिशय या चमत्कार भी, जो तब प्राय
प्रत्यक्ष अनुभव मे आते थे, अब चिरकाल से विस्मृत हो चुके हैं ।
भगवान महावीर के पूर्ववर्ती कालो मे घटित घटनाओ के
वर्णन मिथिक प्रकृति की पौराणिक अनुश्रुतियाँ मात्र हैं, जो
धार्मिक श्रद्धा के आधार पर ही मान्य किये जा सकते हैं । परन्तु
भगवान महावीर के समय से लेकर लगभग १००० ई० पर्यन्त की
अनुश्रुतियाँ बहुधा इतिहासाधारित हैं यद्यपि उनमे अनुमान,
कल्पना और पौराणिकता का भी अल्पाधिक मिश्रण है । उनमे
निहित तथ्यांगो के सत्यापन की आवश्यकता है । उदाहरणार्थ
( कल्प नं० २६ मे ) वि० स० ५०२ मे अन्हिलपुर पाटन मे एक
पेड के नीचे तीन प्रतिमाओ का भूगर्भ से निकलना; म०स० (वीर
निर्वाण) ९९३ (सन् ४६६ ई०) कालिकाचार्य द्वारा सवत्सरी की
तिथि मे परिवर्तन (न० २३) - कुछ विद्वान् इन कालकाचार्य को
ईसापूर्व प्रथम शती के मध्य मे लगभग रखते हैं । प्रतिष्ठानपुर की
स्थापना और सातवाहन नरेशो का चरित्र ( न० २३, ३३, ३४ )
तथा श्रीपुर तीर्थ एव कुष्ठी राजा श्रीपाल का आख्यान (न० ५८)
ऐतिहासिक दृष्टि से विचारणीय हैं । कोल्लपाक माणिक्यदेव

२० विविध तीर्थ-कल्प
(न० ५७) के प्रसग मे वि० स० ६८० मे म्लेच्छो के प्रवेश की
बात तथा कन्नड देश के कल्याणनगर मे शकर नामक जिनेन्द्र-
भक्त राजा के होने की बात भी सत्यापन की अपेक्षा रखती हैं।
वीर स० १३०० (सन् ७७३ ई०) मे साचौर मे कन्नौजनरेश
द्वारा जिनालय बनवाने का जो उल्लेख है (न० १७) उसका
सकेत सम्भवतया भिनमाल के गुर्जर प्रतिहार नरेश वत्सराज की
ओर है, किन्तु उस समय वह कन्नौज का राजा नही था—वहाँ
तब आयुधवगी राजाओ का राज्य था। इसी कल्प के अनुसार
वि० स० ८४५ (७८८ ई०) में वलभी रांका सेठ गज्जणपति
हम्मीर को ससैन्य लाया था, जिसने वलभी भग किया और उसके
राजा शिलादित्य को मार डाला—किन्तु उस समय तक गजनी
पर मुसलमानो का अधिकार ही नही हुआ था। ऐसा कोई
आक्रमण उस काल मे सौराष्ट्र पर यदि हुआ तो वह सिंध के
किसी अरब अमीर (सरदार) का हुआ हो सकता है। वि. सं.
१०८१ (सन् १०२४ ई०) मे जो ‘एक अन्य गजनीपति गुजरात
भग करके साचौर पहुचा’ बताया है, वह महमूद गजनवी ही हो
सकता है उसके द्वारा उस वर्ष मे सोमनाथ एव गुजरात पर
भीषण आक्रमण की घटना इतिहास सिद्ध है। मथुरापुरी-कल्प
(न० ९) के अनुसार वि० स० ८२६ (सन् ७६९ ई०) मे आमराय-
सेवित बप्पभट्टि ने मथुरातीर्थ का उद्धार किया था और वहाँ
महावीर विव स्थापित किया था। यह महत्त्वपूर्ण घटना तथ्या-
धारित प्रतीत होती है, किन्तु जिनप्रभसूरि तथा उनके उत्तरवर्ती
प्रबन्धकारो द्वारा वर्णित बप्पभट्टि चरित्र मे भिन्न समयो, क्षेत्रो
तथा व्यक्तियो से सम्बन्धित वृत्त कुछ इतने उलझ गये हैं कि उन्हे
ज्यो का त्यो मान लेने से वे इतिहास सिद्ध नही होते और इसी
कारण आधुनिक इतिहासकारो मे उनके विषय मे पर्याप्त मतभेद
है—कोई कन्नौजनरेश यशोवर्मन (६९०-७२० ई०) के साथ,

