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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 442 में से

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तत्संबंधी अनुश्रुतियों एवं किंवदंतियों और उपरोक्त मध्यकालीन
तीर्थ-साहित्य के आधार पर ही लिखे गये हैं। १ इस विषय में
सन्देह नहीं है कि उक्त मध्यकालीन रचनाओं में आचार्य जिन-
प्रभसूरि कृत कल्पप्रदीप (विविध तीर्थ-कल्प) अनेक दृष्टियो से
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
आचार्य जिनप्रभसूरि अपने युग के महान शासन प्रभावक
आचार्य थे। गुजरात के मोहिलवाड़ी ग्राम निवासी, श्रीमाल
ज्ञातीय, ताम्बीगोत्रीय श्रावक महाधर के पौत्र और रत्नपाल एवं
सेतलदेवी के कनिष्ठ सुपुत्र सुभटपाल के रूप में १२६१ ई० के
लगभग उनका जन्म हुआ था। ग्यारहवीं शती ई० के प्रथम पाद
मे आचार्य जिनेश्वरसूरि (प्रथम) द्वारा संस्थापित खरतरगच्छ के
अष्टम आचार्य जिनेश्वरसूरि द्वितीय (१२२१-१२७४ ई०) थे।
उनके समय मे खरतरगच्छ दो शाखाओं मे विभक्त हो गया—
वृहत्शाखा के आचार्य उनके पट्टशिष्य जिनप्रबोध सूरि हुए, और
दूसरे शिष्य, जिनसिंह सूरि, लघुशाखा के प्रथम आचार्य हुए।
इन्ही जिनसिंह सूरि (१२२३-१२८४ ई०) के निकट सुभटपाल ने
मात्र आठ वर्ष की बालवय मे जिनदीक्षा ली और धर्मतिलक नाम
प्राप्त किया। गुरु के सान्निध्य मे मनोयोग से विद्याभ्यास करके
कुछ ही वर्षों मे वह इतने बहुविज्ञ विद्वान हो गये कि उपाध्याय
पद प्राप्त कर लिया और मात्र २३ वर्ष की आयु मे, १२८४ ई०
मे जिनप्रभसूरि नाम से आचार्य पद पर आसीन होकर गुरु के
पट्टधर हुए। इस प्रकार लघु खरतर शाखा के वह द्वितीय और

१ स्व प नाथूराम प्रेमी ने अपने 'जैन साहित्य और इतिहास'
(द्वि स, १९५६) में पृ ४२२ से ४७७ पर्यन्त 'हमारे तीर्थक्षेत्र,'
'दक्षिण के तीर्थक्षेत्र' और 'तीर्थों के विवाद' शीर्षको से जैन तीर्थों
के विषय में अत्युत्तम ऊहापोह एवं विवेचन किया हैं।