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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

विविध तीर्थ-कल्प
वलियो-गुर्वावलियो मे, तथा शिलालेखो मे परम्परागत तीर्थों के
विषय में अनेक फुटकर ज्ञातव्य प्राप्त होते हैं । परन्तु, तीर्थों के
विषय में स्वतन्त्र रचनाएँ, यथा चैत्यवन्दन स्तोत्र, तीर्थविशेषों
के माहात्म्य, तीर्थकल्प, तीर्थमालाएँ आदि मध्यकाल में ही रची
गयीं । मदनकीर्त्ति ( लगभग १२४० ई० ) कृत शासनचतुस्त्रि-
शिका, उदयकीर्त्तिकृत निर्वाणभक्ति, प्रभाचन्द्रसूरि कृत प्रभावक-
चरित्र ( १२७७ ई० ) मेरुतुंग की प्रबन्धचिन्तामणि (१३०५ ई०)
जिनप्रभसूरिका कल्प-प्रदीप ( १३३२ ई० ), राजशेखरसूरिकृत
प्रबन्धकोश ( १३४८ ई० ), हंससोम की पूर्वदेशीय चैत्य-परिपाटी
( १५०८ ई० ), वर्धमानकृत दशभक्त्यादि संग्रह ( १५४२ ई० ),
ब्र० ज्ञानसागर की तीर्थावली ( १५५० ई० लगभग ), विजय-
सागर की तीर्थमाला ( १६०७ ई० ), भ विश्वभूषणकृत सर्वत्रै-
लोक्य जिनालय-जयमाला . ( १६६५ ई० ), शीलविजयगणी की
तीर्थमाला १ ( १६८९ ई० ), महेश्वरसूरि का शत्रुञ्जय-माहात्म्य
( १७०० ई० ), गुणभद्रकृत तीर्थार्चनचन्द्रिका ( ल १७५० ई० ),
देवदत्त दीक्षित के सम्मेदाचल माहात्म्य एवं स्वर्णाचल माहात्म्य
( १७८८ ई० ), प्रभृति इस प्रकार की प्रमुख ज्ञात रचनाएँ हैं ।
कई अन्य ( गिरनार आदि ) तीर्थों के माहात्म्य, कई एक तीर्थों के
पूजापाठ, जयमाला, स्तवन आदि, पं० भगवतीदास कृत अर्गलपुर-
जिनदेवता ( १५९४ ई० ) जैसे स्थानीय विवरण भी प्राप्त होते
हैं । वर्तमान शताब्दी में जैन तीर्थक्षेत्रों के जो अनेक विवरण-विवे-
चन प्रकाशित हुए हैं, वे ज्ञात एवं मान्य तीर्थों के वर्तमान रूप,
१ मुनि विजयधर्म सूरि ने स्वसम्पादित 'प्राचीन तीर्थमाला संग्रह'
( १९२१ ई० ) में ऐसी २५ तीर्थमालाओं का संग्रह प्रकाशित किया
था । चैत्य-वन्दन स्तोत्रों के लिए देखिए शोधांक नं० २४
पृ १३९-१४१ पर हमारा लेख ।