प्रस्तावना २१
कोई उसके पुत्र या उत्तराधिकारी के साथ, तो कोई कन्नौज के
इन्द्रायुध प्रभृति किसी आयुधवंशी नरेश के साथ और कई एक
गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभटद्वि० नागावलोक के साथ उक्त आम-
राज का समीकरण करते हैं। इस प्रसंग का विस्तृत विवेचन
स्वतंत्र लेख का विषय है। कल्प न० ५३ का आमरकुड आन्ध्र-
प्रदेश का प्रसिद्ध जैन तीर्थ रामकोड (रामगिरि) या रामतीर्थ
प्रतीत होता है१, और मुरगल नगर ककातीय नरेशो की सुप्रसिद्ध
राजधानी वारंगल। इस प्रसंग मे आचार्य ने ककातीय वंश की
उत्पत्ति और दिगम्बराचार्य मेघचन्द्र की सहायता से उक्त राज्य
वंश के प्रथम पुरुष माधवराज द्वारा राज्य की स्थापना की घटना
का उल्लेख किया है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बडी महत्त्वपूर्ण है
दक्षिण भारत के गंग, सांतर, होयसल आदि कई अन्य राज्य-
वंशों की भाँति यह राज्य भी युगचेता जैन गुरुओ के प्रसाद से
अस्तित्व मे आया था। उसकी उत्पत्ति का विवरण जिनप्रभसूरि
ने स्वयं 'आमरकुंड' (रामकोण्ड) की एक गुहा के द्वार पर
उत्कीर्ण शिलालेख मे पढा था—घटना भी उनके समय से लगभग
दो-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की ही थी। उसे विश्वसनीय न मानने का
कोई कारण नही है। क्योकि इस घटना का उल्लेख अन्यत्र देखने
मे नही आया और शायद वह शिलालेख भी अब प्राप्त नही हैं,
विविध तीर्थ कल्प के इस विवरण का महत्त्व पर्याप्त बढ जाता है।
लगभग १००० ई० से लेकर आचार्य के जीवन काल पर्यन्त
समय से संबंधित जितने तथ्यो, घटनाओ, व्यक्तियो और तिथियो
का उल्लेख विविध तीर्थ-कल्प मे हुआ है, वे सब प्राय शुद्ध

१ देखिए हमारी पुस्तक 'दी जैन सोर्सेज आफ दी हिस्ट्री आफ
एन्शेन्ट इण्डिया' पृ० २०६, तथा ना रा प्रेमी—'जैन साहित्य और
इतिहास', पृ० ४४७.

