विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० विविध तीर्थ-कल्प
(न० ५७) के प्रसग मे वि० स० ६८० मे म्लेच्छो के प्रवेश की
बात तथा कन्नड देश के कल्याणनगर मे शकर नामक जिनेन्द्र-
भक्त राजा के होने की बात भी सत्यापन की अपेक्षा रखती हैं।
वीर स० १३०० (सन् ७७३ ई०) मे साचौर मे कन्नौजनरेश
द्वारा जिनालय बनवाने का जो उल्लेख है (न० १७) उसका
सकेत सम्भवतया भिनमाल के गुर्जर प्रतिहार नरेश वत्सराज की
ओर है, किन्तु उस समय वह कन्नौज का राजा नही था—वहाँ
तब आयुधवगी राजाओ का राज्य था। इसी कल्प के अनुसार
वि० स० ८४५ (७८८ ई०) में वलभी रांका सेठ गज्जणपति
हम्मीर को ससैन्य लाया था, जिसने वलभी भग किया और उसके
राजा शिलादित्य को मार डाला—किन्तु उस समय तक गजनी
पर मुसलमानो का अधिकार ही नही हुआ था। ऐसा कोई
आक्रमण उस काल मे सौराष्ट्र पर यदि हुआ तो वह सिंध के
किसी अरब अमीर (सरदार) का हुआ हो सकता है। वि. सं.
१०८१ (सन् १०२४ ई०) मे जो ‘एक अन्य गजनीपति गुजरात
भग करके साचौर पहुचा’ बताया है, वह महमूद गजनवी ही हो
सकता है उसके द्वारा उस वर्ष मे सोमनाथ एव गुजरात पर
भीषण आक्रमण की घटना इतिहास सिद्ध है। मथुरापुरी-कल्प
(न० ९) के अनुसार वि० स० ८२६ (सन् ७६९ ई०) मे आमराय-
सेवित बप्पभट्टि ने मथुरातीर्थ का उद्धार किया था और वहाँ
महावीर विव स्थापित किया था। यह महत्त्वपूर्ण घटना तथ्या-
धारित प्रतीत होती है, किन्तु जिनप्रभसूरि तथा उनके उत्तरवर्ती
प्रबन्धकारो द्वारा वर्णित बप्पभट्टि चरित्र मे भिन्न समयो, क्षेत्रो
तथा व्यक्तियो से सम्बन्धित वृत्त कुछ इतने उलझ गये हैं कि उन्हे
ज्यो का त्यो मान लेने से वे इतिहास सिद्ध नही होते और इसी
कारण आधुनिक इतिहासकारो मे उनके विषय मे पर्याप्त मतभेद
है—कोई कन्नौजनरेश यशोवर्मन (६९०-७२० ई०) के साथ,