विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मेरे महल के नीचे, यमुना तट पर नित्य भजन कीर्त्तन होते हैं
और शंख-घडियाल बजते हैं—मै सुनता हू और देखता हूँ।
अतएव उनकी इन धार्मिक प्रवृत्तियो पर प्रतिबन्ध लगाना
अव्यावहारिक है।।"१ उसने तो सिदिमौला नामक एक मुल्ला को
उसकी धृष्टता से कुपित होकर मरवा भी डाला था।
उसका उत्तराधिकारी अलाउद्दीन खलजी (१२९६-१३१६ ई०)
बडा महत्त्वाकांक्षी, भारी विजेता, प्रतापी और कठोर शासक
था। उसके समय मे प्राय सम्पूर्ण भारत दिल्ली-सल्तनत के प्रभाव
क्षेत्र मे आ गया था। मुल्ला-मौलवियो के विरोध के बावजूद वह
राज्यकार्य मे स्वेच्छाचारी और मुसल्मानेतरो के प्रति अधिक
व्यावहारिक एव सहिष्णु रहा। विद्वानो का भी वह आदर करता
था। भारतभक्त एव समन्वयवादी सुप्रसिद्ध अमीर खुसरो उसका
राजकवि था, राघव और चेतन नाम के दो ब्राह्मण पडित उसके
दरबारी थे, माधव नामक हिन्दू उसका एक मन्त्री था, जैन
वैज्ञानिक ठक्कर फेरु राज्यसेवा मे नियुक्त था, दिल्ली का नगर
सेठ पूर्णचन्द्र नामक एक अग्रवाल जैन सुलतान का कृपापात्र था।
जिनप्रभसूरि के कथनानुसार माधव मन्त्री की प्रेरणा पर ही
सुलतान ने अपने भाई उलुगखाँ को गुजरात-विजय करने भेजा
था। गुजरात के प्राथमिक आक्रमण मे भडौच मे स्वय सुलतान
का जैन मुनि श्रुतवीर से साक्षात्कार हुआ बताया जाता है। सेठ
पूर्णचन्द्र से कहकर उसने दिगम्बराचार्य माधवसेन को दिल्ली
बुलवाया था, राघव एवं चेतन के साथ दर्बार मे शास्त्रार्थ कराया
था और उन्हे सम्मानित किया था—इन्ही आचार्य ने दिल्ली मे
काष्ठासघ की गद्दी स्थापित की थी और सुलतान से कई फरमान
१ आगा मेहदी हुसैन—राइज एण्ड फाल आफ मुहम्मद बिन तुगलक
( लन्दन, १९३८ ) प्रीफेस, पृ० १२।