२२ विविध तीर्थ-कल्प

ऐतिहासिक हैं, सत्यापित हैं अथवा सरलता से हो सकती हैं। वे
अधिकतर आचार्य की मातृभूमि गुजरात से सम्बद्ध हैं, तथा जो
अन्य प्रदेशो से भी सम्बद्ध हैं वे भी प्राय प्रमाणिक हैं, साथ ही
उनमे से अनेक पर्याप्त महत्त्वपूर्ण हैं—१०२४ ई० मे गजनीपति
(महमूद गजनवी) का गुजरात भंग करके साचौर पहुँचना;
१०३१ ई० मे आबू पर विश्वविश्रुत विमलवसती का निर्माण;
११२४ ई० मे, फलवर्द्धितीर्थ (न० ६०) के प्रसग मे राजगच्छी
शीलभद्रसूरि के पट्टधर धर्मघोषसूरि एव महावादी दिगम्बर
गुणचन्द्र का शास्त्रार्थ तथा १२वी शती ई० के अन्त के लगभग
शहाबुद्दीन गोरी द्वारा उक्त तीर्थ के भग किये जाने की घटना;
११२८ ई० मे रा खेंगार के पराभव के उपरान्त सज्जन मन्त्री
द्वारा गिरनार पर नेमि जिनालय का निर्माण और मालव के
भावडसाह द्वारा उसका स्वर्णकलश कराना, तथा ११६३ ई० में
कुमारपाल के दण्डनायक द्वारा उक्त पर्वत पर सीडियो का निर्माण
(न० ५); ११६० ई० मे आबू पर कुमारपाल द्वारा महावीर
चैत्यालय का और १२३१ मे वहाँ वस्तुपाल तथा तेजपाल द्वारा
लूणिगवसही का निर्माण तथा कालान्तर मे म्लेच्छो (मुसलमानो)
द्वारा आबू के दोनो प्रधान मदिरो की तोड-फोड (न० ८),
१२०९ ई० में देवाणदसूरि द्वारा पाटन की कोकावसति की
प्रतिष्ठापना और कालान्तर मे मालवा के सुलतान द्वारा चालुक्य
भीम द्वि० के समय में पाटन का भग किया जाना (न० ४०)
इत्यादि। वि० स० ८०२ मे अणहिलपुरपाटन की स्थापना और,
उस नगर से तदनन्तर क्रमश राज्य करने वाले चावडा, सोलकी
(चौलुक्य) एव बघेले राजाओ की राज्यावलि (न० २६)
इतिहाससिद्ध हैं, उसी प्रकार मन्त्रीश्वर वस्तुपाल एव तेजपाल
भ्रातृद्वय का यशस्वी चरित्र एवं कार्यकलापो का विवरण भी
(न० ४२) सिवाय इसके कि व्यय की गई विभिन्न द्रव्यराशियो

प्रस्तावना २३
एव निर्माण आदि कार्यों की सख्याएँ अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत
होती हैं।
स्वय जिनप्रभसूरि से तथा उनके और दिल्ली के सुलतान
मुहम्मद बिन तुगलुक के सम्पर्क से सम्बन्धित तथ्य कल्यानयनीय
महावीरप्रतिमा-कल्प ( न० २२ ) मे प्राप्त होते है और ऐतिहासिक
दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। कल्यानयन ( कन्नान ? )¹ की उक्त
अतिशयपूर्ण महावीर-प्रतिमा की प्रतिष्ठा तथा तदनन्तर उसके
साथ घटी घटनाओ मे प्राय कोई अतिशयोक्ति प्रतीत नही होती ।
इस कल्प मे आचार्य ने स्वय जो कुछ वर्णन किया है उसे प्रामाणिक
एव विश्वसनीय स्वीकार करना चाहिए। कल्प के परिशेष
( न० ५१ ) मे विद्यातिलक ने तथा अन्य परवर्ती लेखको ने मूल
वर्णन को चमत्कारो आदि की निरन्तर वृद्धि द्वारा पल्लवित
किया और उत्तरोत्तर अतिशयोक्तियो से काम लिया प्रतीत होता
है, तथापि विद्यातिलक के ‘परिवेष’ मे कई तथ्य ऐसे है जो
आचार्य जिनप्रभ के अपने वर्णन के पूरक हैं।
इस्लाम धर्म का उदय सुदूर अरब की मरुभूमि में पैगम्बर
हजरत मोहम्मद द्वारा ७ वी शती ई० के प्रारभ मे हुआ, और
एक सौ वर्ष के भीतर ही वह धर्म प्राय पूरे मध्य एशिया पर छा
गया तथा पैगम्बर के उत्तराधिकारी खलीफाओ का राज्याधिकार
भारतवर्ष के सिन्ध प्रदेश तक विस्तृत हो गया। किन्तु भारत के
मध्यदेश पर सीधा आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान गजनी
का अमीर महमूद था, जिसने ११वी शती ई० के प्रथम पाद मे
लगभग १७ आक्रमण करके एवं पश्चिमी भारत मे भयकर लूट

१ इस स्थान की पहचान श्री अगरचंद नाहटा ने पूर्वी पंजाब मे दादरी
के निकटस्थ ‘कन्नान’ से की है, जो अन्य सब विकल्पों की अपेक्षा
अधिक संगत प्रतीत होती है।

२४ विविध तीर्थ-कल्प
मार की और अनेक प्रसिद्ध मदिरो एव देवमूर्त्तियो को भग्न
किया। उसके उत्तराधिकारियो के समय मे कुछ छुटपुट हमले
मध्यप्रदेग पर हुए, किन्तु उनका राज्यविस्तार प्राय पश्चिमी
पजाव तक ही सीमित रहा।१
१२वी शती ई० के अन्तिम दगक मे गजनी के मुलतान
गिहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने भारतविजय के उद्देग्य से मध्यप्रदेग
पर आक्रमण किये और अन्तत दिल्ली-अजमेर के चौहान नरेग
पृथ्वीराज को तथा कन्नौज के गाहडवाल राजा जयचन्द को समाप्त
करके तथा मोहवा के परमाल चन्देल और गुजरात आदि के
कई अन्य राजाओ को पराजित करके वह दिल्ली को केन्द्र बना-
कर उत्तरभारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने मे सफल
हुआ। अनुश्रुति है कि इस सुलतान ने अपनी मलिका के आग्रह
पर एक दिगम्बर जैन मुनि को अपने दर्वार मे बुलाकर सम्मानित
किया था। कुछ के अनुसार यह घटना अजमेर मे घटी थी और
वह साधु भट्टारक वसन्तकीर्त्ति थे, जिन्हे उस अवसर पर खण्ड-
वस्त्र धारण करना पडा था—कहते हैं कि तभी से वस्त्रधारी
दिगम्बर भट्टारको की प्रथा प्रचलित हुई।२
वस्तुतः, विदेगी, विजातीय, विधर्मी एव अजनबी मुसलमानो
और उनके धर्म एव सस्कृति के प्रविष्ट होने तथा उनकी राज्य-
सत्ता के देश के हृत्स्थल मे स्थापित हो जाने के अनेक तत्काल
एव चिरव्यापी क्रान्तिकारी परिणाम हुए, जिनने देश की राज-
नीति और अर्थव्यवस्था को ही नही, उसकी सस्कृति, धर्मो और
१ देखिए—भारतीय इतिहास - एक दृष्टि ( द्वि० सं०, १९६६ ई० ),
पृ० ३१३-४०० ।
२ वही, पृ० ४००-४०४, तथा 'प्रमुख ऐतिहासिक जैन पुरुष और
महिलाए' ( १९७५ ), पृ० २३८-२३९ ।

समाजव्यवस्था को भी अत्यन्त प्रभावित एवं प्रवर्तित किया ।
धन, भोग और राज्य की लिप्सा ही उन नवागतो मे सर्वोपरि
थी, और उसकी पूर्त्ति के लिए—अपनी सत्ता एवं सख्या के
सरक्षण और विस्तार के लिए वे बहुधा धर्म और धर्मोन्माद को
प्रबल अस्त्र बनाते थे, जिसके कुफल देशज जनता को भोगने
पडते थे । तथापि, अत्यधिक बहुसख्यक भारतीयो पर निरन्तर
क्रूर अत्याचार करते रहना और उनके धर्म, सस्कृति एवं रीति-
रिवाजो की सर्वथा अवहेलना करना, स्वयं मुट्ठी भर मुसलमान
सत्ताधारियो के हित मे नही था, व्यावहारिक और उतना सरल
भी नही था । मुल्ला-मौलवियो की सदैव यह चेष्टा रहती थी कि
राज्यशासन पूर्णतया मजहबी-मुल्मानी हो जाय, जो केवल
इस्लाम और मुसलमानो के ही लाभ के लिए हो और जिसमे
काफिरो ( अन्य धर्मियो ) के प्रति किसी प्रकार की भी उदारता
एव सहिष्णुता न बरती जाय, तथा सुल्तान जो कुछ भी करे,
‘शरह’ के अनुसार अर्थात् उक्त धर्माधिकारियो के आदेश-निर्देश
के अनुसार ही करे । किन्तु

२६ विविध तीर्थ-कल्प
मेरे महल के नीचे, यमुना तट पर नित्य भजन कीर्त्तन होते हैं
और शंख-घडियाल बजते हैं—मै सुनता हू और देखता हूँ।
अतएव उनकी इन धार्मिक प्रवृत्तियो पर प्रतिबन्ध लगाना
अव्यावहारिक है।।"१ उसने तो सिदिमौला नामक एक मुल्ला को
उसकी धृष्टता से कुपित होकर मरवा भी डाला था।
उसका उत्तराधिकारी अलाउद्दीन खलजी (१२९६-१३१६ ई०)
बडा महत्त्वाकांक्षी, भारी विजेता, प्रतापी और कठोर शासक
था। उसके समय मे प्राय सम्पूर्ण भारत दिल्ली-सल्तनत के प्रभाव
क्षेत्र मे आ गया था। मुल्ला-मौलवियो के विरोध के बावजूद वह
राज्यकार्य मे स्वेच्छाचारी और मुसल्मानेतरो के प्रति अधिक
व्यावहारिक एव सहिष्णु रहा। विद्वानो का भी वह आदर करता
था। भारतभक्त एव समन्वयवादी सुप्रसिद्ध अमीर खुसरो उसका
राजकवि था, राघव और चेतन नाम के दो ब्राह्मण पडित उसके
दरबारी थे, माधव नामक हिन्दू उसका एक मन्त्री था, जैन
वैज्ञानिक ठक्कर फेरु राज्यसेवा मे नियुक्त था, दिल्ली का नगर
सेठ पूर्णचन्द्र नामक एक अग्रवाल जैन सुलतान का कृपापात्र था।
जिनप्रभसूरि के कथनानुसार माधव मन्त्री की प्रेरणा पर ही
सुलतान ने अपने भाई उलुगखाँ को गुजरात-विजय करने भेजा
था। गुजरात के प्राथमिक आक्रमण मे भडौच मे स्वय सुलतान
का जैन मुनि श्रुतवीर से साक्षात्कार हुआ बताया जाता है। सेठ
पूर्णचन्द्र से कहकर उसने दिगम्बराचार्य माधवसेन को दिल्ली
बुलवाया था, राघव एवं चेतन के साथ दर्बार मे शास्त्रार्थ कराया
था और उन्हे सम्मानित किया था—इन्ही आचार्य ने दिल्ली मे
काष्ठासघ की गद्दी स्थापित की थी और सुलतान से कई फरमान
१ आगा मेहदी हुसैन—राइज एण्ड फाल आफ मुहम्मद बिन तुगलक
( लन्दन, १९३८ ) प्रीफेस, पृ० १२।

प्राप्त किये बताये जाते है। कहा जाता है कि श्वेताम्बराचार्य
रामचन्द्रसूरि और जिनचन्द्रसूरि को भी उसने सम्मानित किया
था। सुलतान का फरमान एव सहायता प्राप्त करके सेठ पूर्णचन्द्र
गिरनार तीर्थ की यात्रा के लिए एक बडा सघ लेकर गया था।
उसी समय पेथडगाह के नेतृत्व मे वहाँ गुजरात का भी एक बडा
संघ आया था, और दोनो सघो ने सद्भावपूर्वक साथ-साथ तीर्थ
वन्दना की थी। गुजरात के सूबेदार अलपखाँ ने भी पाटन के सेठ
समरागाह को शत्रुजय तीर्थ का उद्धार करने और यात्रासघ ले
जाने के लिए सैनिक सहायता सहर्ष प्रदान की थी। अलाउद्दीन के
उत्तराधिकारी मुबारकशाह खलजी (१३१६-१३२० ई०) ने सेठ
समरागाह को दिल्ली 'बुलाकर एक उच्च पद पर नियुक्त किया
बताया जाता है। तुगलुक वश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलुक-
गाह (१३२१-१३२५ ई०), जिसको माँ एक हिन्दू जाटनी थी
और जो भारत मे ही जन्मा था, स्वभावत क्रूर और धर्मान्ध
नही था। सेठ समराशाह को वह पुत्रवत् मानता था और उसे
उसने एक उच्च पद देकर तेलगाना भेजा था। सोमचरित्रगणिकृत
'गुरुगुणरत्नाकर' (१४८५ ई०) के अनुसार सूर और वीर
(या नानक) नाम के प्राग्वाटजातीय दो जैन भ्राता भी इस
सुलतान के प्रतिष्ठित सरदार थे। दिल्लीनिवासी सेठ रथपति ने
शाही फरमान प्राप्त करके १३२३ ई० मे ससघ तीर्थ यात्रा की थी
जिसमे पाँच मास का समय लगा था। इन तथ्यो से स्पष्ट है कि
विजयार्थ या विद्रोहदमनार्थ किये गये युद्धो के अवसरो को छोडकर
इस काल मे भारतीयो को सामान्यतया स्वधर्मपालन की सीमित
स्वतन्त्रता प्राप्त थी और उन्हे यदा-कदा शासनकार्य मे उच्च पद
भी दिये जाने लगे थे।
गयासुद्दीन का पुत्र एव उत्तराधिकारी उलुगखाँ उर्फ जूनाखाँ
था जिसने मुहम्मद विन तुगलुक नाम से १३२५ से १३५१ ई०

२८ विविध तीर्थ-कल्प
पर्यन्त गासन किया । दिल्ली के सुलतानो मे उसका राज्य
सर्वाधिक विस्तृत एव शक्तिशाली था और पूर्व मुगलकालीन भारत
का वह सम्भवतया सर्वमहान मुसलमान नरेग था । उसका व्यक्तित्व
अनेक विरोधी तत्त्वो का मिश्रण, अतिविचित्र एव विवादास्पद
रहा है । जहाँ वह सुशिक्षित, वहुभाषाविज्ञ, दर्गन, न्याय, तर्क,
चिकित्सा शास्त्र आदि विविध विद्याओ और ज्ञान-विज्ञानो मे
पारंगत विद्यारसिक स्वतन्त्र विचारक, साधु-सन्तो और विद्वानो
का समादर करने वाला, परमतसहिष्णु, उदार, दानगील,
न्यायप्रिय, आविष्कारबुद्धि-सम्पन्न, सदाचारी और वीर योद्धा था,
वहाँ साथ-ही-साथ बहुत क्रोधी, उतावला, अधीर, अदूरदर्गी
अव्यावहारिक, निरंकुश, क्रूर, निर्दयी और कुछ सनकी भी था ।
स्वय अपने पिता की मृत्यु मे उसका हाथ रहा माना जाता है,
और उसी के सचित धन से उसने विरोधी सरदारो का मुह वन्द
किया । अपराधियो, विशेषकर विद्रोहियो को वह अत्यन्त कठोर
एव अमानुषिक दण्ड देता था, और इस विपय मे पद, वर्ग या
सम्बन्ध का भी लिहाज नही करता था । अपने सगे भानजा, कई
उच्च पदाधिकारियो और एक काजी को भी उसने खुले आम
मृत्यु-दण्ड दिया था । उसके सनकी स्वभाव और राजधानी का
परिवर्तन, तावे के सिक्के चलाना, चीन का आक्रमण प्रभृति
विचित्र योजनाओ एव अभियानो के कारण उसके मरते ही
सल्तनत का द्रुत वेग से पतन होने लगा और एक-एक करके प्राय
सभी प्रान्तीय सूवेदार स्वतन्त्र हो गये ।
इस सुलतान की विफलता एक सबसे वडा कारण |मुल्ला-
मौलवियो का क्षोभ एव विरोध था, जो उससे डरते भी थे,
चिढ़ते भी थे और उसके विरुद्ध विद्रोहो को उभारते रहते थे ।
मध्यकालीन मुसलमानी तवारीखे ( इतिहास-ग्रन्थ ) भी अधि-
काशत मुल्ला-मौलवियो द्वारा ही लिखी गयी, और उनमे उन्होने